shiv ji ke pita ka naam kya hai। भगवान शिव के पिता का नाम क्या है
Shiv Ji Ke Pita Ka Naam: हर इंसान के जीवन में पिता की पहचान बहुत अहम होती है. यही वजह है कि जब हम देवी-देवताओं की बात करते हैं, तो मन में यह सवाल अपने आप आ जाता है कि उनके माता-पिता कौन थे. भगवान राम के पिता दशरथ, भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव और भगवान गणेश के पिता शिवजी, ये सब तो आम तौर पर लोग जानते हैं, लेकिन जब बात खुद भगवान शिव की आती है, तो यहीं पर सोच अटक जाती है. सवाल उठता है कि जिन शिव को सृष्टि का आधार माना जाता है, जिनसे सब कुछ पैदा हुआ, उनका पिता आखिर कौन है? यह सवाल सिर्फ जिज्ञासा नहीं है, बल्कि इसके पीछे दर्शन, अध्यात्म और जीवन का गहरा सच छिपा है. हाल ही में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने एक कथा के जरिए इस सवाल का बेहद सुंदर और सरल उत्तर दिया. यह कहानी सिर्फ भगवान शिव के पिता की बात नहीं करती, बल्कि यह भी समझाती है कि हम कौन हैं, कहां से आए हैं और हमारा असली उद्देश्य क्या है. नर्मदा जी की तपस्या से जुड़ी यह कथा सुनने में जितनी रोचक है, समझने में उतनी ही गहरी भी है.
नर्मदा जी की तपस्या और अनोखा वरदान
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनुसार, एक समय नर्मदा जी ने काशी जाकर कठिन तपस्या की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. नर्मदा जी ने जो वरदान मांगा, वह साधारण नहीं था. उन्होंने कहा कि कल्प दर कल्प वे बनी रहें, उनका कभी नाश न हो और सबसे खास बात यह कि भगवान शिव उनके पुत्र बनें. यह सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए और बोले कि यह मांग बड़ी विचित्र है. इसके बाद उन्होंने नर्मदा जी को एक कथा सुनाई, जिसमें इस प्रश्न का उत्तर छिपा है कि आखिर शिव का पिता कौन है.
शिव-पार्वती विवाह और पिता के नाम का सवाल
भगवान शिव ने बताया कि जब हिमाचल में उनका विवाह माता पार्वती से हो रहा था, तब ब्रह्मा जी उस विवाह के पुरोहित बने. विवाह के दौरान जब गोत्र और पिता के नाम का प्रश्न उठा, तो एक पल के लिए सब चुप हो गए. सोचने की बात यह थी कि जो खुद सृष्टि के मूल हैं, वे अपने पिता का नाम कैसे बताएं? जब ब्रह्मा जी ने पूछा कि आपके पिता कौन हैं, तो शिव ने उत्तर दिया कि ब्रह्मा. फिर ब्रह्मा के पिता का नाम पूछा गया तो शिव ने कहा विष्णु. जब विष्णु के पिता यानी परदादा का नाम पूछा गया, तो शिव ने शांत भाव से कहा – “वह मैं ही हूं.”
इस कथा का असली अर्थ क्या है
इस कहानी का मतलब यह नहीं है कि शिव किसी वंश परंपरा में बंधे हुए हैं. इसका असली भाव यह है कि शिव ही सृष्टि का मूल हैं. जो कुछ दिखाई देता है, जो कुछ अदृश्य है, सब शिव से ही निकला है और अंत में शिव में ही समा जाता है. शंकराचार्य जी बताते हैं कि इस संसार में जन्म लेने वाला हर जीव शिव का ही अंश है. फर्क सिर्फ इतना है कि जीव अविद्या के साथ जन्म लेता है, जिससे वह अपने असली स्वरूप को भूल जाता है. यही भूल उसे जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखती है.
जीवन का उद्देश्य और शिव तत्व
जब तक इंसान अपने भीतर छिपे शिव तत्व को नहीं पहचानता, तब तक उसका जीवन चक्र चलता रहता है. दुख, सुख, मोह और डर इसी भूल से पैदा होते हैं. जैसे-जैसे इंसान अपने ज्ञान को बढ़ाता है और अपने अंदर झांकता है, वह इस सच्चाई के करीब पहुंचता है कि वह सिर्फ शरीर नहीं है, बल्कि उसी चेतना का हिस्सा है जिसे शिव कहा गया है. यही वजह है कि शिव को सिर्फ देवता नहीं, बल्कि परम सत्य माना गया है. वे किसी के पुत्र नहीं हैं, बल्कि सबके मूल हैं.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)