Bhishma Ashtami 2026 Upay | ganga stotram padhne ke fayde | how to get rid of sins on Bhishma Ashtami | भीष्म अष्टमी पर करें यह एक आसान उपाय, पापों से मिलेगी मुक्ति, पाएंगे गंगा स्नान का पुण्य!

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Bhishma Ashtami 2026 Upay: आज भीष्म अष्टमी है. आज के दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि है. इस दिन ही द्वापर युग में गंगापुत्र भीष्म ने कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अपने प्राण त्याग दिए थे. जब उनको बाण लगे तो उन्होंने अपने मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की. करीब 2 माह तक वे बाणों की शैया पर रहे, जब सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण हुए तो उन्होंने प्राण त्याग दिया. कहा जाता है कि उत्तरायण में मरने वाले व्यक्ति की आत्मा को जीवन और मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. आज भीष्म अष्टमी के अवसर पर पितरों के लिए स्नान, दान, तर्पण, श्राद्ध आदि कर्म किए जाते हैं. भीष्म अष्टमी के दिन पाप से मुक्ति के लिए आप गंगा स्तोत्र का पाठ करें. गंगा स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को गंगा स्नान के समान पुण्य मिलता है. इससे मां गंगा प्रसन्न होती हैं और उस पर अपनी कृपा करती हैं.

गंगा स्तोत्र पाठ

देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरल तरंगे।
शंकर मौलिविहारिणि विमले मम मति रास्तां तव पद कमले॥

भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः।
नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम्॥

हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम्॥

तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम्।
मातर्गंगे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः॥

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खंडित गिरिवरमंडित भंगे।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये॥

कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके।
पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवति कृततरलापांगे॥

तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे॥

पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जय जय जाह्नवि करुणापांगे।
इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये॥

रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम्।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥

अलकानंदे परमानंदे कुरु करुणामयि कातरवंद्ये।
तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुंठे तस्य निवासः॥

वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः।
अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये।
गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम्॥

येषां हृदये गंगा भक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः।
मधुराकंता पंझटिकाभिः परमानंदकलितललिताभिः॥

गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम्।
शंकरसेवक शंकर रचितं पठति सुखीः त्व॥

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