बीजेपी में ‘नवीन’ अध्याय पर राजद में वही पुरानी कहानी, तेजस्वी की ताजपोशी लालू यादव की विरासत या विवशता?
पटना. तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय कार्यकारिणी अध्यक्ष बनने पर राजनीति के जानकार एक पंक्ति में अपनी बात कहते हैं और इस पूरी कवायद का मर्म समझा जाते हैं- ”जो अवश्यंभावी था, वही हुआ भी!” दरअसल, यह सभी मानकर ही चल रहे थे कि लालू प्रसाद के कमजोर स्वास्थ्य और सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद यह लगभग तय था कि तेजस्वी यादव ही पार्टी की कमान संभालेंगे. राजद के भीतर ऐसा कोई दूसरा नेता तैयार ही नहीं किया गया जो राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व का दावा कर सके. इस पार्टी की बड़ी हकीकत भी तो यही है कि पार्टी का संगठन, रणनीति और पहचान वर्षों से लालू परिवार के नाम पर टिकी रही. ऐसे में तेजस्वी यादव की ताजपोशी एक निर्णय से ज्यादा एक औपचारिकता ही नजर आई. लेकिन, सवाल तो भाजपा के एक बड़े कदम ने पूरी राजनीतिक बिरादरी के लिए उठा दिया है जो हाल में ही काफी चर्चा में रहा है.
बीजेपी का उदाहरण और बड़ा विरोधाभास
दरअसल, भारतीय राजनीति के इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी ने नितिन नवीन जैसे अपेक्षाकृत सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना. यह फैसला बीजेपी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और संगठनात्मक ढांचे की ताकत को दिखाता है. यहां नेतृत्व एक परिवार की विरासत नहीं, बल्कि संगठनात्मक यात्रा और राजनीतिक कौशल का परिणाम बनता है. यही फर्क राजद जैसी पार्टियों को राष्ट्रीय विस्तार से रोक देता है. इसके साथ ही क्षेत्रीय दलों के लिए परिवारवाद सिर्फ पसंद नहीं, बल्कि कई बार मजबूरी बन जाता है.
तेजस्वी यादव की ताजपोशी ने राजद में परिवारवाद की हकीकत उजागर की.
परिवारवाद क्यों बन जाता है मजबूरी
राजनीति के जानकार भी कहते हैं कि दरअसल, इन पार्टियों की पहचान अक्सर किसी एक करिश्माई नेता से जुड़ी होती है. संगठनात्मक ढांचा कमजोर होता है और दूसरा मजबूत चेहरा खड़ा करने की न तो इच्छा होती है, न रणनीति. नेता के बाद वही नाम चलता है, जिसे जनता पहले से जानती हो. बिहार के संदर्भ में राजद में यह भूमिका लालू यादव परिवार निभाता आया है, जबकि यूपी में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव परिवार और दूर तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी डीएमके में करुणानिधि परिवार.
आंतरिक लोकतंत्र की कमी सबसे बड़ी कमजोरी
राजनीति के जानकार कहते हैं कि इन पार्टियों की सबसे बड़ी कमजोरी आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है. चुनाव, पद और जिम्मेदारियां ऊपर से तय होती हैं. संगठन के भीतर प्रतिस्पर्धा को अक्सर नेतृत्व के लिए खतरा मान लिया जाता है. परिणाम यह होता है कि जमीन से उठने वाले नेता या तो सीमित भूमिका में रह जाते हैं या पार्टी छोड़ देते हैं. धीरे-धीरे पार्टी एक परिवार की राजनीतिक संपत्ति बन जाती है और उसका उपभोग करने का अधिकार भी एक परिवार के हाथ में ही रहता है. हालांकि, इसके दुष्परिणाम भी सामने आते रहे हैं जो पार्टियो के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर जाते हैं.
परिवारवादी पार्टियों का विस्तार रुकने का असली कारण
राजनीति के जानकार कहते हैं कि, परिवारवाद का सीधा असर पार्टी के विस्तार पर पड़ता है. जब नेतृत्व सीमित परिवार में सिमट जाए, तो दूसरे सामाजिक वर्ग खुद को उससे नहीं जोड़ पाते. यही कारण है कि राजद बिहार से बाहर कभी मजबूत नहीं हो पाई. यही नहीं, बिहार में भी सभी वर्गों के भीतर उतनी पैठ नहीं बना पाई जो भारतीय जनता पार्टी या कमोबेश कांग्रेस जैसी पार्टी अपने उत्कर्ष के दिनों में करती रही हैं. उदाहरण देखें तो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश से बाहर और डीएमके तमिलनाडु से बाहर अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकीं. कह सकते हैं कि क्षेत्रीय पहचान राष्ट्रीय आकांक्षा को दबा देती है.
तेजस्वी यादव की राजद अध्यक्ष ताजपोशी के साथ ही परिवारवाद और राजद में आंतरिक लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ पार्टी के भविष्य की चिंता पर चर्चा हो रही है.
वोट बैंक की राजनीति और जोखिम से डर
राजनीति के जानकार कहते हैं कि परिवार आधारित पार्टियां अक्सर पारंपरिक वोट बैंक पर निर्भर रहती हैं. नेतृत्व परिवर्तन का मतलब होता है उस वोट बैंक में दरार का जोखिम. यही डर इन्हें प्रयोग करने से रोकता है. जबकि लोकतंत्र में जोखिम ही नए विकल्प और नए नेता पैदा करता है. बीजेपी या कांग्रेस जैसे दलों में यह प्रयोग समय-समय पर होते रहे हैं, भले ही वहां भी परिवारवाद के आरोप लगते रहे हों. आरजेडी का इतिहास देखें तो लालू यादव के बाद तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी 2020 के बिहार चुनावों में अच्छा प्रदर्शन तो किया, लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं पा सकी. यह उनका उत्कर्ष काल था, जबकि 2025 में इसी चेहरे को जनता ने सिरे से नकार दिया.
परिणति लगभग तय क्यों होती है?
इतिहास गवाह है कि परिवारवाद से जकड़ी पार्टियां या तो सीमित दायरे में सिमट जाती हैं या धीरे-धीरे कमजोर पड़ती हैं. यदि परिवार के बाहर से नेता नहीं उभरते, तो पार्टी की दीर्घकालिक अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. यूपी में समाजवादी पार्टी का उदाहरण स्पष्ट है. मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में पहले 2017 में फिर 2022 के यूपी चुनावों में हार गई और परिवारवाद के आरोपों ने युवा मतदाताओं को दूर किया. डीएमके ने हालांकि 2021 में जीत हासिल की, लेकिन स्टालिन को पिता की विरासत से आगे बढ़कर नीतिगत बदलाव करने पड़े. इसके साथ ही परिवारवाद की राजनीति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि जब परिवार के भीतर ही सत्ता और नेतृत्व को लेकर टकराव होता है तो पार्टी टूटने की कगार पर पहुंच जाती है. आगे महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार का उदाहरण है.
उद्धव ठाकरे, अजित पवार और टूटता परिवारवाद
महाराष्ट्र में शिवसेना इसका ताजा उदाहरण है, जहां बाल ठाकरे की विरासत उद्धव ठाकरे के पास रही, लेकिन संगठन पर पकड़ कमजोर पड़ते ही एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी और पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शरद पवार की छाया में पले अजित पवार ने अलग राह चुन ली और पार्टी का बड़ा हिस्सा तोड़कर ले गए. यही कहानी हरियाणा की इंडियन नेशनल लोकदल में भी दिखी, जहां चौटाला परिवार की आपसी खींचतान ने पार्टी को हाशिये पर पहुंचा दिया. पंजाब में अकाली दल भी बादल परिवार तक सिमटकर रह गया, नतीजा यह हुआ कि उसका जनाधार लगातार कमजोर होता गया. ये उदाहरण बताते हैं कि जब पार्टी व्यक्ति और परिवार से बड़ी नहीं बन पाती तो नेतृत्व का संकट सिर्फ ठहराव नहीं, बल्कि टूट और बिखराव में बदल जाता है.
तेजस्वी यादव कार्यकारी अध्यक्ष बने, लेकिन क्या राजद परिवारवाद से बाहर सोच पाएगी?
रोहिणी-तेज प्रताप प्रकरण- घर का संकट, पार्टी का नुकसान
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल में नेतृत्व का संकट सिर्फ संगठनात्मक नहीं, बल्कि पारिवारिक स्तर पर भी खुलकर सामने आ चुका है. जब पार्टी व्यक्ति और परिवार से बड़ी नहीं बन पाती, तो मतभेद विचारधारा के बजाय रिश्तों के टकराव में बदल जाते हैं. तेज प्रताप यादव को पार्टी और परिवार से बाहर किया जाना और फिर रोहिणी आचार्य का सार्वजनिक रूप से लालू परिवार से रिश्ते तोड़ लेना इसी टूट का उदाहरण है. जिस रोहिणी आचार्य ने अपने पिता को किडनी देकर नया जीवन दिया, वही बेटी जब पार्टी के नेतृत्व और दिशा पर सवाल उठाती है, तो उसे हाशिये पर धकेल दिया जाता है. तेज प्रताप को अनुशासनहीनता के नाम पर बाहर करना और रोहिणी की वैचारिक असहमति को ‘बगावत’ करार देना यह बताता है कि आरजेडी में बहस और असहमति के लिए कोई संस्थागत स्पेस नहीं बचा है. नतीजा यह हुआ कि परिवार की दरार सार्वजनिक हो गई और पार्टी की साख पर सीधा असर पड़ा.
तेजस्वी के सामने असली चुनौती
राजद में लालू परिवार के भीतर की अंदरुनी संघर्ष वाला प्रकरण साफ संकेत देता है कि जब संगठन व्यक्ति से ऊपर नहीं होता, तो नेतृत्व मजबूत होने के बजाय और ज्यादा संकुचित होता चला जाता है. दरअसल, नई पीढ़ी के मतदाता व्यक्ति नहीं, विचार और अवसर देखते हैं. जब पार्टी में आगे बढ़ने का रास्ता बंद दिखता है तो युवा नेतृत्व उससे दूर हो जाता है. यही वह मोड़ होता है, जहां पार्टी का भविष्य ठहराव में बदल जाता है. तेजस्वी यादव के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सत्ता पाना नहीं, बल्कि पार्टी को परिवार से आगे ले जाना है. अगर वह संगठन में नए चेहरों को मौका देते हैं और आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करते हैं तो यह ताजपोशी एक नए अध्याय की शुरुआत बन सकती है. अन्यथा यह वही पुरानी कहानी साबित होगी, जो कई क्षेत्रीय दलों के सीमित भविष्य का कारण बनी है.