Inspirational love story | Babu Lohar story | बीमार पत्नी को ठेला-रिक्शा पर 600 किमी ले गए बाबू लोहार

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हड्डियां कंपकंपाने वाली ठंड, फिज़ा में चारों तरफ छाया कोहरा, फिर भी 70 साल के बुजुर्ग बाबू लोहार का दिल नहीं डगमगाया. बाबू लोहार ने अपनी बीमार पत्नी को इलाज के लिए ठेला-रिक्शा पर बैठाकर संबलपुर से कटक तक करीब 300 किलोमीटर का सफर पैडल मारकर पूरा किया और अब उसी तरह पत्नी को लेकर घर लौट रहे हैं.

दरअसल बाबू लोहार की पत्नी ज्योति को पिछले साल नवंबर में लकवा मार गया था. संबलपुर स्थित मोडीपाड़ा गांव के स्थानीय डॉक्टरों ने उन्हें कटक स्थित राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एससीबी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल रेफर कर दिया. बाबू लोहार के पास एंबुलेंस या किसी वाहन के लिए पैसे नहीं थे. ऐसे में बाबू ने अपनी रोज़ी-रोटी का सहारा बने ठेले को ही जीवनरक्षक साधन बना लिया.

‘जिंदगी के दो ही प्यार’

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक बाबू लोहार कहते हैं, ‘मेरी जिंदगी में दो ही प्यार हैं. एक मेरी पत्नी, जिसे मैं सुरक्षित घर ले जा रहा हूं, और दूसरा मेरा ठेला. मैं दोनों को छोड़ नहीं सकता.’ उन्होंने अपने ठेले पर पुराने गद्दे बिछाए, पत्नी को लिटाया और भगवान का नाम जपते हुए सफर पर निकल पड़े. रोज़ करीब 30 किलोमीटर का सफर तय करते, रात में सड़क किनारे दुकानों के पास रुक जाते. कड़ाके की ठंड, थका देने वाली उम्र और खाली जेब… कुछ भी उनके हौसले को नहीं तोड़ पाया. 9 दिनों की कठिन यात्रा के बाद वह कटक अस्पताल पहुंचे.

करीब दो महीने तक अस्पताल में ज्योति का इलाज चला. इलाज पूरी होने के बाद 19 जनवरी को बाबू लोहार ने उसी ठेले पर पत्नी को बिठाकर वापसी का सफर शुरू कर दिया.

किस्मत ने ली एक और परीक्षा

इस बीच किस्मत ने एक और परीक्षा ली. कटक के टांगी इलाके में एक वाहन ओवरटेक करते समय ठेले से रगड़ खा गया, जिससे ज्योति सड़क पर गिर पड़ीं और सिर में चोट लग गई. बाबू घबराए नहीं. तुरंत पत्नी को पास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां जख्म पर पट्टी की गई. अस्पताल प्रशासन ने उन्हें खाना दिया और ठंड से बचाने के लिए रात वहीं रुकने दिया. अगले दिन, 20 जनवरी को वे फिर से अपने सफर पर निकल पड़े.

पुलिस की मदद भी ठुकराई

रास्ते में पुलिस ने भी मदद की पेशकश की. टांगी थाने के एसएचओ बिकाश सेठी ने उनके लिए वाहन की व्यवस्था कराने का प्रस्ताव रखा, लेकिन बाबू लोहार ने विनम्रता से मना कर दिया. बाद में पुलिस के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने सिर्फ खाने के लिए थोड़ी मदद स्वीकार की.

बाबू कहते हैं, ‘मेरी ज्योति मेरी दुनिया है. जब तक सांस है, मैं उसे ठेले पर ही घर ले जाऊंगा.’ उनकी आंखों में आंसू हैं, लेकिन चेहरे पर संतोष. ठंड की हवा में पैडल मारते हुए वे भगवान का नाम जप रहे हैं. रास्ते में लोग मदद की पेशकश करते हैं, लेकिन बाबू मुस्कुराकर कहते हैं… ‘धन्यवाद, लेकिन मेरा काम मेरा है.’

बाबू लोहार की यह यात्रा सिर्फ 600 किलोमीटर की दूरी नहीं, बल्कि उस अटूट प्रेम की कहानी है, जो न उम्र देखता है, न गरीबी और न ही हालात. ठेले के पैडल के साथ घूमते उनके कदम यह साबित करते हैं कि जब साथ निभाने का जज्बा हो, तो हर रास्ता आसान हो जाता है. बाबू लोहार जैसे लोग आज के दौर में दुर्लभ हैं. उनकी यह यात्रा हमें सिखाती है कि सच्चा प्यार पैसों या सुविधाओं से नहीं, बल्कि जज्बे से निभाया जाता है. बाबू अपनी पत्नी ज्योति को रिक्शे पर, प्यार पर, और भरोसे पर बैठाकर अब घर की ओर बढ़ रहे हैं.

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