16 बैंक खातों से उड़ गए 23 करोड़; पढ़े-लिखे लोग भी झांसे में आ रहे, CJI की बेंच में आया ‘डिजिटल अरेस्ट’ केस

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर हो रही ठगी के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि पढ़े-लिखे, अनुभवी और वरिष्ठ नागरिक भी ऐसे जालसाजों के झांसे में आकर उनकी हर बात मान लेते हैं, यह बेहद चौंकाने वाला है. प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने टिप्पणी की, “हम यह देखकर स्तब्ध हैं कि लोग किस तरह व्यवहार कर रहे हैं. जब इस तरह की कॉल आती है, तो लोग बिना सोचे-समझे उनके निर्देश मान लेते हैं. आमतौर पर उम्र के साथ व्यक्ति अनुभव और समझ हासिल करता है.”

यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जो 78 वर्षीय पूर्व बैंकर नरेश मल्होत्रा ने दायर की है. मल्होत्रा सितंबर 2023 में ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड का शिकार हुए थे और उन्होंने ₹23 करोड़ से अधिक की रकम गंवाई थी. यह अब तक सामने आया सबसे बड़ा डिजिटल अरेस्ट ठगी का मामला माना जा रहा है. इस घोटाले का खुलासा सबसे पहले सितंबर में हिंदुस्तान टाइम्स ने किया था, जिसके बाद मल्होत्रा ने अपने साथ हुई ठगी को लेकर इंटरव्यू भी दिया था.

याचिका में बैंकों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे इस तरह की ठगी से बचाव के लिए सुरक्षा उपाय तय करें, जिनमें संदिग्ध और उच्च मूल्य के लेन-देन पर अलर्ट जारी करना शामिल हो. हालांकि, ये मुद्दे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) मामले में विचाराधीन हैं. मामले के तथ्यों को देखने के बाद पीठ ने कहा, “यह बेहद निराशाजनक है कि इस तरह की कॉल आने पर कोई व्यक्ति अपनी समझ कैसे खो सकता है.”

हालांकि, कोर्ट ने मल्होत्रा की याचिका को सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लंबित सुओ मोटो कार्यवाही के साथ जोड़ दिया. उस सुओ मोटो मामले में कोर्ट ने एक वरिष्ठ नागरिक दंपती के पत्र का संज्ञान लिया था, जिनसे प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारी बनकर आए ठगों ने ₹1 करोड़ से अधिक की ठगी की थी. कोर्ट ने तब टिप्पणी की थी कि सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिकों को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है और उनकी जीवनभर की जमा पूंजी लूटी जा रही है.

इस सुओ मोटो मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही सभी समान डिजिटल ठगी मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप चुका है. वहीं, केंद्र सरकार ने भी पुलिस, बैंकों, दूरसंचार कंपनियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच बेहतर समन्वय के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है, ताकि ऐसे अपराधों पर रोक लगाई जा सके.

मल्होत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर, अधिवक्ता नूपुर शर्मा की सहायता से पेश हुए. उन्होंने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता विधुर हैं, घटना के समय घुटने की सर्जरी से उबर रहे थे और उनके बच्चे विदेश में रहते हैं. उन्होंने तर्क दिया कि बैंकों पर खाताधारकों के प्रति देखभाल का दायित्व (ड्यूटी ऑफ केयर) है और मल्होत्रा मुआवजे से जुड़े उपायों के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) का रुख करेंगे.

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उसने पहले ही CBI से संभावित बैंक अधिकारियों की भूमिका की जांच करने को कहा है, लेकिन यह सवाल भी उठाया कि इतनी बड़ी रकम का ट्रांसफर कैसे संभव हुआ. इस पर परमेश्वर ने जवाब दिया कि यह ठगी पूरी तरह योजनाबद्ध थी. ठगों ने मल्होत्रा के लैंडलाइन नंबर पर संपर्क किया था और उनके पास उनकी निजी जानकारी का विस्तृत ब्यौरा था.

याचिका के अनुसार, ठगी की शुरुआत 1 अगस्त 2023 को हुई, जब मल्होत्रा को एक कॉल आई और बाद में उन्हें व्हाट्सएप पर मुंबई पुलिस का कथित गिरफ्तारी आदेश दिखाया गया. खुद को मुंबई पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) का अधिकारी बताने वाले ठगों ने उन पर आतंकी फंडिंग से जुड़े होने का आरोप लगाया और उन्हें अपनी संपत्तियां बेचकर लगभग ₹23 करोड़ की रकम 16 अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया. मल्होत्रा को बताया गया कि ये खाते भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से जुड़े हैं.

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