Hindu vote bank Kerala: केरल में नायर और ईझावा कम्युनिटी आ गए साथ, तो बीजेपी की हो जाएगी मौज, लेफ्ट के गढ़ में खिलेगा कमल
केरल में क्या कभी बीजेपी सरकार बना पाएगी? कई लोग मानते हैं कि फिलहाल तो यह मुश्किल है. क्योंकि वहां की पॉलिटिक्स में कई पेच है. पश्चिम बंगाल के बाद केरल ही वो गढ़ है, जहां बीजेपी अब तक सरकार नहीं बना पाई है. इसलिए अगला टारगेट केरल ही है. हाल ही में वोट बाइट का एक सर्वे आया है, जो कहता है कि बीजेपी तेजी से केरल में अपनी पहचान बना रही है. कांग्रेस और वाम गठबंधन के बाद वह सबसे बड़ी ताकत है. उसे 20 फीसदी तक वोट मिल सकते हैं. लेकिन हम आपको वहां की एक और सच्चाई बता रहे हैं. केरल में हिन्दूओं की आबादी अच्छी खासी है. वहां नायर और ईझावा कम्युनिटी काफी प्रभावशाली हैं. अगर ये दोनों बीजेपी के साथ आ गए तो लेफ्ट के गढ़ में कमल खिलाने से बीजेपी को कोई नहीं रोक सकता. आइए इसे कुछ फैक्ट से समझने की कोशिश करते हैं.
केरल की कुल आबादी में हिंदू लगभग 54-55% हैं. इसमें ईझावा समुदाय सबसे बड़ा हिंदू समूह है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग 23% है. वहीं, नायर समुदाय दूसरा सबसे बड़ा प्रभावशाली समूह है, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 14-15% मानी जाती है. अगर इन दोनों को मिला दिया जाए, तो ये राज्य की कुल आबादी का करीब 37-38% और कुल हिंदू आबादी का लगभग 70-80% हिस्सा बनते हैं. यही कारण है कि नंबर गेम में ये दोनों समुदाय सबसे शक्तिशाली हैं.
कितने सांसद और विधायक?
केरल विधानसभा की 140 सीटों में इन दोनों समुदायों का वर्चस्व हमेशा रहता है. 2021 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो जीते हुए विधायकों में सबसे बड़ी संख्या ईझावा समुदाय की थी. लगभग 25-28 विधायक इसी कम्युनिटी से हैं.
उसके बाद नायर समुदाय के प्रतिनिधि हैं. 22 विधायक इसी कम्युनिटी से आते हैं. फिर मुस्लिम और ईसाई समुदाय आते हैं. हालांकि, यह संख्या हर चुनाव में पार्टी के टिकट वितरण के हिसाब से थोड़ी ऊपर-नीचे होती रहती है, लेकिन औसतन विधानसभा का लगभग 35-40% हिस्सा इन्हीं दो समुदायों के प्रतिनिधियों से भरा होता है. मंत्रिमंडल में भी इन समुदायों को हमेशा भारी-भरकम पोर्टफोलियो दिए जाते हैं.
राजनीति में दखल: NSS और SNDP की ताकत
इन दोनों समुदायों का राजनीतिक दखल इनके सामाजिक संगठनों नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) और एसएनडीपी योगम (SNDP) के माध्यम से चलता है. NSS के महासचिव और SNDP के प्रमुख का प्रभाव इतना है कि चुनाव के समय मुख्यमंत्री से लेकर विपक्ष के नेता तक इनका समर्थन मांगने इनके मुख्यालय जाते हैं. ये संगठन सैकड़ों स्कूल, कॉलेज और अस्पताल चलाते हैं, जिससे इनका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी बहुत गहरा है.
किस समुदाय का किस पार्टी की ओर झुकाव?
- पारंपरिक रूप से, ईझावा समुदाय को कम्युनिस्ट पार्टियों यानी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF ) का सबसे बड़ा ‘वोट बैंक’ माना जाता है; कहा जाता है कि वामपंथी दलों का कैडर बेस ईझावा समुदाय से ही आता है.
- दूसरी ओर, नायर समुदाय का झुकाव ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की तरफ रहा है, क्योंकि वे वामपंथ की विचारधारा से कम मेल खाते हैं.
- हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव आया है. नायर समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अब बीजेपी की ओर शिफ्ट हो रहा है, और ईझावा समुदाय को लुभाने के लिए बीजेपी ने SNDP के राजनीतिक विंग (BDJS) के साथ गठबंधन (NDA) किया है.
अगर दोनों साथ आ जाएं तो BJP सरकार क्यों बना सकती है?
केरल में बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता इन दोनों के मिलन से ही खुलता है, इसके पीछे का गणित सीधा है. केरल में मुस्लिम और ईसाई आबादी लगभग 45% है, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी को वोट नहीं देती. ऐसे में बीजेपी को जीतने के लिए बहुसंख्यक हिंदू वोटों के ‘ध्रुवीकरण’ की जरूरत है. वर्तमान में हिंदू वोट एलडीएफ, यूडीएफ और बीजेपी में बंटा हुआ है. यदि ईझावा और नायर एकजुट होकर बीजेपी को वोट दें, तो बीजेपी का वोट शेयर 35-40% के पार जा सकता है. त्रिकोणीय मुकाबले में 35% वोट शेयर सरकार बनाने के लिए पर्याप्त होता है. इसीलिए कहा जाता है कि जिस दिन ‘नायर और ईझावा’ की ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता खत्म होकर ‘हिंदू एकता’ में बदल जाएगी, उस दिन केरल में कमल खिलना तय हो जाएगा.