लंबी घुमावदार मूंछें और कंधे पर SLR राइफल, जानें वीरप्पन की खौफनाक कहानी, जिसकी बेटियां अब लहरा रहीं हैं परचम?

Share to your loved once


तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर सत्यमंगलम के घने जंगलों में खूंखार चंदन तस्कर वीरप्पन के आतंक का अंत हुए दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसका परिवार अब किस हाल में है? उसकी एक बेटी किस राजनीतिक पार्टी का झंडा थामे हुए है? दूसरी बेटी कानून की पढ़ाई कर क्या कर रही है? पत्नी मुथुलक्ष्मी जेल से बाहर आकर किस तरह से अपनी जिंदगी जी रही हैं? 90 के दशक में एक ऐसा नाम जिसे सुनकर उस दौर में पुलिस की वर्दी पसीने से भीग जाती थी. कूसे मुनिस्वामी वीरप्पन सिर्फ एक नाम नहीं था, बल्कि दक्षिण भारत के जंगलों में खौफ का एक ऐसा पर्याय था, जिसने तीन दशकों तक भारतीय कानून व्यवस्था को चुनौती दी. लंबी घुमावदार मूंछे, कंधे पर एसएलआर राइफल और आंखों में दरिंदगी, ये उसकी पहचान थी.

आज भी जब चमरजनगर या इरोड के जंगलों में हवाएं चलती हैं तो लोग वीरप्पन के उन किस्सों को याद कर सिहर उठते हैं, जहां उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं. दशकों तक दक्षिण भारत के जंगलों में अपनी समानांतर सरकार चलाने वाले चंदन तस्कर कूसे मुनिस्वामी वीरप्पन का अंत 18 अक्टूबर 2004 को ऑपरेशन ककून के जरिए हुआ था. वीरप्पन के मारे जाने के बाद एक बड़ा सवाल यह था कि क्या उसका परिवार भी उसी के नक्शेकदम पर चलेगा या फिर मुख्यधारा में शामिल होगा? आज, वीरप्पन की मौत के लगभग 22 साल बाद, उसके परिवार की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. जिस वीरप्पन ने अपनी बंदूक के दम पर कानून को ठेंगा दिखाया था, आज उसी की संतानें कानून की रक्षक और लोकतंत्र का हिस्सा बनकर उभरी हैं.

जेल की सलाखों से राजनीति के गलियारों तक

वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी की कहानी संघर्ष और विवादों से भरी रही है. साल 1990 में जब उनकी शादी वीरप्पन से हुई, तब वह महज 15 साल की थीं. शादी के बाद मुथुलक्ष्मी को वीरप्पन के साथ जंगलों में भी रहना पड़ा और पुलिस की प्रताड़ना का शिकार भी होना पड़ा. वीरप्पन की मौत के बाद, मुथुलक्ष्मी पर कई मुकदमे चले और उन्हें कई साल कर्नाटक और तमिलनाडु की जेलों में बिताने पड़े. साल 2011 में जेल से रिहा होने के बाद मुथुलक्ष्मी ने अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की. उन्होंने कई बार विधानसभा चुनाव लड़ने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें बड़ी सफलता नहीं मिली.

वीरप्पन की बेटियां क्या कर रही हैं?

वीरप्पन की बड़ी बेटी विद्या रानी आज तमिलनाडु की राजनीति में एक चर्चित चेहरा हैं. विद्या रानी ने अपने पिता के खौफनाक इतिहास से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है. उन्होंने कानून की पढ़ाई की है और पेशे से एक वकील हैं. फरवरी 2020 में विद्या रानी तब सुर्खियों में आईं, जब उन्होंने तमिलनाडु के कृष्णगिरी में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा. भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें पार्टी के राज्य युवा विंग का उपाध्यक्ष बनाया गया.

छोटी बेटी क्या कर रही है?

वीरप्पन की छोटी बेटी प्रभा भी अपनी बड़ी बहन की तरह शिक्षित और जागरूक हैं. प्रभा ने भी कानून की पढ़ाई की है. हालांकि, वह मीडिया और लाइमलाइट से काफी दूर रहना पसंद करती हैं. कुछ समय पहले वह तब चर्चा में आईं जब उन्होंने अपने पिता वीरप्पन के जीवन पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री के निर्माण को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. प्रभा चाहती हैं कि उनके परिवार के अतीत को व्यापारिक लाभ के लिए गलत तरीके से पेश न किया जाए. वह वर्तमान में अपनी कानूनी प्रैक्टिस और परिवार की देखरेख में व्यस्त हैं.

32 साल जेल में बिताने के बाद भाई की मौत

वीरप्पन का एक भाई माधयन भी था, जो उसके गैंग का हिस्सा माना जाता था. माधयन ने अपनी जिंदगी के 32 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारे. उसे साल 1987 में एक वन अधिकारी की हत्या और अन्य अपराधों के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. वह मैसूर की जेल में बंद था. लंबे समय तक जेल में रहने के बाद, मई 2022 में दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो गई.

वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को कर्नाटक के कोल्लेगल तालुक के गोपिनाथम गांव में हुआ था. वह एक साधारण परिवार से था, लेकिन जंगलों की रग-रग से वाकिफ था. महज 17 साल की उम्र में उसने अपना पहला हाथी मारा था. धीरे-धीरे शिकार का यह शौक एक खूंखार धंधे में बदल गया. वीरप्पन ने अपने जीवनकाल में 2000 से ज्यादा हाथियों का शिकार किया ताकि वह उनके दांत बेच सके. इसके बाद उसने लाल चंदन की तस्करी शुरू की. अनुमान है कि उसने 140 करोड़ रुपये से अधिक की चंदन की लकड़ी की तस्करी की थी. लेकिन उसे केवल धन की चाहत नहीं थी, उसे सत्ता और डर का साम्राज्य बनाना था.

जब अधिकारी का सिर काटकर खेला गया फुटबॉल

वीरप्पन की दरिंदगी का सबसे खौफनाक अध्याय साल 1991 में लिखा गया. भारतीय वन सेवा (IFS) के एक जांबाज अधिकारी पी. श्रीनिवास वीरप्पन के लिए काल बने हुए थे. श्रीनिवास ने वीरप्पन को पकड़ने के लिए बंदूक के बजाय विश्वास का रास्ता चुना था. उन्होंने वीरप्पन के गांव में मंदिर बनवाया और लोगों की मदद की ताकि वह सरेंडर कर दे. वीरप्पन ने इसे अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि एक मौका समझा. उसने श्रीनिवास को झांसा दिया कि वह आत्मसमर्पण करना चाहता है और उन्हें जंगल में अकेले मिलने के लिए बुलाया. जैसे ही श्रीनिवास वहां पहुंचे, वीरप्पन और उसके गुर्गों ने उन्हें पकड़ लिया. वीरप्पन ने न केवल श्रीनिवास की हत्या की, बल्कि उनके शव के साथ जो किया वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था. उसने श्रीनिवास का सिर धड़ से अलग कर दिया और उसे अपने घर ले गया. कहा जाता है कि वीरप्पन के गैंग के सदस्यों ने उस कटे हुए सिर के साथ फुटबॉल खेला था.

अपनी ही बेटी की चढ़ा दी ‘बलि’

वीरप्पन कितना पत्थर दिल था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने अपने स्वार्थ के लिए अपनी ही संतान को नहीं बख्शा. एक बार पुलिस और एसटीएफ की टीम ने वीरप्पन को चारों तरफ से घेर लिया था. वीरप्पन अपनी पत्नी मुथुलक्ष्मी और अपनी नवजात बच्ची के साथ जंगल में छिपा हुआ था. तभी बच्ची जोर-जोर से रोने लगी. वीरप्पन को डर था कि बच्ची के रोने की आवाज सुनकर पुलिस उन तक पहुंच जाएगी. अपनी जान बचाने के लिए उस हैवान ने अपनी ही दुधमुंही बेटी का गला दबाकर उसे मौत की नींद सुला दिया. उसने अपनी बेटी की हत्या महज इसलिए कर दी ताकि उसकी खुद की लोकेशन एक्सपोज न हो.

वीरप्पन को पकड़ने के लिए सरकारों ने स्पेशल टास्क फोर्स (STF) बनाई और करोड़ों रुपये खर्च किए. साल 2004 में आईपीएस विजय कुमार के नेतृत्व में ऑपरेशन ककून चलाया गया. पुलिस को पता चला कि वीरप्पन की आंखों में समस्या है और वह इलाज के लिए जंगल से बाहर आने वाला है. पुलिस ने एक एम्बुलेंस को जाल के रूप में इस्तेमाल किया. 18 अक्टूबर 2004 को धर्मपुरी के पास एक मुठभेड़ में वीरप्पन को मार गिराया गया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

GET YOUR LOCAL NEWS ON NEWS SPHERE 24      TO GET PUBLISH YOUR OWN NEWS   CONTACT US ON EMAIL OR WHATSAPP