पाकिस्तान के ‘इस्लामिक NATO’ की भारत निकालेगा हवा, UAE के साथ हुई ऐसी डील, सऊदी अरब और तुर्की हो जाएंगे बेबस – India UAE defence and rupees 18187410000000 trade partnership Pakistan sponsored Islamic nato Saudi Arabia Turkiye
India-UAE Defence Partnership: आतंकवाद को स्टेट पॉलिसी बनाने वाला पाकिस्तान इन दिनों ‘फाइटर जेट डिप्लोमेसी’ को लेकर खूब प्रोपेगेंड कर रहा है. इस्लामाबाद चीन के सहयोग से डेवलप J-17 थंडर फाइटर जेट को बेचकर ‘इस्लामिक नाटो’ बनाने का प्रयास कर रहा है. इसमें सऊदी अरब और तुर्की भी शामिल है. हालांकि, ट्राएंगुलर स्ट्रैटजिक ट्रिटी को लेकर अभी तक किसी तरह की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है. अब भारत ने पाकिस्तान समर्थित ‘इस्लामिक NATO’ की हवा निकालने की मुकम्मल व्यवस्था कर दी है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मदबिन जायद अल नाहयान अपने परम मित्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने महज कुछ घंटों के लिए 19 जनवरी 2026 को नई दिल्ली पहुंचे. पीएम मोदी और अल नाहयान के बीच कुछ घंटों की मुलाकात में पाकिस्तान-सऊदी अरब-तुर्की की तिकड़ी की हवा निकालने की स्क्रिप्ट लिख दी गई. भारत और यूएई के बीच सामरिक रूप से महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हुए हैं. वहीं, आने वाले 6 साल में द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर यानी ₹1818741 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान का फॉरेक्स रिजर्व (विदेशी मुद्रा भंडार) दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार महज 21 बिलियन डॉलर ही है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था किस हालत में है, इस आंकड़े से उसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच रक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी को नई ऊंचाई देने का फैसला केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं है. इसे पश्चिम एशिया और व्यापक क्षेत्र में पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य सक्रियता और बदलते गठबंधनों के प्रति भारत की सोची-समझी रणनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. हाल ही में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की दो घंटे की राजकीय यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा सुरक्षा, उन्नत कंप्यूटिंग और निवेश समेत कई क्षेत्रों में समझौतों की घोषणा की, जिनमें सबसे अहम रहा ‘रणनीतिक रक्षा साझेदारी’ पर लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर. इस यात्रा में भारत और यूएई ने साल 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक दोगुना करने का लक्ष्य भी तय किया. रक्षा सहयोग के मोर्चे पर यह समझौता रक्षा निर्माण, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और क्षमताओं के संयुक्त विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. दोनों देशों ने नियमित सैन्य अभ्यासों, सेवा प्रमुखों के दौरों और रक्षा संवाद के जरिए बनी गति को औपचारिक रूप देने का संकेत दिया है.
इंडिया-UAE के बीच करार अहम क्यों?
इस रक्षा साझेदारी का समय विशेष महत्व रखता है. क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और पाकिस्तान दक्षिण एशिया से बाहर अपनी सैन्य कूटनीति और रक्षा पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में हथियार निर्यात, संयुक्त अभ्यास और सैन्य समन्वय के जरिए पाकिस्तान अपनी भूमिका को एक उभरते सुरक्षा भागीदार के तौर पर स्थापित करना चाहता है. ऐसे में भारत-UAE रक्षा गठजोड़ को नई रणनीतिक गहराई देने वाला कदम माना जा रहा है. भारत और UAE ने आतंकवाद के खिलाफ भी एक स्पष्ट और सख्त संदेश दिया. दोनों देशों ने सीमा पार आतंकवाद समेत हर तरह के आतंकवाद की निंदा करते हुए कहा कि इसके दोषियों, फाइनेंसर्स और समर्थकों को न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए. साथ ही टेरर फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक के लिए फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) के तहत सहयोग को मजबूत करने पर सहमति बनी.
India-UAE Defence Partnership: UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान कुछ घंटों की यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. (फोटो: PTI)
‘इस्लामिक NATO’ को जवाब
पाकिस्तान की हालिया पहलें बताती हैं कि भारत खाड़ी देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत क्यों कर रहा है. पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच एक संभावित त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर लगभग एक साल से बातचीत चल रही है. हालांकि, तुर्की ने अब तक किसी औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं की है, लेकिन प्रस्तावित ढांचा क्षेत्रीय अस्थिरता, आतंकवाद और कथित बाहरी हेजेमनी के खिलाफ समन्वित प्रतिक्रिया की बात करता है. यदि यह गठबंधन औपचारिक रूप लेता है, तो पश्चिम एशिया और उससे आगे के सुरक्षा समीकरणों में उल्लेखनीय बदलाव आ सकता है. पाकिस्तान इस तरह से इस्लामिक नाटो बनाने की कोशिश कर रहा है, ताकि संघर्ष के समय रक्षा सहयोग को बढ़ाया जा सके. अब भारत ने बड़ी ही चतुराई से पड़ोसी देश के इस कोशिश को नाकाम करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है. खाड़ी के देशों से भारत लगातार अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है.
भारत-UAE रक्षा साझेदारी क्यों अहम मानी जा रही है?
यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं, बल्कि पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य सक्रियता और क्षेत्रीय गठबंधनों के जवाब में भारत की रणनीतिक पहल मानी जा रही है. इससे भारत को पश्चिम एशिया में सुरक्षा और प्रभाव दोनों मजबूत करने का मौका मिलता है.
हालिया भारत-UAE समझौतों में क्या खास रहा?
UAE राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा निर्माण, तकनीक हस्तांतरण और क्षमता विकास के लिए रणनीतिक रक्षा साझेदारी पर सहमति जताई. साथ ही 2032 तक व्यापार 200 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य तय हुआ.
पाकिस्तान के कदम इस साझेदारी को कैसे प्रभावित करते हैं?
पाकिस्तान सऊदी अरब और तुर्की के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौते की कोशिश कर रहा है और जेएफ-17 लड़ाकू विमान के जरिए हथियार निर्यात बढ़ा रहा है. इससे क्षेत्रीय संतुलन बदल सकता है, जिसे भारत अपनी रणनीतिक गहराई से संतुलित करना चाहता है.
भारत की रणनीति क्या है?
भारत अल्पकालिक हथियार सौदों के बजाय दीर्घकालिक रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास, आतंकवाद विरोधी समन्वय और अंतरिक्ष सहयोग के जरिए UAE के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बना रहा है, जिससे क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा को बढ़ावा मिले.
‘फाइटर जेट डिप्लोमेसी’ का कितना असर?
इसके समानांतर पाकिस्तान अपने चीन के साथ संयुक्त रूप से विकसित हल्के लड़ाकू विमान जेएफ-17 थंडर को आक्रामक ढंग से बढ़ावा दे रहा है. हाल के हफ्तों में यह विमान क्षेत्रीय रक्षा चर्चाओं में प्रमुखता से उभरा है. पाकिस्तान बांग्लादेश के साथ जेएफ-17 की संभावित बिक्री पर औपचारिक बातचीत कर रहा है. वहीं, रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी अरब करीब दो अरब डॉलर के ऋण को जेएफ-17 सौदे में बदलने पर विचार कर रहा है, जिसे व्यापक सैन्य साझेदारी का हिस्सा माना जा रहा है. इंडोनेशिया के साथ भी पाकिस्तान ने एक रक्षा पैकेज पर बातचीत की है, जिसमें 40 से अधिक जेएफ-17 विमानों की आपूर्ति शामिल हो सकती है. इराक ने भी इस विमान और उससे जुड़े समर्थन प्रणालियों में रुचि दिखाई है. ये सभी घटनाक्रम पाकिस्तान की उस कोशिश को दर्शाते हैं, जिसके तहत वह एशिया और मध्य पूर्व में एक हथियार आपूर्तिकर्ता और सुरक्षा भागीदार के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है. हालांकि, अभी यह देखना बाकी है कि पाकिस्तान और चीन की फाइटर जेट डिप्लोमेसी कितना असर छोड़ता है, क्योंकि चीनी माल अपने दोयम दर्जे को लेकर दुनियाभर में कुख्यात है.
समझें भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया
भारत ने पाकिस्तान की इन पहलों का सीधा मुकाबला करने के बजाय रणनीतिक गहराई बनाने का रास्ता चुना है. भारत-यूएई रक्षा साझेदारी का मकसद केवल हथियार सौदों तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक सहयोग, संयुक्त निर्माण, तकनीकी विकास और क्षमताओं के साझा निर्माण को बढ़ावा देना है. इससे दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में विश्वास और निर्भरता का रिश्ता मजबूत होगा. भारत और UAE के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग पहले ही व्यापक रणनीतिक साझेदारी का अहम स्तंभ बन चुका है. आर्मी, नेवी और एरफोर्स स्तर पर नियमित अभ्यासों ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग क्षमता को बढ़ाया है. वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के नियमित संवाद से साझा खतरों और सुरक्षा चुनौतियों पर बेहतर समन्वय संभव हुआ है.
अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक में सहयोग
रक्षा के साथ-साथ अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में भी साझेदारी को नई गति मिली है. भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) और UAE स्पेस एजेंसी के बीच अंतरिक्ष उद्योग विकास और वाणिज्यिक सहयोग (Commercial Co-Operation) को बढ़ावा देने के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं. इसका उद्देश्य निजी क्षेत्र की भागीदारी, संयुक्त उपक्रमों और स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर एवं डाउनस्ट्रीम अनुप्रयोगों में सहयोग को बढ़ाना है. यह सहयोग भारत-UAE संबंधों को केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित न रखकर उच्च तकनीक, इनोवेशन और भविष्य की क्षमताओं तक विस्तारित करता है. इससे दोनों देशों को रक्षा और सुरक्षा से जुड़ी अत्याधुनिक तकनीकों में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी.
क्षेत्रीय संतुलन पर प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-यूएई रक्षा साझेदारी पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करेगी और उसे क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में स्थापित करेगी. वहीं, पाकिस्तान की बढ़ती रक्षा कूटनीति के बीच यह कदम भारत को अपने हितों की रक्षा और संतुलन बनाए रखने में मदद करेगा. UAE के साथ मजबूत रक्षा संबंध भारत को खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर भी अधिक प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर देंगे. इसके साथ ही यह साझेदारी भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा निर्यात नीति को भी गति दे सकती है.
क्या होगा आगे?
आने वाले वर्षों में भारत-UAE रक्षा सहयोग के तहत संयुक्त अनुसंधान, को-प्रोडक्शन, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं सामने आने की उम्मीद है. इससे दोनों देशों की सेनाओं की परिचालन क्षमता बढ़ेगी और क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान मिलेगा. भारत और UAE के बीच गहराता रक्षा सहयोग केवल द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की बदलती रणनीतिक चालों के बीच भारत की संतुलित और दूरदर्शी प्रतिक्रिया का संकेत भी देता है. बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में यह साझेदारी आने वाले समय में भारत की रणनीतिक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकती है.