student not interested in studies। पढ़ाई में मन लगाने वाला उपाय
Study Remedies: आज के समय में बहुत से माता-पिता एक ही परेशानी से जूझ रहे हैं. बच्चा पढ़ाई में कमजोर होता जा रहा है, किताब खोलते ही उसका ध्यान मोबाइल, खेल या किसी और चीज़ की तरफ चला जाता है. समझाने पर भी असर नहीं होता, डांटने पर बात और बिगड़ जाती है. ऐसे में गार्जियन अकसर ट्यूशन, कोचिंग और महंगे कोर्स का सहारा लेते हैं, फिर भी मनचाहा नतीजा नहीं मिलता. हमारी सनातन परंपरा में बच्चों के मन, सोच और ऊर्जा से जुड़े कई ऐसे उपाय बताए गए हैं, जिनका मकसद डर या दबाव नहीं बल्कि संतुलन बनाना होता है. इन्हीं में से एक बात गौमूत्र से जुड़े प्रयोग को लेकर भी कही जाती है. यह कोई नई सोच नहीं है, बल्कि बहुत पुरानी मान्यता है, जिसे आज भी कई परिवार अपनाते हैं. यहां बात जबरदस्ती या अंधविश्वास की नहीं, बल्कि विश्वास जगाने और बच्चे के मन को स्थिर करने की है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.
जब बच्चा पढ़ाई से भागने लगे
कई बार बच्चे पढ़ाई से इसलिए दूर हो जाते हैं क्योंकि उनका मन इधर-उधर भटकने लगता है. स्कूल का दबाव, दोस्तों का असर, मोबाइल और वीडियो गेम इस भटकाव को और बढ़ा देते हैं. ऐसे में सिर्फ डांट या सजा काम नहीं आती. जरूरत होती है बच्चे के मन को शांत करने की, ताकि वह खुद पढ़ाई की तरफ लौटे.
सनातन परंपरा में गौमूत्र का स्थान
सनातन संस्कृति में गाय को बहुत सम्मान दिया गया है. गाय से जुड़ी चीज़ों को शुद्धता और ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है. गौमूत्र को भी इसी नजर से देखा जाता है. मान्यता है कि इसमें ऐसी शक्ति होती है जो आसपास के माहौल और इंसान के मन पर असर डालती है. यही वजह है कि पुराने समय में घर, आंगन और पूजा स्थान पर इसका छिड़काव किया जाता था.
बच्चों के लिए बताया गया तरीका
यहां सबसे अहम बात समझने वाली है कि बच्चे को गौमूत्र पिलाने की बात नहीं कही जाती. पहले बच्चे को इसके बारे में बताया जाता है, उसकी सोच में डर नहीं बल्कि भरोसा पैदा किया जाता है. जब बच्चा समझने लगे, तब स्नान के बाद हल्के तरीके से उसके ऊपर छिड़काव किया जाता है. यह छिड़काव सीधे हाथ से नहीं, बल्कि दूब घास या आम के पत्ते से किया जाता है. माना जाता है कि ऐसा करने से बच्चे के मन में सकारात्मक बदलाव आता है और उसका ध्यान धीरे-धीरे पढ़ाई की तरफ लौटने लगता है.
विश्वास का रोल सबसे बड़ा
इस पूरे प्रयोग में सबसे जरूरी चीज़ है विश्वास. अगर माता-पिता खुद मन से इस पर भरोसा नहीं करते, तो बच्चे पर इसका असर भी नहीं होता. सनातन परंपरा हमेशा कहती है कि कोई भी उपाय बिना आस्था के अधूरा होता है. जब बच्चे को यह महसूस होता है कि माता-पिता उसके भले के लिए कुछ कर रहे हैं, तो उसका मन भी खुलने लगता है.
खान-पान से जुड़ी सावधानी
इस प्रयोग के साथ खान-पान पर भी खास ध्यान देने की बात कही जाती है. मान्यता के अनुसार बच्चे को नॉनवेज खाने से दूर रखा जाए. सिर्फ बच्चा ही नहीं, बल्कि माता-पिता भी अगर साथ निभाएं तो असर ज्यादा देखने को मिलता है. इसका मकसद शरीर और मन दोनों में हल्कापन लाना माना जाता है.
जबरदस्ती नहीं, समझदारी जरूरी
यह बात बार-बार दोहरानी जरूरी है कि यह कोई इलाज नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ा प्रयोग है. बच्चे पर किसी तरह का दबाव या डर नहीं बनाया जाना चाहिए, अगर बच्चा सहज नहीं है, तो पहले उससे बात करना ज्यादा जरूरी है. परंपराएं तभी काम करती हैं जब उन्हें समझदारी और प्यार के साथ अपनाया जाए.
आधुनिक सोच और पुरानी परंपरा का संतुलन
आज का दौर बदल चुका है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुरानी परंपराएं बेकार हो गई हैं. सही तरीका यह है कि आधुनिक शिक्षा और सनातन सोच के बीच संतुलन बनाया जाए. पढ़ाई के लिए सही माहौल, प्यार, समझ और विश्वास-इन सबका मेल ही बच्चे को आगे बढ़ने में मदद करता है.