डासना जेल में अनजान फोन से हड़कंप, जेल वार्डर से बोला- ‘तुम्हें पता है मैं कौन हूं? जेल अधीक्षक को लाओ फोन पर

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गाजियाबाद. रात के करीब 8:45 बज रहे थे. गाजियाबाद के डासना जिला कारागार का लैंडलाइन अचानक बज उठा. दूसरी तरफ से एक गंभीर, अधिकारपूर्ण आवाज गूंजी. ‘हैलो, मैं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग लखनऊ का संयुक्त सचिव अमित पांडेय बोल रहा हूं. जेल अधीक्षक को तुरंत फोन पर लाओ. मामला बहुत गंभीर है!’ कारागार में तैनात जेल वार्डर देवेंद्र कुमार शर्मा, जो उस वक्त गेट कीपर का भी प्रभार संभाल रहे थे, चौंक गए. आवाज में इतना दबदबा था कि लगा कोई बड़ा अधिकारी सच में बात कर रहा है. उसने कहा- ‘सर, अधीक्षक जी अवकाश पर हैं. उनका नंबर नहीं लग रहा?’ सामने वाले ने हकलाते हुए पूछा अवकाश? मुझे सब पता है!’ आवाज और उग्र हो गई. ‘तुम्हें पता है मैं कौन हूं? अगर तुरंत अधीक्षक से बात नहीं कराई तो मैं डीजी जेल से बात करूंगा. लखनऊ में हंगामा मचा दूंगा. पूरा कारागार मानवाधिकार आयोग में खड़ा हो जाएगा! सुबह 10 बजे सारी फाइलें तैयार रखना, मेरे साथ बात करनी है.

देवेंद्र के हाथ कांपने लगे. जेल में हड़कंप मच गया. अधीनस्थों ने जल्दबाजी में अधीक्षक को फोन लगाया. अधीक्षक ने उसी नंबर पर पूछा, ‘कौन बोल रहे हैं? सामने से जवाब आया अमित पांडेय, संयुक्त सचिव, NHRC लखनऊ. अधीक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘लेकिन NHRC का मुख्यालय तो दिल्ली में है, लखनऊ में संयुक्त सचिव का पद ही नहीं है!’ फोन कट गया. लेकिन कॉलर का मोबाइल नंबर ट्रेस हो चुका था. पुलिस ने जांच की. नंबर मेरठ के गंगानगर बी-55 निवासी अरुण कुमार मिश्रा का निकला. अरुण पहले भी धोखाधड़ी के कई मामलों में जेल जा चुका था. वह यूट्यूब पर एक फेक न्यूज़ चैनल चलाता था. खुद को मीडियाकर्मी बताकर अधिकारियों को फोन करता, धमकाता और ब्लैकमेल करने की कोशिश करता.

कौन था वह अधिकारी, जिसने डासना जेल में किया फोन?

अब इस मामले को जेल प्रशासन ने 12 जनवरी को मसूरी थाने में केस दर्ज कराया है. अगले दिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में पता चला कि वह अक्सर ऐसे ही फर्जी पहचान बनाकर लोगों को डराता था. इस बार जेल प्रशासन पर उसका जाल उल्टा पड़ गया. अब अरुण खुद उसी डासना जेल में बंद है, जहां उसने धमकी दी थी. शायद अब वह सोच रहा होगा अधिकार की आड़ में डराना आसान लगता है, लेकिन सच सामने आते ही जाल खुद-ब-खुद टूट जाता है.

छेड़छाड़ और उगाही का मामला

मेरठ के गंगानगर बी-55 निवासी अरुण कुमार मिश्रा कोई नया चेहरा नहीं है अपराध की दुनिया में. उसका क्रिमिनल इतिहास 2010 के दशक से चला आ रहा है. धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग, छेड़छाड़, उगाही और फर्जी पहचान बनाकर अफसरों को धमकाने जैसे कई मामले दर्ज हैं. पुलिस के मुताबिक, वह पहले भी कई बार जेल जा चुका है. 8 मार्च 2013 को न्यू प्रभात नगर मेरठ की एक महिला ने अरुण मिश्रा पर अश्लील हरकत और उगाही का आरोप लगाते हुए इंचौली थाने में मुकदमा दर्ज कराया था. इस केस में वह जेल गया था. साल 2017 में अरुण ने खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का मुख्य सचिव बताकर मेरठ के तत्कालीन एसएसपी को फोन कर धमकी दी. मोबाइल डिटेल से पकड़ा गया और जेल भेजा गया. रिपोर्ट में साफ लिखा है कि वह इससे पहले भी दो बार जेल जा चुका था. एक धोखाधड़ी और दूसरा छेड़छाड़/उगाही में. उसने दावा किया कि फोन चोरी हो गया था, लेकिन पुलिस ने नहीं माना.

लखनऊ में धोखाधड़ी और मारपीट

साल 2022 में लखनऊ के मोहनलाल गंज थाने में उसके खिलाफ धोखाधड़ी और मारपीट का मुकदमा दर्ज हुआ. पुलिस उसकी तलाश में गंगानगर पहुंची, लेकिन वह फरार था. रिपोर्ट में कहा गया कि वह गंगानगर, लालकुर्ती समेत कई थानों से पहले भी जेल जा चुका है. अब डासना जेल के उसी फोन पर धमकी देने के बाद वह खुद उसी जेल में बंद है. पुलिस जांच में उसके पुराने रिकॉर्ड सामने आए, जिससे साबित होता है कि यह उसका पक्का धंधा रहा है. फर्जी पहचान, धमकी, और फिर ब्लैकमेल. बार-बार जेल जाने से सबक नहीं लेता, तो कानून खुद सबक सिखाता है. अरुण मिश्रा जैसे लोग अक्सर उसी जाल में फंस जाते हैं, जो वे दूसरों के लिए बुनते हैं.

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