फुल स्पीड में थी ट्रेन, कंपार्टमेंट में महिला भी थी, जिप खोलकर पेशाब करने लगे जज साहब

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नई दिल्‍ली. तारीख 16 जून 2018, इंदौर-जबलपुर ओवरनाइट एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ्तार में थी. डिब्बे के भीतर सन्नाटा था, लेकिन एक जज साहब के भीतर ‘नशे का तूफान’ हिलोरें मार रहा था. अचानक एक महिला यात्री की चीख से पूरा कोच दहल उठा. लोग दौड़े तो मंजर रूह कंपा देने वाला था. आरोप है कि शराब के नशे में धुत एक सिविल जज ने महिला सह-यात्री के सामने अपनी पैंट की जिप खोली और खुलेआम पेशाब करने लगे. न्याय की कुर्सी पर बैठने वाला शख्स जब खुद ‘अश्लीलता’ की हदें पार कर दे तो समाज का सिर शर्म से झुक जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने अब इस घिनौनी करतूत पर ऐसा सख्त रुख अपनाया है कि जज साहब की कुर्सी सदा के लिए छिनना लगभग तय है.

‘शर्मनाक और घिनौना’ आचरण
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने जज नवनीत सिंह यादव की बहाली पर रोक लगा दी. दरअसल, मई 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस जज को फिर से बहाल करने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी जताई. कोर्ट ने दो टूक कहा कि एक न्यायिक अधिकारी का ऐसा आचरण पूरी तरह से अस्वीकार्य है. कोर्ट ने इसे शॉकिंग और घिनौना करार देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में बर्खास्तगी से कम कुछ भी मंजूर नहीं.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर उठे सवाल
इस मामले की कहानी उतार-चढ़ाव भरी है. 2019 में एमपी हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने जांच के बाद नवनीत यादव को बर्खास्त किया था. लेकिन मई 2025 में उसी हाईकोर्ट की एक बेंच ने उन्हें ‘बेगुनाह’ मान लिया. हाईकोर्ट ने तर्क दिया था कि मेडिकल रिपोर्ट में नशे की पुष्टि नहीं हुई और गवाह पलट गए. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि जज साहब ने अपने पद के प्रभाव का इस्तेमाल कर गवाहों को डराया होगा.

क्या थी उस रात की पूरी हकीकत?
आरोपों के मुताबिक, जज नवनीत यादव डिंडोरी जिले के शाहपुर में तैनात थे. सफर के दौरान उन्होंने न केवल शराब पी बल्कि हंगामा भी किया. उन्होंने महिला यात्री की बर्थ के पास पेशाब करने की कोशिश की. जब महिला चिल्लाई तो उन्होंने सबके सामने खुद को ‘एक्सपोज’ किया. इतना ही नहीं, उन्होंने अपना ज्यूडिशियल आईडी कार्ड दिखाकर धौंस जमाई. सह-यात्रियों और रेलवे स्टाफ के साथ गाली-गलौज की और बार-बार इमरजेंसी चेन खींचकर ट्रेन रोकी.

न्यायिक गरिमा और अनुशासन की अनदेखी
यह मामला केवल एक व्यक्तिगत अपराध नहीं है. यह ‘ज्यूडिशियल लाइफ वैल्यूज’ का खुला उल्लंघन है. एक जज से समाज में नैतिकता के उच्चतम स्तर की उम्मीद की जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर कोई एमएलए से विवाद का बहाना बनाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे कुछ भी करने की छूट मिल जाएगी. कानून की नजर में जज हो या आम नागरिक, अश्लीलता और बदसलूकी की सजा बराबर होनी चाहिए.

सवाल-जवाब
1. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को लेकर क्या टिप्पणी की?
सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को “शर्मनाक” और “घिनौना” बताया. कोर्ट ने कहा कि एक जज का ऐसा आचरण बर्खास्तगी के ही लायक है.

2. आरोपी जज पर मुख्य आरोप क्या थे?
जज पर नशे की हालत में महिला सह-यात्री के सामने पेशाब करने, अभद्रता करने और अपनी न्यायिक पहचान का रौब दिखाने के आरोप थे.

3. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जज को बहाल क्यों किया था?
हाईकोर्ट ने कहा था कि क्रिमिनल ट्रायल में गवाह मुकर गए और नशे का कोई पुख्ता मेडिकल सबूत नहीं मिला, इसलिए बर्खास्तगी गलत थी.

4. सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के मुकरने पर क्या संदेह जताया?
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि शायद जज ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल किया ताकि गवाह मुकर जाएं और वे केस से बच सकें.

5. अब इस मामले में आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के बहाली वाले आदेश पर रोक लगा दी है. अब नोटिस जारी कर पूरे मामले की दोबारा विस्तृत सुनवाई होगी.

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