पत्नी पढ़ी-लिखी है तो क्या पति उसे मेंटनेंस देने से मना कर सकता है? जानिए हाईकोर्ट ने क्या दिया आदेश
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Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि पत्नी के उच्च शिक्षित या व्यावसायिक रूप से कुशल होने मात्र से उसे गुजारा भत्ता (Maintenance) देने से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने बुलंदशहर फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि ‘कमाने की क्षमता’ और ‘वास्तविक रोजगार’ में बड़ा अंतर है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण करियर का बलिदान देने वाली महिलाओं को पति की योग्यता और आय के अनुसार सम्मानजनक भरण-पोषण पाना उनका कानूनी अधिकार है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट.Allahabad High Court: पढ़ी-लिखी पत्नी है तो क्या उसे गुजारा भत्ता नहीं मिलना चाहिए? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस रूढ़िवादी सोच पर करारी चोट करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पति अपनी पत्नी की डिग्री और प्रोफेशनल स्किल्स का हवाला देकर उसे मेंटेनेंस (भरण-पोषण) देने की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता. जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने कहा कि ‘कमाने की काबिलियत’ होना और ‘वास्तव में नौकरी करना’ दो अलग बातें हैं, और किसी भी महिला के शिक्षित होने को उसकी कमजोरी नहीं बनाया जा सकता.
कमाने की ‘क्षमता’ और ‘वास्तविक कमाई’ में है बड़ा अंतर
कोर्ट ने अपने 8 जनवरी के आदेश में कहा कि अक्सर पति अपनी पत्नी की डिग्री और योग्यता का हवाला देकर कानूनी जिम्मेदारी से भागने की कोशिश करते हैं. बेंच ने सख्त लहजे में कहा कि ‘कमाने की क्षमता’ और ‘वास्तविक रोजगार’ दो अलग-अलग चीजें हैं. सिर्फ इसलिए कि एक महिला शिक्षित है, यह नहीं माना जा सकता कि वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र है.
घरेलू जिम्मेदारियां और करियर का बलिदान
हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के बाद महिलाएं अक्सर बच्चों और घर की देखभाल के लिए अपनी पढ़ाई और करियर का बलिदान दे देती हैं. सालों तक वर्कफोर्स से बाहर रहने के बाद दोबारा नौकरी पाना उनके लिए बेहद मुश्किल होता है. कोर्ट ने कहा,
यह कहना असंवेदनशील है कि महिला केवल पैसे ऐंठने के लिए गुजारा भत्ता मांग रही है. हमें उन सामाजिक और भावनात्मक हकीकतों को समझना होगा जिनका महिलाएं सामना करती हैं.
बुलंदशहर फैमिली कोर्ट का आदेश क्यों पलटा?
दरअसल, बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट ने महिला की अर्जी इस आधार पर खारिज की थी कि उसने अपनी प्रोफेशनल एजुकेशन छिपाई थी और वह बिना किसी ठोस कारण के अलग रह रही थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने ससुराल में दुर्व्यवहार के कारण घर छोड़ा था और पति यह साबित करने में नाकाम रहा कि वह कहीं कार्यरत है. कोर्ट ने बच्चे के लिए तय 3,000 रुपए की राशि को भी अपर्याप्त बताया.
फैमिली कोर्ट को एक महीने का अल्टीमेटम
हाईकोर्ट ने अब इस मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया है. अदालत ने निर्देश दिया है कि पति की कुल आय और ‘सोशल जस्टिस’ के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, एक महीने के भीतर पत्नी और बच्चे के लिए नए सिरे से सम्मानजनक गुजारा भत्ता तय किया जाए.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें