ayush badoni selection आयुष बदोनी के नाम पर कैसे लगी मुहर, अक्षर पटेल के साथ खेल हो गया

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नई दिल्ली. वॉशिंगटन सुंदर की जगह आयुष बदोनी का वनडे टीम में चुना जाना सिर्फ एक “रिप्लेसमेंट” नहीं है, बल्कि यह भारतीय चयन नीति पर एक बड़ा सवालिया निशान है. एक ऑफ-स्पिन ऑलराउंडर की जगह एक शुद्ध बल्लेबाज का आना यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर टीम मैनेजमेंट किस दिशा में जा रहा है. क्या भारत को अब ऑलराउंडर नहीं चाहिए? या फिर कुछ नामों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है.

वॉशिंगटन सुंदर सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि वह उस प्रोफाइल के क्रिकेटर हैं जिसकी भारतीय टीम सालों से तलाश करती रही है.टॉप-7 में बल्लेबाजी, पावरप्ले में ऑफ-स्पिन, और मैच की गति बदलने की क्षमता. वॉशिंगटन सुंदर के बाहर होने पर उम्मीद थी कि शाहबाज अहमद, अक्षर पटेल या किसी घरेलू ऑफ-स्पिन ऑलराउंडर को मौका मिलेगा. लेकिन चयन हुआ आयुष बदोनी का एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज, इसमें कोई शक नहीं पर सवाल यह है कि टीम बैलेंस का क्या.

क्या शाहबाज-अक्षर अब ऑलराउंडर नहीं रहे?

आईपीएल, घरेलू क्रिकेट और लिमिटेड ओवर्स में लगातार प्रदर्शन करने वाले शाहबाज अहमद आखिर कब तक “बेंच स्ट्रेंथ” बने रहेंगे. वह बल्लेबाजी भी करते हैं, गेंदबाजी भी, और फील्डिंग में भी भरोसेमंद हैं फिर भी हर बार चयन की दौड़ में उनका नाम आखिरी पायदान पर क्यों होता है.अक्षर पटेल ने वर्ल्ड कप, आईसीसी टूर्नामेंट और विदेशी दौरों पर खुद को साबित किया है फिर भी जैसे ही टीम कॉम्बिनेशन बदलता है, अक्षर सबसे पहले बाहर क्यों होते हैं. ऐसे में मन में ये सवाल जरूर आता है कि क्या अक्षर सिर्फ “कंडीशनल प्लेयर” बनकर रह गए हैं?

क्या भारत में ऑफ-स्पिनर खत्म हो गए हैं?

टीम में रिप्लेसमेंट देनें वाले चयनकर्ताओं से अगर पूछा जाए कि क्या देश में ऑलराउंडर खत्म हो गए है तो जवाब शायद “हां” ही होगा तभी, तनुष कोटिएन, जलज सक्सेना, रियान पराग जैसे खिलाड़ी है जो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे है. तनुष कोटियन—मुंबई के लिए रणजी, विजय हजारे और सैयद मुश्ताक अली में लगातार प्रदर्शन,गेंद और बल्ले दोनों से मैच जिताने की क्षमता,फिर भी टीम इंडिया की चौखट तक भी नहीं. जलज सक्सेना एक दशक से घरेलू क्रिकेट में रन और विकेट दोनों की गारंटी,लेकिन उम्र और “हाइप” की कमी उन्हें हमेशा साइडलाइन रखती है.

भविष्य की प्लानिंग या चयन की सुविधा?

आयुष बदोनी टैलेंटेड हैं, इसमें दो राय नहीं लेकिन वनडे टीम में पहले से ही बल्लेबाजों की भरमार है. जब टीम को एक ऑलराउंडर रिप्लेसमेंट चाहिए था, तब एक और बल्लेबाज जोड़ना चयन की मजबूरी दिखाता है, रणनीति नहीं. अजित अगरकर चयन समिति के प्रमुख हैं और गौतम गंभीर का प्रभाव टीम मैनेजमेंट में साफ दिखता है.लेकिन बार-बार यही सवाल उठ रहा है कुछ खिलाड़ियों को बार-बार मौके क्यों? कुछ नामों पर “अघोषित बैन” क्यों? अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो भारतीय क्रिकेट में ऑलराउंडर एक “लक्ज़री” बन जाएंगे, अगर भारत को बड़े टूर्नामेंट जीतने हैं, तो सिर्फ स्टार बल्लेबाज नहीं,संतुलित टीम, भरोसेमंद ऑलराउंडर और घरेलू क्रिकेट को सम्मान देना होगा.

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