हाथ में मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री, लेकिन चुना आध्यात्म का रास्ता, IIT वाले बाबा के बाद इस संत की खूब चर्चा

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प्रयागराज: संगम की रेती पर आयोजित माघ मेले में देश के कोने-कोने से साधु संत पहुंचे हैं. माघ मेले में जूना अखाड़े के श्री दत्तात्रेय सेवा समिति के शिविर में दिल्ली से पहुंचे एक नागा सन्यासी इन दिनों लोगों के बीच चर्चा का सबब बने हुए हैं. यह नागा सन्यासी मैकेनिकल इंजीनियर हैं, लेकिन श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े में दीक्षित होने के बाद अपना जीवन सनातन को समर्पित कर चुके हैं. यह नागा सन्यासी स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि महाराज हैं, जो सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ ही समाज को भी नई दिशा दे रहे हैं. महाकुंभ 2025 में जिस तरह से आईआईटी बाबा वायरल हुए थे, उसी तरह से मैकेनिकल इंजीनियर स्वामी आनंदेश्वरानंद जी महाराज भी चर्चाओं में बने हुए हैं.

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि महाराज मूलतः महाराष्ट्र के रहने वाले हैं. मौजूदा समय में वह दिल्ली में जूना अखाड़े के आश्रम को संभाल रहे हैं. उनका बॉटनी और बायोलॉजी में अपना स्पेशलाइजेशन है. उनका दावा है कि जब इलाज की सभी पैथियां थम जाती हैं, तब वह मरीज को हाथ में लेते हैं और उनका इलाज करते हैं. वह किसी भी प्रकार के दर्द का बिना ऑपरेशन और साइड इफेक्ट इलाज का दावा भी करते हैं.

धर्म और अध्यात्म के प्रति गहरी रुची

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि महाराज के सन्यासी बनने की भी कहानी बेहद दिलचस्प है. उनके मुताबिक, बचपन से ही धर्म और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुची थी. उनके मुताबिक, वह चौथी और आठवीं क्लास में घर से भाग गए थे. साधु संतों की संगत में मन रमता था. 12वीं के बाद भी एक बार घर छोड़ा था और मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद तो घर छोड़कर संन्यास की ओर रुख किया. स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि के मुताबिक, भागवत गीता को मराठी में ट्रांसलेट करने वाले संत ज्ञानेश्वर की समाधि पर अक्सर जाना होता था.

उनके मुताबिक, भगवान विट्ठल की परंपरा से वह जुड़े हुए थे. बाद में नर्मदा किनारे जाकर साधना की. उनके मुताबिक, एजुकेशन महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि एजुकेशन से सब्जेक्टिव नॉलेज आ सकती है, लेकिन जीवनात्मक नॉलेज नहीं मिल सकती है. उनके मुताबिक, अगर एजुकेशनल लोग इतने समझदार होते, तो जीवन की समस्याओं से लोगों को मुक्ति मिल जाती, लेकिन अगर हमें समस्याओं से मुक्ति नहीं मिल रही है, तो हमारा इंटरप्रिटेशन और कैलकुलेशन कहीं ना कहीं सही नहीं है.

“बियोंड थ्री” के नाम से चलाते हैं ऑर्गेनाइजेशन 

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि के मुताबिक, 2006 में उन्होंने घर छोड़ा था. उसके बाद 12 साल बॉटनी और बायोलॉजी में रिसर्च किया. हिमालय में रहते हुए वह सनातन की प्रैक्टिस करते थे. उनके मुताबिक, सनातन ही मेरे इलाज की भी पैथी है. स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि “बियोंड थ्री” के नाम से एक ऑर्गेनाइजेशन भी चलाते हैं, जिसे गूगल पर भी सर्च किया जा सकता है. उनकी पैथी मेडिकेशन फ्री, पेन फ्री और डिजीज फ्री के लिए काम करती है. उनके मुताबिक, 2007 में वह जूना अखाड़े के संपर्क में आए और जूना अखाड़े के संरक्षक महंत हरी गिरी जी के शिष्य बने.

स्वामी आनंदेश्वरानंद गिरि के मुताबिक, गुरु से ही हमें अपने जीवन का भी महत्व समझ में आया. उनके मुताबिक, जब तक आपके पास गुरु नहीं है, तब तक आपका जीवन व्यर्थ है. आध्यात्मिक गुरु जीवन में होना जरूरी है, क्योंकि एजुकेशन के लिए एक पैरामीटर है. दाल-रोटी के लिए जब शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब गुरु होता है, लेकिन संपूर्ण विकास आध्यात्मिक गुरु ही करवा सकता है. गुरु-शिष्य परंपरा ही सर्वांगीण चेतना का विकास, सर्वांगीण जीवन और सर्वांगीण संस्कृति व प्रकृति का संरक्षण कर सकती है.

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