₹72000 करोड़ की महाडील, टूटेगा हर चक्रव्यूह, दुश्मनों की बनेगी जलसमाधि, ब्रह्मोस और अग्नि-5 को भूल जाएंगे – India Germany Finalise usd 8 billion rupees 72000 crore Project 75I Deal Type 214NG Submarine indian navy brahmos gni5 missile
Submarine Deal: इंडियन नेवी ने 1972 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अपने जौहर से दुनिया को रूबरू कराया था. कराची पोर्ट को इस तरह तबाह कर दिया गया था कि वहां से ऑपरेट करना पाकिस्तान के लिए नामुमकिन हो गया था. इस युद्ध में इस्लामाबाद की हार में नेवी का यह अटैक ताबूत में आखिरी कील साबित हुई थी. आखिरकार पाकिस्तान को करारी हार का सामना करना पड़ा और दुनिया के मानचित्र पर बांग्लादेश नाम के नए देश का उदय हुआ. भारत के नीति निर्माताओं को पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि नेवी को मजबूत और सशक्त बनाना जरूरी है, ताकि दुश्मनों के दांत खट्टे किए जा सकें. पिछले पांच दशक से भी ज्यादा समय में नेवी ने मुकम्मल यात्रा तय की है. उसी यात्रा को जारी रखते हुए साल 2026 भारतीय नौसेना के लिए काफी अहम साबित होने वाला है. एक ऐसी डिफेंस महाडील को अंजाम दिया जाने वाला है, जिससे नेवी की ताकत में कई गुना की वृद्धि होगी. नजर में आए बिना दुश्मनों को तबाह करना आसान हो जाएगा. भारत प्रोजेक्ट-75I के तहत जर्मनी से बड़ा करार करने वाला है. यह रक्षा समझौता सबमरीन यानी पनडुब्बी को लेकर है. इसके तहत इंडियन नेवी को अल्ट्रा मॉडर्न टेक्नोलॉजी से लैस ‘जलयोद्धा’ मिलेगा जो कई मायनों में काफी अहम साबित होगा. बताया जा रहा है कि यह करार 72000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है.
जानकारी के मुताबिक, भारत और जर्मनी के बीच रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा और ऐतिहासिक समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है. दोनों देश करीब 8 अरब डॉलर (72 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा) के प्रोजेक्ट-75I (Project-75I) सौदे को जल्द ही अंतिम रूप देने वाले हैं. इस सौदे के तहत भारतीय नौसेना के लिए 6 अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की अगले सप्ताह होने वाली भारत यात्रा के दौरान इस समझौते पर मुहर लगने की उम्मीद है. यह सौदा भारत की समुद्री ताकत को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. लंबे समय से अटके प्रोजेक्ट-75I टेंडर के निर्णायक निष्कर्ष के रूप में इसे देखा जा रहा है. इस परियोजना में जर्मनी की प्रमुख रक्षा कंपनी थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की सरकारी शिपयार्ड कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) के बीच रणनीतिक साझेदारी होगी.
Submarine Deal: भारतीय नौसेना लगातार अपनी ताकत में इजाफा कर रही है. (इंडियन नेवी के फेसबुक अकाउंट से साभार)
क्यों महत्वपूर्ण है यह डील?
इस परियोजना के तहत बनने वाली सभी 6 पनडुब्बियां भारत में ही तैयार की जाएंगी. इन पनडुब्बियों के निर्माण से न केवल भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि देश में पनडुब्बी निर्माण से जुड़ा एक मजबूत औद्योगिक ढांचा भी विकसित होगा. यह पूरी तरह से सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के अनुरूप है. सौदे की कुल लागत करीब 8 अरब डॉलर आंकी गई है. इसमें डिजाइन, तकनीकी सहयोग, तकनीक का हस्तांतरण (Technology Transfer) और भारत में निर्माण शामिल है. शुरुआती पनडुब्बी में करीब 45 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग होगा, जो अंतिम सबमरीन तक बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा. भारतीय नेवी ने इस प्रोजेक्ट-75I के लिए जर्मनी की टाइप 214NG (नेक्स्ट जेनरेशन) पनडुब्बी को चुना है. यह करीब 2500 टन वजनी आधुनिक पनडुब्बी है, जो अपनी खामोशी, लंबी दूरी और समय तक पानी के नीचे रहने की क्षमता और आधुनिक तकनीक के लिए जानी जाती है. इस टेंडर में जर्मन पनडुब्बी का मुकाबला स्पेन की कंपनी नवांतिया की S-80 प्लस पनडुब्बी से था. हालांकि, भारतीय नौसेना की सख्त तकनीकी जरूरतों पर जर्मन डिजाइन खरा उतरा. खास तौर पर एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम को लेकर जर्मन सबमरीन को बढ़त मिली.
भारतीय नौसेना सबमरीन फ्लीट को अपग्रेड करने में जुटी है. (फाइल फोटो/Reuters)
AIP तकनीक क्यों है खास?
AIP सिस्टम पनडुब्बियों के लिए बेहद अहम तकनीक मानी जाती है. आम डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को कुछ दिनों में सतह पर आकर बैटरी चार्ज करनी पड़ती है. लेकिन AIP तकनीक से लैस पनडुब्बियां कई हफ्तों तक बिना सतह पर आए पानी के नीचे रह सकती हैं. जर्मन टाइप 214NG में फ्यूल-सेल आधारित AIP सिस्टम है, जो पूरी तरह से आजमाया हुआ और कई देशों की नौसेनाओं में पहले से इस्तेमाल हो रहा है. वहीं, स्पेन की पेशकश में बायो-एथेनॉल आधारित AIP सिस्टम था, जिसे अभी पूरी तरह से समुद्र में परखा हुआ नहीं माना गया. इसी वजह से नौसेना ने जर्मन विकल्प को ज्यादा भरोसेमंद माना. इस बड़े रक्षा सौदे की नींव पिछले साल जून में रखी गई थी, जब TKMS और MDL के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे. इसके तहत जर्मन कंपनी डिजाइन, तकनीकी सलाह और जरूरी तकनीक उपलब्ध कराएगी, जबकि निर्माण का जिम्मा मझगांव डॉक संभालेगा. इस सहयोग से भारत में पनडुब्बी निर्माण की क्षमता में बड़ा इजाफा होगा. लंबे समय में इससे विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी और भारतीय रक्षा उद्योग को नई मजबूती मिलेगी.
प्रोजेक्ट-75I क्या है?
प्रोजेक्ट-75I भारतीय नौसेना का एक अहम रक्षा कार्यक्रम है, जिसके तहत देश के लिए 6 आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है. ये पनडुब्बियां समुद्र के भीतर लंबे समय तक बिना सतह पर आए काम कर सकेंगी और दुश्मन की निगरानी, हमले तथा समुद्री सुरक्षा जैसे मिशनों में इस्तेमाल होंगी.
प्रोजेक्ट-75I की जरूरत क्यों पड़ी?
इंडियन नेवी की पनडुब्बी क्षमता को मजबूत करने के लिए प्रोजेक्ट-75I की जरूरत महसूस की गई. मौजूदा बेड़े में कई पनडुब्बियां पुरानी हो रही हैं. वहीं, हिंद महासागर क्षेत्र में चीन और अन्य देशों की बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी को देखते हुए भारत को आधुनिक, ज्यादा सक्षम और भरोसेमंद सबमरीन की आवश्यकता है.
इस परियोजना की खास तकनीकी खूबियां क्या होंगी?
प्रोजेक्ट-75I के तहत बनने वाली पनडुब्बियों में एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम होगा, जिससे वे कई दिनों तक पानी के भीतर रह सकेंगी. इनमें अत्याधुनिक सेंसर, टॉरपीडो, मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता और स्टील्थ तकनीक होगी, जिससे दुश्मन के रडार और सोनार से बचना आसान होगा.
प्रोजेक्ट-75I में ‘मेक इन इंडिया’ की भूमिका क्या है?
प्रोजेक्ट-75I को ‘मेक इन इंडिया’ पहल से जोड़ा गया है. इसके तहत पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा, हालांकि तकनीक विदेशी साझेदार से ली जाएगी. इससे देश में रक्षा उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार के अवसर पैदा होंगे और भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताएं मजबूत होंगी.
प्रोजेक्ट-75I का भारत की सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा?
इस परियोजना से भारतीय नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होगा. समुद्री सीमाओं की सुरक्षा मजबूत होगी और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति बेहतर होगी. साथ ही, यह भारत को क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर एक मजबूत समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा.
रणनीतिक जरूरत
भारतीय नौसेना के लिए प्रोजेक्ट-75I बेहद जरूरी मानी जा रही है. फिलहाल नौसेना के पास मौजूद कई पारंपरिक पनडुब्बियां काफी पुरानी हो चुकी हैं और अपने सेवा जीवन के अंतिम चरण में हैं. दूसरी ओर, चीन तेजी से अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी लगातार बढ़ रही है. चीन के पास बड़ी संख्या में आधुनिक AIP और परमाणु पनडुब्बियां हैं, जो भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बनती जा रही हैं. ऐसे में नई टाइप 214NG पनडुब्बियों के शामिल होने से भारत की निगरानी, गश्त और समुद्री सुरक्षा क्षमताएं काफी मजबूत होंगी. इन नई पनडुब्बियों के शामिल होने से भारतीय नौसेना लंबी दूरी तक गश्त करने, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर प्रभावी जवाब देने में सक्षम होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोजेक्ट-75I न केवल सैन्य दृष्टि से बल्कि रणनीतिक संतुलन के लिहाज से भी भारत के लिए बेहद अहम साबित होगा. भारत और जर्मनी के बीच यह रक्षा समझौता दोनों देशों के मजबूत होते रिश्तों का प्रतीक है और आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री सुरक्षा को नई मजबूती देने वाला कदम माना जा रहा है.
जर्मन चांसलर की यात्रा और डील
सूत्रों के मुताबिक, इस सौदे को अंतिम मंजूरी जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा के दौरान मिल सकती है. चांसलर मर्ज़ 12 और 13 जनवरी को भारत दौरे पर रहेंगे. इस दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम मुद्दों पर बातचीत होगी और प्रोजेक्ट-75I समझौते को राजनीतिक स्तर पर हरी झंडी मिलने की उम्मीद है. यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब जर्मनी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक और रक्षा भूमिका को मजबूत करना चाहता है. भारत के साथ यह साझेदारी दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई दे सकती है.