Kanpur News : कहां से आई, कौन थी? कानपुर चिड़ियाघर में मादा ढोल की मौत, अचानक बिगड़ गई तबीयत
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Kanpur Zoo News : मादा ढोल की तबीयत दो दिन पहले अचानक बिगड़ गई. पशु चिकित्सकों की टीम ने तुरंत इलाज शुरू किया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद बचाया नहीं जा सका. जांच के लिए सैंपल बरेली के भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में भेजे गए हैं. इसकी उम्र करीब 8 साल थी. उसका व्यवहार सामान्य था और वह पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र थी. चिड़ियाघर में दूसरे जानवरों की नियमित स्वास्थ्य जांच और निगरानी बढ़ा दी गई है, ताकि संक्रमण को रोका जा सके.
कानपुर. शहर के प्राणि उद्यान से दु:खद खबर सामने आई है. यहां आवासित एक मादा ढोल (जंगली कुत्ता) की मौत हो गई है. वह पिछले दो दिनों से बीमार थी और उसका इलाज चल रहा था. प्रारंभिक जांच में मौत का कारण वायरल संक्रमण माना जा रहा है. हालांकि इसकी पुष्टि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी. कानपुर प्राणि उद्यान प्रशासन के अनुसार, मादा ढोल की तबीयत दो दिन पहले अचानक बिगड़ गई थी. विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम ने तुरंत इलाज शुरू किया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका. सही कारण जानने के लिए मृत ढोल के सैंपल जांच हेतु भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली भेजे गए हैं. रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि संक्रमण किस तरह का था.
प्राणि उद्यान में शोक
यह मादा ढोल वर्ष 2022 में तिरुपति जू से कानपुर लाई गई थी. उस समय प्राणि उद्यान में वन्यजीवों की विविधता बढ़ाने और संरक्षण कार्यक्रम को मजबूत करने के उद्देश्य से इसे यहां शिफ्ट किया गया था. इसकी उम्र लगभग 8 वर्ष बताई जा रही थी. ढोल का व्यवहार सामान्य था और वह पर्यटकों के बीच भी आकर्षण का केंद्र रहती थी. मादा ढोल की मौत के बाद प्राणि उद्यान में शोक का माहौल है. कानपुर प्राणी उद्यान के डायरेक्टर कन्हैया पटेल का कहना है कि अन्य जानवरों की नियमित स्वास्थ्य जांच और निगरानी बढ़ा दी गई है, ताकि किसी भी तरह के संक्रमण को फैलने से रोका जा सके. प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे.
क्या होता है ढोल
ढोल को आम भाषा में जंगली कुत्ता कहा जाता है. यह भारत के जंगलों में पाया जाने वाला एक सामाजिक और बेहद फुर्तीला वन्यजीव है. ढोल आमतौर पर झुंड में रहते हैं और सामूहिक शिकार के लिए जाने जाते हैं. इनका रंग लाल-भूरा होता है और पूंछ काली होती है. ढोल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये जंगलों में संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं. दुर्भाग्य से, जंगलों की कटाई, बीमारियों और शिकार की कमी के कारण इनकी संख्या लगातार घट रही है, इसी वजह से इन्हें संरक्षित वन्यजीवों की श्रेणी में रखा गया है.
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Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें