तमिलनाडु विधानसभा चुनाव: ये 5 कारण जिससे बीजेपी की उम्मीदों को लग चुके हैं पंख

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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने दक्षिण के इस दुर्ग को भेदने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के ‘चाणक्य’ अमित शाह की चेन्नई में मौजूदगी और एआईएडीएमके (AIADMK) के साथ गठबंधन को अंतिम रूप देने की कवायद साफ बताती है कि पार्टी इस बार आर-पार के मूड में है.

खबर है कि अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बीजेपी कोर कमेटी की बैठक में 120 सीटों पर मंथन किया गया है. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी का पूरा फोकस ‘विनिंग सीट्स’ पर है. लेकिन सवाल यह है कि द्रविड़ राजनीति के गढ़ में बीजेपी इस बार इतनी आश्वस्त क्यों है? चलिये जानते हैं वो पांच कारण, जिससे बीजेपी की उम्मीदों को पंख लग चुके हैं…

तिरुवनंतपुरम में मिली जीत का ‘दक्षिण’ पर असर

तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे इलाकों में बीजेपी के हालिया प्रदर्शन ने पार्टी में एक बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव किया है. तिरुवनंतपुरम में मिली इस जीत ने उस मिथक को तोड़ दिया है कि बीजेपी विंध्य पर्वत के नीचे चुनाव नहीं जीत सकती. तिरुवनंतपुरम की जीत का सीधा असर तमिलनाडु के कन्याकुमारी और सीमावर्ती जिलों पर देखने को मिल सकता है. यही कारण है कि अमित शाह की बैठक में कन्याकुमारी की दो सीटों पर विशेष चर्चा हुई, जहां पार्टी को जीत पक्की लग रही है.

अन्नामलाई की लोकप्रियता और आक्रामक तेवर

बीजेपी के फायरब्रैंड नेता के. अन्नामलाई ने पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु की राजनीति की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है. उनकी ‘एन मन्न, एन मक्कल’ (मेरी मिट्टी, मेरे लोग) यात्रा और डीएमके (DMK) सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों (DMK Files) ने युवाओं के बीच बीजेपी को एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा किया है. अन्नामलाई की जमीनी मेहनत ने पार्टी कैडर में जो जोश भरा है, वह इस चुनाव में वोट में तब्दील होता दिख रहा है.

शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की मजबूत होती पकड़

बीजेपी कोर कमेटी की बैठक में कोयंबटूर, मदुरै और चेन्नई की सीटों पर खास फोकस रहा. पार्टी ने पारंपरिक रूप से तमिलनाडु के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में अपनी पैठ बनाई है. बीजेपी कोयंबटूर की दो सीटों पर मजबूती से दावा ठोक रही है. वहीं चेन्नई महानगर की 3 से 4 सीटों पर बीजेपी की नजर है, जहां मध्यम वर्गीय मतदाता और हिंदी भाषी आबादी निर्णायक भूमिका में हैं.

AIADMK के बिखरे कुनबे को एक करने की रणनीति

अमित शाह की रणनीति सिर्फ बीजेपी को मजबूत करने की नहीं, बल्कि एनडीए को अभेद्य बनाने की है. सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी एआईएडीएमके के दोनों धड़ों टीटीवी दिनाकरन और ओ. पन्नीरसेल्वम (OPS) को ई. पलानीस्वामी (EPS) के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में वापस लाने की कोशिश कर रही है. अगर यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ सफल रही, तो डीएमके के वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी तय है. रामेश्वरम रीजन में भी पार्टी इसी समीकरण के सहारे उम्मीदवारों को उतारने की तैयारी में है.

120 सीटों पर माइक्रो-मैनेजमेंट और विनिंग फॉर्मूला

अमित शाह ने हवाई दावों के बजाय जमीनी हकीकत पर जोर दिया है. खबर है कि बैठक में प्रदेश चुनाव प्रभारी पीयूष गोयल, अर्जुन राम मेघवाल, बैंजयंत पांडा, प्रदेश अध्यक्ष एन. नागेंद्रन और केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन जैसे दिग्गजों की मौजूदगी में 120 सीटों का रिव्यू किया गया. पार्टी केवल उन सीटों पर लड़ने के मूड में है, जहां उसे जीत की मजबूत संभावना दिख रही है. रामेश्वरम जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों पर फोकस करना भी बीजेपी के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के एजेंडे को धार दे रहा है.

गृह मंत्री अमित शाह आज भी प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के साथ मैराथन बैठकें करने वाले हैं. सीटों के बंटवारे का अंतिम फॉर्मूला जल्द ही सामने आएगा, लेकिन इतना तय है कि तिरुवनंतपुरम की हवा और अन्नामलाई की मेहनत ने तमिलनाडु के चुनावी समर को इस बार बेहद दिलचस्प बना दिया है.

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