लता मंगेशकर मानती थीं गुरु, एक्टर बन हुआ असफल, संगीतकार बनते ही बना स्टार, किया 150 से ज्यादा फिल्मों में काम
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फिल्मी संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसती हैं. 40-50 के दशक में हिंदी फिल्मों में संगीत का एक सुनहरा दौर था और उस दौर के सबसे बड़े जादूगर सी. रामचंद्र थे. उनकी धुनों में एक अलग ही मिठास थी, जो सुनने वाले को तुरंत मोह लेती थी. उनके और लता मंगेशकर के बीच की कहानी भी बेहद रोचक थी.

कहा जाता है कि लता मंगेशकर रात-रात भर सी. रामचंद्र के पास बैठकर हर गाने की डिटेल सुनती थीं. सी. रामचंद्र का जन्म 12 जनवरी 1918 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के बुदवा गांव में हुआ था. उनका असली नाम रामचंद्र नरहर चितलकर था. बचपन से ही उन्हें संगीत में दिलचस्पी थी. उन्होंने संगीत शिक्षा हासिल की.

शुरुआत में सी. रामचंद्र ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने यूबी राव की फिल्म ‘नागानंद’ में मुख्य भूमिका निभाई, लेकिन उनकी फिल्मों को ज्यादा सफलता नहीं मिली. इस अनुभव के बाद उन्होंने संगीत की ओर रुख किया और फिल्म उद्योग में अपनी अलग पहचान बनाने का निर्णय लिया.

सी. रामचंद्र ने मिनर्वा मूविटोन के बिन्दु खान और हबीब खान के ग्रुप में शामिल होकर संगीत की तैयारी शुरू की और वहां हारमोनियम वादक के रूप में काम किया. उनकी संगीत यात्रा का पहला बड़ा मुकाम तमिल फिल्मों के साथ जुड़ा. लेकिन हिंदी फिल्मों में उन्हें असली पहचान 1942 में भगवान दादा की फिल्म ‘सुखी जीवन’ से मिली
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इसके बाद 1947 में आई फिल्म ‘शहनाई’ ने उन्हें एक नामी संगीतकार के रूप में स्थापित किया. इस फिल्म का ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ गीत आज भी लोगों की जुबान पर है. 50 के दशक में उनका करियर पूरी तरह चमक उठा. 1951 में रिलीज हुई कॉमेडी फिल्म ‘अलबेला’ उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई.

‘अलबेला’ के गाने जैसे ‘भोली सूरत दिल के खोटे’, ‘शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के’, और ‘किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम’ बड़े हिट हुए. इस दौरान लता मंगेशकर उनकी संगीत प्रतिभा की इतनी बड़ी फैन बन गईं कि अक्सर रातभर बैठकर हर गाने को ध्यानपूर्वक सुनती थीं.

सी. रामचंद्र ने हमेशा संगीत में नए प्रयोग किए. वे पश्चिमी संगीत वाद्यों जैसे ट्रम्पेट, बोंगो, ऑल्टो सैक्स, हारमोनिका और यहां तक कि सीटी को भारतीय संगीत में जोड़ते थे. उन्होंने कभी भी गाने को एक ही राग में सीमित नहीं रखा. उनके गीतों में अलग-अलग रागों का मिश्रण और पश्चिमी संगीत के तत्वों का संतुलन इसे खास बनाता था.

उनके करियर में लगभग 150 फिल्मों में संगीत शामिल था. उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, तमिल, तेलुगु और भोजपुरी फिल्मों में भी संगीत दिया. उनके सबसे मशहूर गीतों में देशभक्ति का गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ शामिल है, जिसे सुनकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आंखें भी नम हो गई थीं.

सी. रामचंद्र को उनके संगीत योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले और संगीत प्रेमियों ने उन्हें हमेशा सराहा. उन्होंने अपनी बायोग्राफी ‘द सिम्फनी ऑफ माय लाइफ’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन और संगीत के सफर की बातें साझा कीं. 5 जनवरी 1995 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं.