चखा है ‘पूरी रोटी’ का अनसुना स्वाद. छत्तीसगढ़ में आज भी जिंदा दादी-नानी की गजब रेसिपी – Chhattisgarh News

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Food Story : छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति में पारंपरिक व्यंजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पोषण, स्वास्थ्य और लोक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं. ऐसे ही एक पारंपरिक और पौष्टिक पकवान का नाम है पूरी रोटी, जो खासतौर पर छेरछेरा जैसे लोक पर्व के अवसर पर छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में बनाई जाती है. यह पकवान मुख्य रूप से बरबटी दाना और कुल्थी जैसे पोषक अनाजों से तैयार किया जाता है, जिन्हें ग्रामीण अंचलों में सदियों से आहार का हिस्सा माना जाता रहा है. एक बार रेसिपी जानकर आप कभी भी इसे अपने घर पर बना सकते हैं.

ग्रामीण बोलचाल में झुनगा कहा जाता

महासमुंद जिले के बसना विकासखंड स्थित बिजराभांठा गांव की गृहिणी सुलोचना नायक वर्षों से इस पारंपरिक व्यंजन को बनाती आ रही हैं. उन्होंने बताया कि बरबटी दाना, जिसे ग्रामीण बोलचाल में झुनगा कहा जाता है, और कुल्थी दोनों ही अनाज प्रोटीन, फाइबर और खनिज तत्वों से भरपूर होते हैं. इन्हीं गुणों के कारण पूरी रोटी को केवल त्योहार का पकवान नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक भोजन भी माना जाता है.

आधा घंटा पानी में उबाला जाता

सुलोचना नायक के अनुसार, पूरी रोटी बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले बरबटी दाना या कुल्थी को अच्छी तरह साफ कर लिया जाता है. इसके बाद इसे लगभग आधा घंटा पानी में उबाला जाता है, ताकि दाना नरम हो जाए. उबालने के बाद अतिरिक्त पानी को छान लिया जाता है और फिर दानों को पीसकर एक चिकना मिश्रण तैयार किया जाता है. इस मिश्रण में स्वाद और मिठास के लिए गुड़ मिलाया जाता है और अच्छे से मिक्स किया जाता है.

इसके बाद तैयार मिश्रण के छोटे-छोटे गोल आकार बनाए जाते हैं. इन गोलियों को गेहूं के आटे के पतले बैटर में डुबोकर गर्म तेल से भरी कढ़ाही में तलने के लिए डाला जाता है. पूरी रोटी को धीमी आंच पर लगभग 15 से 20 मिनट तक पकाया जाता है। जब इसका रंग गहरा लाल या सुनहरा हो जाए, तब यह समझा जाता है कि पूरी रोटी अच्छी तरह पक चुकी है. इसके बाद इन्हें तेल से निकाल लिया जाता है.

स्वाद की बात करें तो पूरी रोटी हल्की मिठास, कुरकरे बाहरी हिस्से और नरम अंदरूनी बनावट के कारण बेहद स्वादिष्ट लगती है. सुलोचना नायक बताती हैं कि इसे खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती है, शरीर को पर्याप्त प्रोटीन और ऊर्जा मिलती है, और ठंड के मौसम में यह शरीर को गर्माहट भी प्रदान करती है.

आज के समय में जहां बाजारू और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ रहा है, वहीं पूरी रोटी जैसे पारंपरिक व्यंजन छत्तीसगढ़ की खानपान परंपरा और पोषण ज्ञान की पहचान बने हुए हैं. छेरछेरा, पूस पुन्नी जैसे लोक पर्वों के माध्यम से यह व्यंजन नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है, जिससे ग्रामीण संस्कृति और स्वास्थ्य दोनों का संरक्षण हो रहा है.

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