घर बैठे इस्‍लामाबाद-कराची साफ, 7400 KMPH की रफ्तार, संभलने से पहले दुश्‍मन का सूपड़ा साफ, ब्रह्मोस से भी तेज – Dhvani Hypersonic Glide Vehicle drdo missile programme 7400 kmph speed range 1500 kilometer karachi Islamabad on target

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Dhvani Hypersonic Glide Vehicle: अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला पर एयर स्‍ट्राइक कर उसके राष्‍ट्रपति को बंधक बना लिया. इससे पहले ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की गई थी. उससे भी पहले रूस और यूक्रेन के बीच जंग शुरू हो गया. बाद में इजरायल ने गाजा पर धावा बोल दिया. इन सैन्‍य संघर्षों में एक बात कॉमन है- एरियल स्‍ट्राइक यानी हवाई हमला. 21वीं सदी का सैन्‍य टकराव 20वीं सदी के युद्ध से कई मायनों में अलग है. पहले आर्मी की भूमिका अहम होती थी और अब एयरफोर्स ड्राइविंग सीट पर है. जिस देश की वायुसेना जितनी ताकतवर है, उसका ग्‍लोबल लेवल पर उतना ही दबदबा है. अब तो ड्रोन वॉर भी होने लगा है. ऐसे में हर देश अपनी क्षमता के अनुसार एयर डिफेंस सिस्‍टम डेवलप कर रहा है. इसके साथ ही एक और डेवलपमेंट हो रहा है. दुनिया के तमाम देश अब ऐसे वेपन सिस्‍टम पर फोकस करने लगे हैं, जो रडार और एयर डिफेंस सिस्‍टम को चकमा देकर दुश्‍मन टारगेट को निशाना बना सके. अमेरिका से लेकर रूस और चीन तक इस होड़ में शामिल है. भारत भी पीछे नहीं है. इसमें हाइपरसोनिक मिसाइल्‍स खास हथियार के रूप में सामने आ रही हैं. हाइपरसोनिक मिसाइल की रफ्तार इतनी होती है कि कई बार मौजूदा रडार सिस्‍टम उसे इंटरसेप्‍ट नहीं कर पाता है. भारत वैसे ही सिस्‍टम पर काम कर रहा है. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ध्‍वनि हाइपरसोनिक ग्‍लाइड व्‍हीकल डेवलप करने में जुटा है. इसकी रेंज इतनी होगी कि दिल्‍ली में बैठकर कुछ ही मिनटों में कराची और इस्‍लामाबाद को धूल में मिलाया जा सकता है.
DRDO देश के हाइपरसोनिक वेपन प्रोग्राम में एक अहम उपलब्धि हासिल करने की तैयारी में है. DRDO वर्ष 2026 की पहली तिमाही में ध्वनि (Dhvani) हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल (HGV) का पहला उड़ान परीक्षण करने जा रहा है. यह ट्रायल भारत की सामरिक प्रतिरोधक क्षमता को नई ऊंचाई देने वाला माना जा रहा है और इसके साथ ही भारत अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की कतार में खड़ा हो जाएगा, जो पहले से ही हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक में महारत रखते हैं. ध्वनि एक अत्याधुनिक बूस्ट-ग्लाइड सिस्टम पर आधारित है. इस प्रणाली में पहले एक रॉकेट बूस्टर व्‍हीकल को बहुत ऊंचाई तक ले जाता है. इसके बाद यह उससे अलग होकर वायुमंडल के भीतर बेहद तेज गति से फिसलते यानी ग्‍लाइड करते हुए आगे बढ़ता है. इसकी खासियत यह है कि यह मैक 6 (7400 किलोमीटर प्रति घंटा) या उससे अधिक यानी ध्वनि की गति से छह गुना से भी ज्यादा रफ्तार से उड़ान भर सकता है. इतनी तेज गति के साथ-साथ यह रास्ते में तीखे मोड़ लेने और दिशा बदलने में भी सक्षम है, जिससे दुश्मन की मिसाइल रक्षा प्रणालियों (Missile Defence Systems) के लिए इसे रोकना बेहद कठिन हो जाता है.
Dhvani Hypersonic Glide Vehicle: ध्‍वनि हाइपरसोनिक मिसाइल मौजूदा डिफेंस सिस्‍टम को चकमा देने में सक्षम होगी. (फाइल फोटो/Reuters)

क्‍यों खास है ध्‍वनि हाइपसोनिक प्रोग्राम?

DRDO के वैज्ञानिकों के अनुसार, ध्वनि में उन्नत थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है. इसमें विशेष सिरेमिक और कंपोजिट सामग्री लगी है, जो अत्यधिक तापमान को सहन कर सकती है. हाइपरसोनिक गति पर वायुमंडल में प्रवेश करते समय वाहन पर हजारों डिग्री तक तापमान पैदा हो सकता है, ऐसे में यह सुरक्षा प्रणाली ध्वनि को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाती है. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह परियोजना DRDO की पिछली सफलताओं पर आधारित है. वर्ष 2020 में परीक्षण किए गए हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) ने स्क्रैमजेट इंजन और एयर कंट्रोल के साथ हाई-स्‍पीड की क्षमता को साबित किया था. उसी अनुभव और तकनीकी ज्ञान को आगे बढ़ाते हुए ध्वनि को विकसित किया गया है. वर्ष 2025 में रक्षा प्रदर्शनों के दौरान ध्वनि का पूर्ण आकार का मॉडल भी प्रदर्शित किया गया था, जिसमें इसका ब्लेंडेड विंग-बॉडी डिजाइन दिखाया गया. यह डिजाइन न केवल अधिक लिफ्ट देता है, बल्कि रडार से बचने की क्षमता भी बढ़ाता है.

सबसोनिक, सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइल
सबसोनिक मिसाइल (Subsonic Missile) सुपरसोनिक मिसाइल (Supersonic Missile) हाइपरसोनिक मिसाइल (Hypersonic Missile)
सबसोनिक मिसाइल की गति ध्वनि की गति (Mach 1) से कम होती है सुपरसोनिक मिसाइल की गति ध्वनि की गति से अधिक (Mach 1 से Mach 5) होती है हाइपरसोनिक मिसाइल की गति Mach 5 से अधिक होती है
इनकी सामान्य गति लगभग Mach 0.6 से 0.9 होती है सामान्य गति लगभग Mach 2 से Mach 3 तक होती है कुछ मिसाइलों की गति Mach 8-10 तक हो सकती है
ये मिसाइलें आमतौर पर कम ऊंचाई पर उड़ान भरती हैं ये मिसाइलें बहुत तेज़ी से लक्ष्य तक पहुंचती हैं, जिससे दुश्मन को रिएक्‍शन का समय कम मिलता है उड़ान के दौरान बार-बार दिशा बदल सकती हैं
इन्हें रडार से पकड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है रडार से पकड़ना कठिन होता है मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इन्हें रोकना बहुत मुश्किल है
ईंधन की खपत कम होने के कारण लंबी दूरी तक मार कर सकती हैं ऊंचाई बदलते हुए उड़ान भर सकती हैं अत्यधिक टेम्‍प्रेचर सहने के लिए विशेष तकनीक का उपयोग होता है
ये मिसाइलें मुख्य रूप से क्रूज मिसाइल होती हैं सटीकता (Accuracy) अधिक होती है ये दो प्रकार की होती हैं – हाइपरसोनिक ग्‍लाइड व्‍हीकल और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल
परंपरागत और परमाणु हथियार दोनों ले जा सकती हैं पारंपरिक और परमाणु दोनों तरह के वॉरहेड ले जा सकती हैं भविष्य की युद्ध प्रणाली में इनका महत्व बहुत अधिक माना जा रहा है

ब्रह्मोस से भी तेज रफ्तार

जानकारी के अनुसार, DRDO की तैयारी अंतिम चरण में है. संगठन के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार के अनुसार, ज़मीन पर व्यापक ट्रायल और वैलिडेशन पूरे कर लिए गए हैं और अब उड़ान परीक्षण (Flight Trial) की दिशा में तेजी से काम हो रहा है. 2026 की पहली तिमाही का लक्ष्य इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसी दौरान ध्वनि को मौजूदा मिसाइल बूस्टरों, खासकर अग्नि सीरीज के साथ जोड़ने की संभावना पर काम चल रहा है. इससे यह प्रणाली पारंपरिक और परमाणु दोनों तरह की भूमिकाओं में इस्तेमाल की जा सकेगी. ध्वनि की अनुमानित गति मैक 6 या उससे अधिक (7400 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे ज्‍याद) बताई जा रही है. इस तरह यह ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल से भी ज्‍यादा स्‍पीड वाली होगी. इसकी मारक दूरी के बारे में आधिकारिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती संस्करणों की रेंज लगभग 1,500 किलोमीटर हो सकती है, जबकि भविष्य में विकसित संस्करण अंतरमहाद्वीपीय (इंटर-कॉन्टिनेंटल) दूरी तक पहुंचने में सक्षम हो सकते हैं. इसकी अनिश्चित और कम ऊंचाई पर बदलती उड़ान पथ के कारण मौजूदा रडार और इंटरसेप्टर सिस्टम के लिए इसे समय पर पहचानना और रोकना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा.

दुश्‍मनों के लिए क्‍यों सिरदर्द?

रणनीतिक दृष्टि से ध्वनि भारत की सेकंड स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करेगा. इसका मतलब यह है कि यदि किसी स्थिति में भारत पर हमला होता है, तो भी देश के पास जवाबी कार्रवाई के प्रभावी और विश्वसनीय साधन उपलब्ध रहेंगे. क्षेत्रीय सुरक्षा हालात को देखते हुए यह क्षमता खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि पड़ोसी देशों में भी हाइपरसोनिक तकनीक पर तेजी से काम हो रहा है. ‘प्रोजेक्ट ध्वनि’ के तहत अलग-अलग जरूरतों के अनुसार कई तरह के डिजाइन विकसित किए जा रहे हैं. इनमें कोनिकल, विंग्ड और ब्लेंडेड-बॉडी कॉन्फिगरेशन शामिल हैं. इन्हें समुद्र में जहाजों पर हमले, लंबी दूरी के सटीक प्रहार और रणनीतिक प्रतिरोध जैसे विभिन्न मिशनों के लिए तैयार किया जा रहा है. DRDO का लक्ष्य है कि सफल परीक्षणों के बाद इस प्रणाली को 2029-2030 के आसपास सेना में शामिल किया जाए. आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति के बीच हाइपरसोनिक हथियारों की अहमियत लगातार बढ़ रही है. ऐसे में ध्वनि परियोजना भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है. यदि 2026 की शुरुआत में होने वाला परीक्षण सफल रहता है, तो यह भारत के लिए उच्च गति, सटीक और आधुनिक हथियार प्रणालियों के एक नए युग की शुरुआत मानी जाएगी, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी आगे बढ़ाएगी.

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