koothandavar temple koovagam history | arjun son iravan god of kinnar | koovagam festival transgender get married then mourn | बड़ा ही विचित्र मंदिर, जहां पहले होता विवाह, फिर मनाते हैं मातम, जानें अर्जुन के बेटे कैसे बने किन्नरों के देवता
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Koothandavar Temple Koovagam: भारत में स्थित हर मंदिर अपने में रहस्यों और कहानियों को संजोए हुए है. मंदिरों में भक्त अपने कष्टों के निवारण के लिए जाते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद भी मांगते हैं. तमिलनाडु में एक मंदिर ऐसा है, जहां पहले विवाह होता है और फिर मौत का मातम मनाया जाता है. यह मंदिर किन्नरों के देवताओं के रूप में प्रसिद्ध है, जहां किन्नर समाज के लोग 18 दिनों तक चलने वाले खास कूवगम उत्सव को मनाते हैं.

तमिलनाडु के कूवगम में अरावन मंदिर स्थापित है, जिसे कूथंडावर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. यह मंदिर अर्जुन के पुत्र अरावन को समर्पित है, जिन्होंने देवताओं के लिए बलिदान दिया था.

मंदिर अपनी पौराणिक कथा और अनोखे उत्सव के लिए जाना जाता है. मंदिर में तमिल माह चिथिरई (अप्रैल-मई) में 18 दिनों तक किन्नरों द्वारा अनोखा उत्सव मनाया जाता है, जिसमें देशभर के अलग-अलग राज्यों से किन्नर शामिल होने आते हैं और मंदिर में विवाह रचाकर अगले दिन मौत का मातम मनाते हैं.

पौराणिक कथा में मंदिर के इतिहास को महाभारत काल से जोड़कर देखा गया है. माना जाता है कि मां काली की कृपा पाने के लिए पांडवों को नरबलि की आवश्यकता थी और इसके लिए अर्जुन के पुत्र अरावन स्वेच्छा से तैयार थे, लेकिन उनकी शर्त थी कि वे कुंवारे नहीं मरना चाहते. उनकी नर बलि स्वेच्छा स्वीकारने की वजह से कोई भी राजा अपनी पुत्री का विवाह अरावन से नहीं करना चाहता था.
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ऐसे में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके अरावन से विवाह किया और अगले दिन उनकी मृत्यु पर विलाप भी किया. इसी बलिदान की वजह से किन्नर समाज अरावन को अपना देवता मानता है और एक दिन के लिए विवाह भी करता है.

18 दिनों तक चलने वाले कूवगम उत्सव में किन्नर अरावन से शादी करते हैं और अगले दिन मंदिर में अपनी चूड़ियां तोड़ते हुए विलाप करके मृत्यु का शोक मनाते हैं. यह विलाप अरावन को समर्पित होता है, जिन्होंने बिना अपनी परवाह किए एक झटके में बलिदान दे दिया.

इस उत्सव के दौरान सौंदर्य और गायन जैसी कई रोचक प्रतियोगिताएं भी होती हैं. किन्नर समाज अरावन को अपने मुख्य देवता के रूप में पूजता है, जो त्याग और कर्तव्य के एक शक्तिशाली प्रतीक हैं.