दाल नहीं, परंपरा है भद्दू की दाल, जानिए क्यों पहाड़ों में सदियों से खास रही यह रेसिपी – Uttarakhand News

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Cooking Recipe Of Bhaddu’s Dal : भद्दू की दाल बनाने के लिए राजमा और उड़द दाल को अलग-अलग गर्म पानी में रात भर भिगोकर रखा जाता है. इससे दालें अच्छी तरह फूल जाती हैं और पकने पर नरम व मुलायम बनती हैं. अगली सुबह एक भारी बर्तन लिया जाता है, अधिमानतः पारंपरिक भद्दू, और उसे मध्यम आंच पर रखा जाता है

ऋषिकेश: भद्दू की दाल उत्तराखंड की एक लोकप्रिय और पारंपरिक दाल है, जो अपने अनोखे स्वाद और पकाने के खास तरीके के लिए जानी जाती है. इस दाल की खासियत यह है कि इसका नाम किसी दाल पर नहीं, बल्कि इसे पकाने वाले विशेष बर्तन ‘भद्दू’ पर रखा गया है. भारत में आमतौर पर दालों के नाम उनके दानों के आधार पर होते हैं, जैसे मूंग की दाल या उड़द की दाल, लेकिन भद्दू की दाल इस परंपरा से अलग है.

लोकल 18 के साथ बातचीत के दौरान गृहिणी रीना उनियाल ने बताया कि भद्दू की दाल बनाने के लिए राजमा और उड़द दाल को अलग-अलग गर्म पानी में रात भर भिगोकर रखा जाता है. इससे दालें अच्छी तरह फूल जाती हैं और पकने पर नरम व मुलायम बनती हैं. अगली सुबह एक भारी बर्तन लिया जाता है, पारंपरिक भद्दू, और उसे मध्यम आंच पर रखा जाता है. इसमें पानी डाला जाता है और फिर भीगी हुई दालें, नमक और गरम मसाला मिलाया जाता है. इसके बाद भद्दू को ढक्कन या किसी भारी बर्तन से ढक दिया जाता है, ताकि अंदर की गर्मी बनी रहे.

भद्दू की दाल बनाने की विधि
दालों को तब तक उबाला जाता है, जब तक वे पूरी तरह गलकर नरम न हो जाएं. भद्दू में धीमी आंच पर पकने की वजह से दाल धीरे-धीरे गाढ़ी और मखमली बनती है. इसी दौरान एक अलग पैन को आंच पर रखा जाता है और उसमें तेल गरम किया जाता है. तेल गरम होने पर उसमें जीरा, धनिया, सूखी लाल मिर्च, अदरक और लहसुन का पेस्ट तथा सभी साबुत मसाले डाले जाते हैं. इन मसालों को तब तक भुना जाता है, जब तक वे चटकने न लगें और खुशबू न छोड़ दें. अब इसमें कद्दूकस किए हुए ताजे टमाटर डाले जाते हैं और पूरे मिश्रण को अच्छी तरह भून लिया जाता है, ताकि मसाले तेल छोड़ दें. तैयार तड़के को उबलती हुई दाल में मिला दिया जाता है. इसके बाद दाल को भद्दू में लगभग 20 मिनट तक और पकाया जाता है, जिससे मसालों का स्वाद पूरी तरह दाल में समा जाए. लंबे समय तक धीमी आंच पर पकने से दाल का स्वाद बेहद गहरा और लाजवाब हो जाता है.

दाल या फली नहीं,बर्तन है भद्दू
भद्दू कोई दाल या फली नहीं, बल्कि भारी धातु से बना एक पारंपरिक बर्तन है. यह बर्तन पतली गर्दन और भारी तले वाला होता है, जिससे गर्मी समान रूप से फैलती है. पुराने समय में जब भी खुले में दावत या सामूहिक भोज का आयोजन होता था, भद्दू को लकड़ी या कोयले की आग पर रखा जाता था. यह बर्तन धीमी आंच पर खाना पकाने के लिए आदर्श माना जाता है और बारबेक्यू जैसे कार्यों में भी इसका उपयोग किया जाता रहा है.भद्दू में घंटों तक पकाई गई दाल का स्वाद सामान्य बर्तनों में बनी दाल से बिल्कुल अलग होता है. यह न सिर्फ गाढ़ी और मुलायम बनती है, बल्कि इसमें मिट्टी और धातु की हल्की खुशबू भी घुल जाती है, जो इसे खास बनाती है.

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mritunjay baghel

मीडिया क्षेत्र में पांच वर्ष से अधिक समय से सक्रिय हूं और वर्तमान में News-18 हिंदी से जुड़ा हूं. मैने पत्रकारिता की शुरुआत 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से की. इसके बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड चुनाव में ग्राउंड…और पढ़ें

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दाल नहीं, परंपरा है भद्दू की दाल, जानिए क्यों पहाड़ों में सदियों से खास रही यह रेसिपी

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