Smog Control in Delhi: वो 10 उपाय, जो दिल्ली में स्मॉग खत्म करने के लिए किए जाने चाहिए
Smog Control in Delhi: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के बड़े हिस्से में स्मॉग की चादर छाई हुई है. इससे विजिबिलिटी बुरी तरह प्रभावित हुई है. भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने शुक्रवार को दिल्ली के लिए रेड अलर्ट जारी किया और कहा कि सड़क, रेल और हवाई यातायात में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा.
भरोसेमंद आंकड़े
दिल्ली हो या मुंबई, प्रदूषण के वास्तविक स्तर को समझना आज एक बड़ी चुनौती है. पर्याप्त निगरानी केंद्रों (monitoring centers) और सटीक रिपोर्टिंग के बिना यह जानना लगभग असंभव है कि हम कितनी जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं. किसी भी समस्या का समाधान तभी संभव है जब उसे ठीक से समझा जाए. प्रदूषण की इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए हमें विस्तृत और भरोसेमंद आंकड़ों की जरूरत है. बिना सही डेटा के न तो हम समस्या की गहराई को माप सकते हैं और ना ही कोई ठोस रणनीति बना सकते हैं.
धूल, सबसे बड़ा दुश्मन
भारत भर में हवा की गुणवत्ता खराब होने की सबसे बड़ी वजह धूल है. दिल्ली की बात करें तो गर्मियों के मौसम में हवा में मौजूद PM10 कणों का 40% और PM2.5 कणों का 30% हिस्सा धूल ही होता है. शहरों में निर्माण कार्य वाली जगहों और खाली पड़ी कच्ची जमीनों से यह धूल उड़ती है और हवा में घुल जाती है. इसे रोकने के लिए निर्माण स्थलों को ढकना और वहां नियमित रूप से पानी का छिड़काव करना बहुत जरूरी है. इसके साथ ही, शहरों और उनके आसपास हरियाली बढ़ाकर भी हम इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट
सड़क पर दौड़ने वाली लाखों कारें, चंद हजार बसों के मुकाबले कहीं अधिक प्रदूषण फैलाती हैं. कारों की बढ़ती संख्या के कारण पार्किंग की मांग भी बढ़ रही है, जिसकी वजह से शहरों के सार्वजनिक स्थानों से हरियाली खत्म होती जा रही है. इस समस्या का सबसे कारगर समाधान एक बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है. यदि लोगों को पर्याप्त संख्या में, आरामदायक और तेज परिवहन के साधन उपलब्ध हों, तो वे निजी वाहनों का उपयोग कम करेंगे. इससे न केवल सड़कों पर भीड़ कम होगी, बल्कि हवा भी साफ होगी.
निजी वाहन
प्रदूषण कम करने के लिए उत्सर्जन मानकों (Emission Standards) को लागू करने में भारत अब पश्चिमी देशों के बराबर चल रहा है. हालांकि, असल चुनौती यह है कि आज भी सड़कों पर बड़ी संख्या में पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहन दौड़ रहे हैं. सरकार को चाहिए कि वह वाहन मालिकों को अपने पुराने वाहनों को स्क्रैप (कबाड़) करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन या छूट दे. इसके अलावा, प्रदूषण सिर्फ धुएं से ही नहीं फैलता वाहनों के टायरों, ब्रेक और सड़कों के घिसने से भी खतरनाक कण हवा में घुलते हैं. इस समस्या को कम करने के लिए वाहनों के वजन (भार) और गति की सीमा तय की जानी चाहिए, ताकि ईंधन की खपत कम हो और घिसाव के कारण होने वाला प्रदूषण भी घटे.
उद्योग और स्वच्छ ईंधन
कारखानों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन ही तय करता है कि वे कितना प्रदूषण फैलाएंगे. कई उद्योग अत्यधिक प्रदूषण फैलाते हैं, इसलिए उन्हें धीरे-धीरे बिजली से चलाने (Electrification) पर जोर देना एक बेहतर विकल्प है. जो कारखाने अब भी कोयले, तेल या गैस का उपयोग कर रहे हैं, उनमें उत्सर्जन नियंत्रण (Emission Control) के पुख्ता इंतजाम होना अनिवार्य है. इससे निकलने वाले धुएं और जहरीले कणों को हवा में घुलने से पहले ही रोका जा सकता है, जो पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है.
कोयला उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला ईंधन है. भारत की ऊर्जा जरूरतों का 70% से ज्यादा हिस्सा आज भी कोयले से ही पूरा होता है. हालांकि, प्रदूषण का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम कोयले का उपयोग किस तरह कर रहे हैं. इतिहास हमें सिखाता है कि इसका गलत उपयोग कितना खतरनाक हो सकता है. 1952 के ‘लंदन स्मॉग’ के दौरान ब्रिटेन में महज 18% कोयले का इस्तेमाल घरों को गर्म रखने के लिए हुआ था, लेकिन वही सर्दियों में होने वाले 60% धुएं का मुख्य कारण बना. इसके विपरीत, बीजिंग ने एक सकारात्मक उदाहरण पेश किया. 2005 से उन्होंने अपने बिजली संयंत्रों (Power Plants) में कोयले की जगह गैस का उपयोग शुरू किया, जिससे वे प्रदूषण को काफी हद तक कम करने में सफल रहे.
बायोमास का इस्तेमाल
लकड़ी, गोबर और फसल के अवशेष जैसे बायोमास को जलाना प्रदूषण की एक गंभीर समस्या है. दिल्ली में सर्दियों की शुरुआत में होने वाले धुएं का मुख्य कारण धान की पराली जलाना ही है. आज भी दिल्ली-एनसीआर के लगभग 30 लाख घरों में खाना पकाने या गर्मी के लिए बायोमास का इस्तेमाल होता है. यह वास्तव में दुखद है कि जिस कचरे को हम जलाकर हवा जहरीली कर रहे हैं, वह एक मूल्यवान संसाधन हो सकता है. उदाहरण के लिए, गोबर से बायोगैस और फसल के अवशेषों से इथेनॉल तैयार किया जा सकता है. इस तरह, इस अपशिष्ट का सही उपयोग करके हम घरों और वाहनों के लिए स्वच्छ ऊर्जा पैदा कर सकते हैं.
फसल चक्र में बदलाव
सरकार को चाहिए कि वह किसानों को धान और गेहूं के पारंपरिक चक्र से बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित करे और उन्हें जरूरी सहायता दे. यदि किसान इन फसलों के अलावा अन्य फसलों की खेती की ओर बढ़ते हैं, तो इससे धान की पराली (अवशेषों) को जलाने की समस्या में काफी कमी आएगी. फसल विविधीकरण न केवल मिट्टी की सेहत के लिए अच्छा है, बल्कि यह वायु प्रदूषण को कम करने में भी एक बड़ी भूमिका निभा सकता है.
मुंबई और अन्य तटीय (समुद्र किनारे के) इलाकों में समुद्री नमक के कण हवा में घुल जाते हैं, जिसे रोकना हमारे हाथ में नहीं है. लेकिन हम उन कारणों पर ध्यान दे सकते हैं जिन्हें नियंत्रित किया जा सकता है. उदाहरण के लिए जहाजों के इंजनों में इस्तेमाल होने वाला भारी तेल, पेट्रोल और डीजल के मुकाबले कई गुना ज्यादा प्रदूषण फैलाता है. इसके लिए कड़े मानक और नियम बनाना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही, हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जिन एरोसोल उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं-जैसे कि परफ्यूम, डियो और रूम फ्रेशनर. वे भी वायु प्रदूषण में इजाफा करते हैं. इनके प्रति जागरूक होकर भी हम हवा को साफ रखने में योगदान दे सकते हैं.
वायु प्रदूषण किसी एक शहर या देश की सीमा तक सीमित नहीं रहता. कोविड लॉकडाउन के दौरान यह देखा गया कि बीजिंग की हवा में उतना सुधार नहीं हुआ जितनी उम्मीद थी, क्योंकि हवाएं करीब 1,000 किलोमीटर दूर से प्रदूषण बहाकर ला रही थीं. इसी तरह, हमारे देश में पश्चिमी भारत की हवा की गुणवत्ता पर पड़ोसी देश पाकिस्तान के प्रदूषण का सीधा असर पड़ता है. हवा का कोई अपना नक्शा नहीं होता, इसलिए प्रदूषण जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए पड़ोसी देशों के बीच आपसी तालमेल और सहयोग होना बहुत जरूरी है.