‘बजट एकदम गड़बड़ा गया है’, नए सेशन में फीस और किताबों को लेकर स्कूल की मनमानी, सुनिए अभिभावकों की परेशानी

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चंदौली: जिले में निजी कॉन्वेंट स्कूलों की ओर से किताब, ड्रेस और फीस में की गई भारी बढ़ोतरी ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है. महज एक वर्ष के भीतर स्कूल से जुड़े खर्चों में हजारों रुपये का इजाफा हुआ है, जिससे खासकर मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा अब धीरे-धीरे आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है.

दरअसल अभिभावकों के अनुसार, पिछले वर्ष कक्षा 4 की किताबें जहां लगभग 5500 रुपये में मिल जाती थीं, वहीं इस वर्ष उनकी कीमत बढ़कर 7837 रुपये तक पहुंच गई है. यानी सिर्फ किताबों पर ही करीब 2000 रुपये से अधिक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है. इसके अलावा एडमिशन फीस, वार्षिक शुल्क (एनुअल फीस) और ट्यूशन फीस में भी वृद्धि की गई है.

अभिभावकों के पास विकल्प नहीं 
स्थानीय अभिभावक गुरदीप सिंह ने इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए लोकल 18 से बताया कि इस साल स्कूलों ने हर स्तर पर फीस बढ़ा दी है. उन्होंने कहा कि एडमिशन फीस, ट्यूशन फीस और किताबों और ड्रेसों के दाम सभी में बढ़ोतरी हुई है. हालांकि स्कूल कुछ सुविधाएं देने की बात करते हैं, लेकिन यह खर्च आम आदमी के बजट से बाहर जा रहा है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई स्कूल किताबों और ड्रेस की खरीद के लिए विशेष दुकानों को तय कर देते हैं, जिससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता है.

मनमानी वसूली कर रहे निजी स्कूल 
गुरदीप सिंह ने आगे कहा कि छोटे स्कूलों में फीस कम है, लेकिन वहां छात्रों की संख्या बहुत कम है. वहीं, बेहतर शिक्षा के नाम पर बड़े निजी स्कूल मनमानी वसूली कर रहे हैं. उन्होंने सरकार से मांग की है कि सरकारी स्कूलों को भी निजी स्कूलों के स्तर पर विकसित किया जाए, ताकि अभिभावकों को एक बेहतर और सस्ता विकल्प मिल सके.

स्कूलों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल 
इसी तरह कुलप्रीत सिंह ने भी निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. उन्होंने लोकल 18 से कहा कि प्राइवेट स्कूलों में फीस के साथ-साथ किताब और ड्रेस के दाम भी लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. कई बार ऐसा लगता है कि स्कूलों और दुकानों के बीच आपसी सांठ-गांठ है. उन्होंने बताया कि छोटे बच्चों, जैसे प्ले ग्रुप के छात्रों की फीस भी हजारों रुपये में पहुंच गई है, जो अभिभावकों के लिए चिंता का विषय है.

10 हजार रुपये तक पहुंच जाता है खर्च 
कुलप्रीत सिंह ने यह भी बताया कि अलग-अलग कक्षाओं की फीस में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रखा गया है. उन्होंने कहा कि कक्षा 1 और कक्षा 8 के बच्चों के खर्च में भी ज्यादा फर्क नहीं दिखता. किताबें और ड्रेस लेने के बाद कुल खर्च लगभग 10 हजार रुपये तक पहुंच जाता है. उन्होंने सरकार से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने और उचित नियम लागू करने की मांग की.

उसी दुकान से खरीदना पड़ता है सामान 
एक अन्य अभिभावक अनीस यादव ने भी निजी स्कूलों पर शिक्षा के व्यवसायीकरण का आरोप लगाया. उन्होंने लोकल 18 से कहा कि पिछले साल के मुकाबले इस साल किताब और ड्रेस के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं. शिक्षा के नाम पर अब व्यापार ज्यादा हो रहा है. उन्होंने बताया कि स्कूल अक्सर विशेष प्रकाशकों और दुकानों से जुड़े होते हैं, जिससे अभिभावकों को मजबूरी में उसी दुकान से सामान खरीदना पड़ता है.

सरकार को ठोस कदम उठाने की जरूरत 
अनीस यादव ने कहा कि स्कूल यह तय कर देते हैं कि कौन-सी किताबें चलेंगी और वे केवल एक ही दुकान पर उपलब्ध होती हैं. इससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं रहता और उन्हें ऊंचे दाम चुकाने पड़ते हैं. उन्होंने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

किताबों की कीमतों पर रखी जाए निगरानी 
बता दें कि चंदौली जिले में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और किताबों के दाम ने अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डाला है. अभिभावकों का मानना है कि यदि इस पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया, तो शिक्षा केवल एक सीमित वर्ग तक ही सिमट कर रह जाएगी. उन्होंने सरकार से अपील की है कि निजी स्कूलों की फीस संरचना और किताबों की कीमतों पर निगरानी रखी जाए. साथ ही सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए, ताकि सभी वर्गों के बच्चों को समान और सुलभ शिक्षा मिल सके.

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