90 के दशक की सबसे ‘गोल्डन’ जोड़ी, 1993 से 1999 के बीच दे डाली 6 ब्लॉकबस्टर, एक्ट्रेस की 1 जिद से बिखरा सब कुछ

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अगर 90s में बॉलीवुड के इतिहास में कोई जोड़ी थी, तो वह बिना किसी शक के गोविंदा और करिश्मा कपूर की थी. चीची की बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग और लोलो की बेहिसाब एनर्जी ने स्क्रीन पर जादू कर दिया, जिसे आज भी गोल्डन एरा माना जाता है. 1993 से 1999 के बीच, इस जोड़ी ने लगातार 6 ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस का समीकरण बदल दिया. लेकिन सफलता के इस शिखर पर पहुंचने के बाद, करिश्मा कपूर की एक जिद और उनकी बदलती प्राथमिकताओं ने इस सुपरहिट जोड़ी के बीच दरार पैदा कर दी और यह करिश्मा फिर कभी नहीं दिखा.

नई दिल्ली. आज जहां ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री की बात अक्सर बड़े नामों से होती है, वहीं 90s में केमिस्ट्री का मतलब सिर्फ गोविंदा और करिश्मा कपूर होता था. रंगीन कपड़े, दमदार डांस मूव्स और मजेदार डायलॉग… इस जोड़ी ने सिनेमाघरों को एक फेस्टिवल में बदल दिया. डेविड धवन के डायरेक्शन में इस जोड़ी ने जो सफलता हासिल की, वह आज भी फिल्म प्रेमियों के लिए एक सबूत है.

इस जोड़ी का सफर 1993 की फिल्म ‘मुकाबला’ से शुरू हुआ, लेकिन उन्हें असली कामयाबी 1994 में मिली. 1993 और 1999 के बीच, उन्होंने एक के बाद एक ऐसी फिल्में दीं जिन्होंने उन्हें बॉक्स ऑफिस का किंग और क्वीन बना दिया, जिसमें राजा बाबू (1994), कुली नंबर 1 (1995), साजन चले ससुराल (1996), हीरो नंबर 1 (1997), और हसीना मान जाएगी (1999) जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में शामिल थीं.

1996 में ‘राजा हिंदुस्तानी’ की जबरदस्त कामयाबी के बाद, करिश्मा कपूर की इमेज पूरी तरह बदल गई. उन्हें ग्लैमरस डॉल के बजाय सीरियस एक्ट्रेस के तौर पर देखा जाने लगा. इससे उनमें एक जिद पैदा हुई, जिसने गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी पर असर डाला.

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करिश्मा अब सिर्फ मसाला कॉमेडी तक ही सीमित नहीं रहना चाहती थीं. वह यश चोपड़ा और सूरज बड़जात्या जैसे बड़े बैनर के साथ काम करना चाहती थीं, जहां उन्हें सीरियस रोल मिल सकें. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उन्हें खान्स के साथ काम कर अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थीं और यही उनकी एक जिद से बॉलीवुड की सबसे गोल्डन जोड़ी का अंत हो गया. उन्होंने खुद को मेकओवर देने का पक्का इरादा कर लिया था. उन्होंने ‘दिल तो पागल है’ साइन की, जिसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला. इस नई पहचान ने उन्हें गोविंदा की मास अपील फिल्मों से दूर करना शुरू कर दिया.

कहा जाता है कि उस समय गोविंदा की सेट पर देर से आने की आदत भी करिश्मा को परेशान करती थी. अब जब वह नेशनल अवॉर्ड विनिंग एक्ट्रेस बन गई थीं, तो वह अपनी प्रोफेशनल लाइफ में ज्यादा डिसिप्लिन और बड़े प्रोजेक्ट्स की तलाश में थीं. गोविंदा अभी भी अपनी पुराने जमाने की फिल्मों में बिजी थे. करिश्मा इस बात पर अड़ी थीं कि वह सिर्फ वही फिल्में साइन करेंगी जिनमें उनका रोल सिर्फ गानों तक सीमित न हो. धीरे-धीरे, उन्होंने गोविंदा के साथ छोटे-मोटे ऑफर रिजेक्ट करने शुरू कर दिए. हालांकि दोनों के बीच कोई पब्लिक झगड़ा नहीं था, लेकिन प्रोफेशनली उनके रास्ते अलग हो गए.

डेविड धवन, गोविंदा और करिश्मा की तिकड़ी बॉलीवुड की सबसे सफल टीम थी, लेकिन जब करिश्मा ने बड़े बैनर और सीरियस सिनेमा का रुख किया, तो डेविड धवन को अपनी फिल्मों के लिए नई एक्ट्रेस (जैसे रवीना टंडन और जूही चावला) ढूंढनी पड़ीं. कहा तो ये भी जाता है कि गोविंदा ने इस जोड़ी को साथ रखने की कोशिश की, लेकिन करिश्मा के बदलते रवैये ने इसे नामुमकिन कर दिया.

2000 के बाद, गोविंदा का करियर भी ढलान पर आने लगा और करिश्मा ने अभिषेक बच्चन के साथ अपनी सगाई और उसके बाद के पर्सनल कमिटमेंट्स की वजह से फिल्मों से दूरी बना ली. ‘शिकारी’ के बाद, यह जोड़ी कभी भी अपना पुराना चार्म वापस नहीं पा सकी.

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