3 साल 31 मैच और जीत के नाम पर जीरो, बदल गए 2 कप्तान, फिर भी नहीं हुई राह आसान, भारतीय क्रिकेट का सबसे बुरा दौर
Last Updated:
1981 से 1984 के बीच भारतीय टीम ने 31 टेस्ट खेले जिसमें से 9 मैच हार गई और 22 टेस्ट मैच ड्रा खेले. ये वो दौर था जब पाकिस्तान की टीम ने भारतीय टीम को कई सीरीज में एकतरफ मुकाबलों में हराया. 1983 वर्ल्ड कप जीतने के तुरंत बाद भारत दौरे पर आई वेस्टइंडीज ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.

1981-1984 के बीच खेले गए 31 टेस्ट में एक भी मैच नही जीत पाई थी भारतीय टीम
नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट के इतिहास में 1980 के दशक का शुरुआती दौर एक ऐसा विरोधाभास था जिसे आज भी ‘काला अध्याय’ कहा जाता है. एक तरफ भारत ने 1983 में विश्व कप जीतकर सीमित ओवरों के खेल में अपनी बादशाहत कायम की थी, वहीं दूसरी तरफ टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया एक ऐसे सूखे से जूझ रही थी, जिसने भारतीय प्रशंसकों के धैर्य की परीक्षा ले ली. 1981 से 1984 के बीच का वह दौर, जब भारतीय टीम ने लगातार 31 टेस्ट मैचों में एक भी जीत दर्ज नहीं की, क्रिकेट के मैदान पर टीम की लाचारी की सबसे बड़ी गवाही देता है.
ये वो समय था जब वेस्टइंडीज क्रिकेट की दुनिया पर राज करता था और उनके गेंदबाजों के सामने बल्लेबाजों के हाथ पैर फूल जाते थे. 1981 से 1984 के बीच भारतीय टीम 9 टेस्ट हार गई और 22 टेस्ट मैच ड्रा खेले. ये वो दौर था जब पाकिस्तान की टीम ने भारतीय टीम को कई सीरीज में एकतरफ मुकाबलों में हराया. 1983 वर्ल्ड कप जीतने के तुरंत बाद भारत दौरे पर आई वेस्टइंडीज ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
कप्तानी का भंवर: गावस्कर और कपिल की विफलता
इस तीन साल के लंबे अंतराल में भारतीय क्रिकेट के दो सबसे बड़े दिग्गज सुनील गावस्कर और कपिल देव ने बारी-बारी से टीम की कमान संभाली पर नतीजा जस का तस रहा. आंकड़ों पर नजर डालें तो सुनील गावस्कर ने 17 टेस्ट मैचों में और कपिल देव ने 14 टेस्ट मैचों में कप्तानी की. हैरानी की बात यह है कि दोनों ही दिग्गज अपनी रणनीति और नेतृत्व से टीम को एक भी जीत दिलाने में नाकाम रहे. गावस्कर की कप्तानी में टीम रक्षात्मक रुख अपनाती दिखी, तो कपिल की आक्रामकता भी नतीजों में तब्दील नहीं हो पाई. यह वह दौर था जब मैदान पर भारतीय खिलाड़ी बिखरे हुए नजर आते थे और विपक्षी टीमें भारत को आसानी से ड्रॉ या हार की ओर धकेल देती थीं.
बल्लेबाजी का पतन और 90 रन का वो शर्मनाक स्कोर
इस काले अध्याय के दौरान भारतीय बल्लेबाजी की गहराई भी जवाब दे गई थी. 31 टेस्ट मैचों के लंबे सफर में भारतीय टीम सिर्फ दो बार 500 रनों का आंकड़ा पार कर सकी. यह आंकड़ा उस दौर की भारतीय बल्लेबाजी की संघर्षपूर्ण स्थिति को बयां करता है. बल्लेबाजों के पास न तो टिकने का जज्बा दिख रहा था और न ही बड़े स्कोर खड़ा करने की भूख. इस गिरावट का सबसे शर्मनाक मंजर कोलकाता के ऐतिहासिक ईडन गार्डन्स में देखने को मिला. वेस्टइंडीज के घातक तेज गेंदबाजों के सामने भारतीय बल्लेबाजी ताश के पत्तों की तरह ढह गई और पूरी टीम महज 90 रनों पर सिमट गई. घरेलू मैदान पर दर्शकों के सामने टीम इंडिया का यह प्रदर्शन भारतीय क्रिकेट के गिरते स्तर का प्रतीक बन गया.
संघर्ष की दास्तां
यह दौर केवल हार का नहीं, बल्कि क्रिकेट के बुनियादी सिद्धांतों को भूल जाने का था. वेस्टइंडीज की ‘पेस बैटरी’ और इंग्लैंड की तकनीकी कुशलता के सामने भारतीय खिलाड़ी असहाय नजर आए. विपक्षी टीमें जानती थीं कि भारत के पास विकेट लेने वाले गेंदबाजों की कमी है और बल्लेबाज दबाव में जल्दी घुटने टेक देते हैं.
31 मैचों का यह बिना जीत का सिलसिला 1984 के अंत में जाकर थमा, लेकिन इसने भारतीय टेस्ट क्रिकेट की साख को गहरी चोट पहुंचाई. आज जब हम भारतीय टीम को दुनिया के हर कोने में जीतते देखते हैं, तो 1981-84 का यह ‘काला अध्याय’ हमें याद दिलाता है कि सफलता के शिखर पर पहुंचने से पहले भारतीय क्रिकेट ने असफलता का कितना कड़वा स्वाद चखा है. यह तीन साल भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं थे, जहाँ वर्ल्ड चैंपियन का टैग तो था, लेकिन टेस्ट की सफेद जर्सी में टीम अपनी पहचान खो चुकी थी.