Explainer: सीईसी के खिलाफ प्रस्ताव क्यों हुआ खारिज? कैसे ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष का दांव हुआ फेल

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नई दिल्ली. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने खारिज कर दिया. इस फैसले के बाद संसद में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की कोशिश की गयी, जो पूरी तरह फेल हो गई. विपक्ष द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव कानूनी प्रक्रिया और तथ्यों की जांच में टिक नहीं पाया और स्‍पीकर ने इसे खारिज कर दिया. इस संबंध में राज्यसभा सचिवालय और लोकसभा बुलेटिन में जारी बयान में साफ कहा गया कि प्रस्ताव पर ‘सावधानीपूर्वक और निष्पक्ष आकलन’ के बाद दोनों सदनों के प्रमुखों ने जजेस (इंक्‍वायरी) एक्‍ट, 1968 की धारा 3 के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और वापस कर दिया.

इस संबंध में 12 मार्च को विपक्ष ने दोनों सदनों में नोटिस दिया था. लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेतृत्व में विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सात आरोप लगाए थे.

क्या कहती है कानूनी प्रक्रिया ?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 ( 5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह ही हटाया जा सकता है. पूर्ण महाभियोग की प्रक्रिया से दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी है. चीफ इलेक्‍शन कमिश्‍नर एंड आदर इलेक्‍शन कमिश्‍नर एक्‍ट, 2023 और जजेस ( इंक्‍वयारी) एक्‍ट 1968 की धारा 3 स्पीकर और सभापति को यह अधिकार देती है कि वे प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों की शुरुआती जांच के आधार पर फैसला करें कि इस प्रस्‍ताव को आगे बढ़ाना है या खारिज कर देना है.
इसी प्रावधान के तहत स्पीकर ओम बिरला और सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने सभी तथ्यों, दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करने के बाद प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

ये थे मुख्‍य आरोप

सरकार के इशारे पर काम करना, चुनावी गड़बड़ियों की जांच में बाधा डालना, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईार) प्रक्रिया के जरिए बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करना और पक्षपातपूर्ण व्यवहार करना शामिल है, ि‍जसके आधार पर वपिक्ष प्रस्‍ताव लेकर आया था.

फुस्‍स हुआ विपक्ष का दावा

विपक्ष का दावा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार संवैधानिक पद की गरिमा बनाए रखने में नाकाम रहे हैं. इस तरह विपक्ष ने सीधा सीधा उन पर आरोप लगाए गए थे. इसी आधार पर प्रस्‍ताव लेकर आया था. जो फुस्‍स हो गया.

क्‍या कहा चुनाव आयोग ने

चुनाव आयोग ने सभी आरोपों को एक सिरे से खारिज किया है. उसने कहा कि कोई भी शिकायत शपथ-पत्र के साथ लिखित रूप में दी जाए, जांच की जाएगी. इस मामले में ऐसा नहीं हुआ है. आयोग का दावा है कि वह पूरी स्वायत्तता और निष्पक्षता के साथ काम कर रहा है.

इसलिए फेल हुआ विपक्ष का दांव?

विशेषज्ञों के अनुसार विपक्ष का प्रस्ताव मुख्य रूप से तीन वजहों से खारिज हुआ है. इसें कमजोर सबूत थे, आरोप गंभीर थे, लेकिन मजबूत साक्ष्य और शपथ-पत्र के साथ शिकायत नहीं दी गई, जैसा चुनाव आयोग ने मांगा था. कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की गयी्. महाभियोग जैसी गंभीर प्रक्रिया के लिए प्रारंभिक जांच में आरोप ‘प्राइमा फेसी’ सही साबित होने चाहिए थे, जो विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्‍तावों में नहीं मिले. विपक्ष ने इसे राजनीतिक रंग दिया है. इसे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं, क्‍योंकि मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त निपक्ष्‍य होकर अपना काम करते हैं. सरकार इसे विपक्ष की हताशा बता रही है.

विपक्ष बोला…

प्रस्ताव खारिज होने के बाद विपक्ष ने हमला बोला है. टीएमसी नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि ‘बिना कोई कारण बताए प्रस्ताव खारिज कर दिया गया, यह संसद का मजाक है’. वहीं कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता जयराम रामेश ने भी फैसले पर सवाल उठाए हैं. हालांकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी पहले ही कुछ राज्यों में मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगा चुके थे. विपक्ष लगातार इस तरह के आरोप लगा रहा है. राहुल गांधी कई बार मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त पर इस तरह के आरोप लगा चुके हैं. पर उनके पास मजबूत साक्ष्‍य नहीं होते हैं. इस बार भी विपक्ष का प्रस्‍ताव इसी तरह से लगाया गया था. जिसका कोई मजबूत आधार नहीं था. इस वजह से यह प्रस्‍ताव टिक नहीं पाया और खारिज कर दिया गया है.

संविधान में पद की मजबूत सुरक्षा की व्‍यवस्‍था

संविधान ने इस पद को मजबूत सुरक्षा दी है ताकि चुनावी प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव न पड़े. वरना विपक्ष आए दिन इस तरह के आरोप लगाकर सवाल उठाता रहेगा. इस तरह विपक्ष का यह पहला प्रयास असफल रहा. वो बगैर पूरी तैयारी और सबूतों के आधार पर प्रस्‍ताव लेकर आए थे. फिलहाल ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहेंगे और आगामी चुनावी तैयारियों की निगरानी करेंगे. इस घटना से संसद में राजनीतिक तनाव बढ़ा है और विपक्ष सरकार पर ‘संस्थाओं पर कब्जा’ का आरोप लगाने लगा है.

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