greater noida west metro delay | greater noida news | ग्रेटर नोएडा वेस्ट मेट्रो में देरी

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Greater Noida West Metro: ग्रेटर नोएडा वेस्ट की 15 लाख आबादी और 150 से ज्यादा हाउसिंग सोसाइटियों के लिए मेट्रो का सपना अब एक कभी न खत्म होने वाला इंतजार बन चुका है. साल 2010 में घर खरीदते वक्त बिल्डरों ने जिस मेट्रो कनेक्टिविटी का वादा किया था, वह एक दशक बाद भी सिर्फ कागजी नक्शों और डीपीआर के खेल में उलझा हुआ है. स्थानीय निवासियों का दर्द है कि मेट्रो के भरोसे उन्होंने निजी वाहन तक नहीं खरीदे, लेकिन अब बाल सफेद होने को आए और व्यवस्था अब भी जस की तस बनी हुई है.

ग्रेटर नोएडा: उत्तर प्रदेश का ग्रेटर नोएडा वेस्ट, जिसे लोग नोएडा एक्सटेंशन के नाम से भी जानते हैं, आज देश के सबसे तेजी से विकसित होते रिहायशी इलाकों में शुमार है. यहां आसमान छूती बहुमंजिला इमारतें और सैकड़ों हाउसिंग सोसाइटियां एक आधुनिक शहर की तस्वीर पेश करती हैं. करीब 15 लाख की विशाल आबादी वाले इस क्षेत्र में सब कुछ है, लेकिन जिस एक चीज की सबसे ज्यादा कमी खलती है, वह है मेट्रो कनेक्टिविटी. सालों से मेट्रो का इंतजार कर रहे लाखों लोगों के लिए अब यह सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि उनके सब्र का इम्तिहान बन गया है.

सुनहरे सपनों और अधूरे वादों में उलझी जिंदगी
करीब 2010 के आसपास जब इस इलाके में हजारों परिवारों ने अपने सपनों का घर खरीदा था, तब उन्हें बिल्डरों और सरकारी योजनाओं में मेट्रो का सपना बड़े जोर-शोर से दिखाया गया था. बेहतर कनेक्टिविटी के इसी वादे के भरोसे मध्यमवर्गीय परिवारों ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी यहां लगा दी. कई लोगों ने तो यह सोचकर अपनी गाड़ी तक नहीं खरीदी कि मेट्रो आने से उनका दिल्ली-नोएडा का सफर आसान हो जाएगा. लेकिन आज हकीकत यह है कि एक दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी पटरी पर मेट्रो की नींव तक नहीं रखी गई है.

लोगों का दर्द, मेट्रो के इंतजार में बाल सफेद हो गए…
स्थानीय निवासी धीरज कुमार बताते हैं कि घर लेते वक्त जो उम्मीदें जागी थीं, वो आज भी धरातल पर वैसी ही अधूरी पड़ी हैं. वहीं दीपांकर कुमार का कहना है कि पिछले कई सालों से प्रशासन सिर्फ डीपीआर का खेल खेल रहा है. कभी पांच स्टेशनों की बात होती है तो कभी दस की, लेकिन योजनाएं सिर्फ फाइलों में ही बदलती रहती हैं. वहीं, स्थानीय निवासी गुफरान खान ने बताया कि उन्होंने सिर्फ मेट्रो के भरोसे यह घर लिया था क्योंकि उनके पास अपनी गाड़ी नहीं है. उनका दर्द है कि सालों बीत गए और अब बाल सफेद होने को आए हैं, लेकिन मेट्रो आज भी सिर्फ एक सपना ही बनी हुई है.
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150 सोसाइटियों का बोझ और चरमराई परिवहन व्यवस्था
ग्रेटर नोएडा वेस्ट में आज 150 से ज्यादा ऊंची सोसाइटिया हैं, जहां लाखों लोग रहते हैं. इतनी बड़ी आबादी के लिए एक मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का होना अनिवार्य है. फिलहाल लोगों को नोएडा, दिल्ली या गुरुग्राम पहुंचने के लिए निजी वाहनों, डग्गामार ऑटो या बसों का सहारा लेना पड़ता है. इससे न केवल सड़कों पर जाम की स्थिति बनी रहती है, बल्कि प्रदूषण और लोगों के कीमती समय की बर्बादी भी हो रही है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट के अभाव में यहां रहने वाले हर परिवार की निर्भरता निजी वाहनों पर बढ़ गई है, जो व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है.

आखिर कहां फंसा है मेट्रो का पेंच?
मेट्रो प्रोजेक्ट को लेकर बार-बार नई रिपोर्ट (DPR) तैयार की जाती है और उसमें बदलाव किए जाते हैं, लेकिन मामला मंजूरी और फंडिंग के स्तर पर आकर अटक जाता है. जानकारों की मानें तो अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी, बजट की समस्या और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता इस प्रोजेक्ट की देरी की मुख्य वजहें हैं. जब तक शासन और प्रशासन इस दिशा में कोई ठोस और त्वरित कदम नहीं उठाते, तब तक ग्रेटर नोएडा वेस्ट के लाखों निवासियों का यह सफर इसी तरह संघर्षपूर्ण बना रहेगा.

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Seema Nath

सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें

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