मुकेश-लता का वो एवरग्रीन ब्लॉकबस्टर गाना, 2 बार हुआ रिजेक्ट, आज गुनगुनाती है पूरी दुनिया, मूवी हुई सुपरहिट
Last Updated:
Mukesh Lata Evergreen Song : मुकेश-लता मंगेशकर का 50 साल पुराना वो गाना जिसे ‘रोमांस का एंथम’ कहा जाता है, जिसे सुनते ही दिल पुरानी यादों में खो जाता है, उसे दो बार रिजेक्ट किया गया. सुरीली धुन में सजकर यह गाना दुनिया के सामने करीब 34 साल बाद आया. दो बार यह गाना रिजेक्ट भी हुआ. इस सुपरहिट गाने को रिकॉर्ड करने के लिए भारतीय नौसेना की मदद लेनी पड़ी थी. इतना ही नहीं, फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपना जलवा बिखेरा था. यह गाना सिंगर मुकेश की पहचान बन गया. उन्हें इसके लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला. जब गाना हिट हुआ तो कोर्ट-कचहरी का विवाद अलग से हुआ. वो सुपरहिट एवरग्रीन गाना कौन सा था, फिल्म कौन सी थी, आइये जानते हैं पूरी दास्तान…….
बीआर चोपड़ा के भाई यश चोपड़ा ने ‘वक्त’ फिल्म की रिलीज के बाद अपना प्रोडक्शन हाउस खोला था. ‘दाग’ उनके प्रोडक्शन में बनी पहली फिल्म थी जो कि 1973 में आई थी. दाग कामयाब रही. फिर उन्होंने राखी-अमिताभ बच्चन के साथ एक ऐसी फिल्म बनाई जिसने पर्दे पर ऐसा जादू बिखेरा कि आज भी इस मूवी को दर्शक भुला नहीं पाए हैं. इसी फिल्म में मुकेश-लता मंगेशकर का एक कालजयी गाना था. इस गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था. यह गाना 32 साल में दो बार रिजेक्ट हुआ. यश चोपड़ा ने अपनी फिल्म में लिया और संगीतकार खय्याम साहब की धुन में अमर हो गया.
महान शायर-गीतकार साहिर लुधियानवी की कविताओं का संग्रह 1940 के दशक में ‘तल्खियां’ नाम से छपा था. ‘तल्खियां’ में एक दर्द भरी नज्म ‘कभी-कभी’ थी. समय बीता. 1960 के दशक में देवानंद के भाई चेतन आनंद एक फिल्म ‘काफिर’ बना रहे थे. इसमें देवानंद, बलराज साहनी, प्रिया राजवंश, गीता बाली लीड रोल में थे. गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार ख्य्याम थे. चेतन आनंद को ‘कभी-कभी’ कविता बहुत पसंद थी. उन्होंने इसे रिकॉर्ड करने का फैसला किया. संगीतकार खय्याम ने सुधा मल्होत्रा और गीता बाली से एक गाना रिकॉर्ड करवाया. यह गाना था : कभी-कभी मेरे दिल में, ख्याल आता है. सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. फिल्म की शूटिंग के दौरान गीता बाली गुजर गईं. ऐसे में यह फिल्म बंद कर दी गई.
इसी के साथ खय्याम साहब की वो जादुई धुन भी डिब्बे में बंद हो गई. साल 1966 में जब चेतन आनंद राजेश खन्ना-इंद्राणी मुखर्जी को लेकर ‘आखिरी खत’ बना रहे थे तो संगीत की जिम्मेदारी खय्याम को मिली. खय्याम ने ‘काफिर’ फिल्म के रिकॉर्ड किए गए गाने ‘कभी-कभी’ को ‘आखिरी खत’ में लेने के बारे में पूछा. इस पर चेतन आनंद ने कहा कि इसमें वो धुन इस्तेमाल नहीं हो सकेगी. फिल्म में ऐसी सिचुएशन ही नहीं है. उस गाने को सुधा मल्होत्रा और गीता बाली ने गाया था. फिल्म में सिर्फ एक हीरोइन इंद्राणी मुखर्जी थी. ऐसे में उस गाने को फिर से रिकॉर्ड करने के लिए चेतन आनंद तैयार नहीं हुए. और इस तरह से वो गाना ‘आखिरी खत’ से भी बाहर हो गया.
Add News18 as
Preferred Source on Google
समय का पहिया घूमा. ‘रोमांस के जादूगर’ यश चोपड़ा 1973 में आई ‘दाग’ फिल्म की कामयाबी के बाद एक और फिल्म बनाना चाहते थे. उनकी पत्नी पामेला चोपड़ा ने कहानी लिखी. फिल्म बनी ‘कभी-कभी’. यश चोपड़ा गीतकार साहिर लुधियानवी को बहुत पसंद करते थे. वो साहिर लुधियानवी की ‘कभी-कभी’ नज्म का इस्तेमाल अपनी फिल्म में करना चाहते थे. उन्होंने अपनी फिल्म का टाइटल ही ‘कभी-कभी’ रख दिया. यह बात 1973-74 के आसपास की है. साहिर लुधियानवी के कहने पर ही यश चोपड़ा ने इस फिल्म के म्यूजिक के लिए खय्याम को चुना था. खय्याम ने इस फिल्म का ऐसा कालजयी म्यूजिक तैयार किया, जो तब भी हिट था और आज भी हिट है.
‘कभी-कभी’ और ‘दीवार’ की शूटिंग एकसाथ शुरू हुई थी. कहा जाता है कि ‘कभी-कभी’ फिल्म की कहानी गीतकार साहिर लुधियानवी की निजी जिंदगी से इंस्पायर्ड थी. हालांकि यश चोपड़ा ने कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं किया. ‘कभी-कभी’ नज्म ने फिल्म को अमर पहचान दी. साहिर साहब ने अपनी कविता के अल्फाजों को बदला था. खय्याम ने उसे संगीत से तराशा. और एक ऐसा रोमांटिक गाना तैयार हुआ जिसे सुनकर आज भी प्रेमी जोड़ी दुनिया भूल जाते हैं.
खय्याम साहब ने इस गाने के लिए सिंगर मुकेश को चुना. मुकेश ने अपनी दर्दभरी और रेशमी आवाज से जब इस नज्म को गाया तो ऐसा लगा जैसे रूह और जिस्म का मिलन हो गया है. लता मंगेशकर की आवाज में गाने का फीमेल वर्जन भी रिकॉर्ड किया गया जिसने गाने को संपूर्णता दी.
जब गाना रिकॉर्ड करने की बारी आए तो उसी दिन म्यूजिशियन की हड़ताल हो गई. साज बजाने वाले संगीतकार स्टूडियो नहीं आए. तब डायरेक्टर यश चोपड़ा ने भारतीय नौसेना के संगीतकारों को बुलाया और उनकी धुनों पर गाना रिकॉर्ड करवाया.
फिल्म में इस नज्म के दो अलग चेहरे देखने को मिलते हैं जो कहानी के दो छोरों को जोड़ते हैं. शुरुआत में सपनों से भरा युवा अमित (अमिताभ बच्चन) अपनी प्रेमिका (पूजा) की आंखों में डूबकर यह गाना गाता है. जिंदगी के नए सपने बुनता है. यहां पर यह कविता उम्मीद-रोमांच का पर्याय बनकर आती है. जब शुरुआत में गाना ‘कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है, कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए’ बजता है तो दर्शकों के लिए विशुद्ध लव एंथम बन जाता है.
प्रेम कहानी आगे बढ़ती है तो पूजा-अमित पर वक्त की मार पड़ती है. दोनों अलग हो जाते हैं. यही कविता दर्द भरी सिसकी बन जाती है जब पूजा की शादी विजय (शशि कपूर) से हो जाती है. अमित इसी कविता के चंद छंद ‘मैं जानता हूं कि तू गैर है मगर यूं कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है.’ को फिर से पढ़ता है जो तन्हाई का रूप ले लेते हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि साहिर साहब ने इस दर्दभरे हिस्से को पहले लिखा था. फिल्म में ‘मैं दो पल का शायर हूं’ जैसा एक और सॉन्ग भी मुकेश की आवाज में थे. यूथफुल सॉन्ग ‘तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती नजारे हम क्या देखें’ किशोर कुमार का सदाबहार गाना भी था. खय्याम को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का जबकि साहिर लुधियानवी को बेस्ट गीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था. 1.4 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने 3 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी.