Strait Of Hormouz | How India Manage Crisis | होर्मुज संकट से दुनिया भर में त्राहिमाम, मगर भारत में नहीं बढ़े तेल के दाम! कैसे सरकार ने तोड़ा चक्रव्यूह

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होर्मुज संकट से दुनिया भर में त्राहिमाम, मगर भारत में नहीं बढ़े तेल के दाम!

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ईरान युद्ध और रूस के पेट्रोल निर्यात प्रतिबंध से वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोहराम मचा है. यूरोप में गैस की कीमतें 70% तक बढ़ गईं और अफ्रीका में ईंधन के दाम 50% तक उछल गए, वहीं भारत ने एक हैरतअंगेज उपलब्धि हासिल की है. 88% कच्चे तेल के आयात पर निर्भर होने के बावजूद, भारत में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं. भारत ने अपनी आयात रणनीति को बदल दिया है, जिसकी वजह से भारत में ऊर्जा और पेट्रोलियम की कमी नहीं हुई.

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भारत ने तेल संकट से आम जनता को कैसे बचाया?

नई दिल्ली: ईरान जंग के बीच पूरी दुनिया में कोहराम मच गया है. शुरुआत से ही होर्मुज जलडमरूमध्य से (जहां से पूरी दुनिया का 20 से 25 फीसद) से तेल का आयात होता है. मगर, इस जंग की वजह और होर्मुज के बंद होने की वजह से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा गया है. इसके परिणामस्वरूप ब्रेंट क्रूड की कीमतें 70 डॉलर से उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं. यूरोप, एशिया और अफ्रीका के देशों में हाहाकार मचा है. तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं. लेकिन, भारत ने अपनी सूझबूझ भरी रणनीति से घरेलू बाजार को इस ‘झटके’ से बचा लिया है.

ऊर्जा की जरूरत आयात से पूरा होता है फिर भी भारत ने कैसे मैनेज किया. भारत की 88% तेल जरूरतें और 60% एलपीजी आयात पर टिकी हैं. होर्मुज में तनाव के कारण सप्लाई चैन टूटने का खतरा था, लेकिन भारत ने समय रहते अपने स्रोतों को बदल लिया. आसान भाषा में भारत केवल खाड़ी देशों पर डिपेंड नहीं रहा, उसने अपनी जरूरत की ऊर्जा के लिए कई देशों से समझौते किए-

  • रूस और अमेरिका का साथ: भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचा दिया. वहीं, अमेरिका के साथ पहले से किए गए करारों के कारण एलपीजी की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित हुई.
  • नए रास्ते, नई उम्मीद: होर्मुज के बजाय भारत ने ‘केप ऑफ गुड होप’ वाले लंबे समुद्री रास्ते का इस्तेमाल किया. हालांकि इससे लागत बढ़ी, लेकिन सप्लाई कभी नहीं रुकी.
  • अफ्रीका और अर्जेंटीना: नाइजीरिया, अंगोला और यहां तक कि अर्जेंटीना जैसे गैर-पारंपरिक देशों से भी तेल और गैस मंगाकर भारत ने अपने बफर स्टॉक को मजबूत रखा.
पेट्रोलियम आयात की रणनीति ही बदल दी गई, ताकि देश में इसका संकट ही न उपजे.

कीमतों को कैसे रखा काबू में?

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम 70% बढ़ने के बावजूद भारत में एलपीजी की कीमतों में केवल 7% (करीब ₹60) की मामूली बढ़ोत्तरी हुई. यह केंद्र सरकार के ‘प्राइस कंटेनमेंट प्लान’ के कारण संभव हुआ:

  1. सरकारी कंपनियों ने झेला बोझ: तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने करीब 40,000 करोड़ रुपये का घाटा खुद सहा, जिसकी भरपाई बाद में सरकार ने 30,000 करोड़ रुपये के मुआवजे से की.
  2. टैक्स में भारी कटौती: सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की बड़ी कटौती की, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ नहीं बढ़ा.
  3. डीजल पर विशेष ध्यान: डीजल चूंकि माल ढुलाई और खेती का मुख्य आधार है, इसलिए इसकी कीमतों को स्थिर रखकर सरकार ने थोक महंगाई को बढ़ने से रोक दिया.

नौसेना और कूटनीति का प्रहार

भारत ने केवल आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि सैन्य मोर्चे पर भी सक्रियता दिखाई. भारतीय नौसेना ने ‘ऑपरेशन संकल्प’ के तहत अपने युद्धपोतों को तैनात किया ताकि ऊर्जा की खेप लेकर आ रहे जहाजों को सुरक्षित रास्ता मिल सके. साथ ही, कूटनीतिक रास्तों से होर्मुज के रास्ते को भी कुछ हद तक खुला रखने में कामयाबी हासिल की.

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Deep Raj DeepakSub-Editor

Deep Raj Deepak working with News18 Hindi (hindi.news18.com/) Central Desk since 2022. He has strong command over national and international political news, current affairs and science and research-based news. …और पढ़ें

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