श्राउड ऑफ ट्यूरिन: क्या भारत में बना था जीसस का कफन? डीएनए टेस्ट में खुल गया सदियों पुराना राज

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श्राउड ऑफ ट्यूरिन: क्या भारत में बना था जीसस का कफन? डीएनए टेस्ट में खुला राज

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जीसस क्राइस्ट के कफन यानी ‘श्राउड ऑफ ट्यूरिन’ को लेकर एक हैरान करने वाला खुलासा हुआ है. आधुनिक डीएनए एनालिसिस में इस कपड़े का सीधा संबंध भारत से पाया गया है. रिसर्च के मुताबिक, इस कपड़े पर मिले इंसानी डीएनए में करीब 40% भारतीय मूल के हैं. वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यह कपड़ा या इसका धागा प्राचीन भारत में तैयार हुआ हो सकता है.

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श्राउड ऑफ ट्यूरिन: क्या भारत में बना था जीसस का कफन? डीएनए टेस्ट में खुला राजZoom

जीसस क्राइस्ट के कफन ‘श्राउड ऑफ ट्यूरिन’ को भारत से जोड़कर देखा जा रहा है.

नई दिल्ली. ईसाई धर्म को मानने वालों के लिए जीसस क्राइस्ट से जुड़ी हर चीज बेहद पवित्र है. इसमें सबसे खास है ‘श्राउड ऑफ ट्यूरिन’. यह 4.4 मीटर लंबा वह कपड़ा है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि इसमें जीसस के शव को लपेटा गया था. सदियों से इसकी सच्चाई पर बहस होती रही है. लेकिन अब एक नए डीएनए टेस्ट ने सबको चौंका दिया है. इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ पाडोवा के वैज्ञानिकों ने इस कपड़े पर रिसर्च की है. इसमें इस कपड़े का गहरा संबंध भारत से पाया गया है.

डीएनए एनालिसिस में क्या बड़े खुलासे हुए?
साल 2015 में वैज्ञानिक जियानी बारकैकिया ने इस कपड़े से मिले अवशेषों की जांच की थी. हाल ही में उनकी टीम ने 1978 में इकट्ठा किए गए सैंपल्स का दोबारा एनालिसिस किया. इस जांच में कपड़े पर इंसानों, जानवरों और पौधों के डीएनए मिले हैं. रिसर्च में पाया गया कि इस कफन पर पालतू बिल्ली, कुत्ते, घोड़े और मुर्गियों के डीएनए मौजूद हैं. इसके अलावा, इस पर उन पौधों के निशान भी मिले हैं जो उस दौर में भारत और अमेरिका से यूरोप ले जाए गए थे.

भारत का कनेक्शन आखिर कैसे सामने आया?
सबसे हैरान करने वाली बात इंसानी डीएनए को लेकर रही. वैज्ञानिकों ने पाया कि इस कपड़े को छूने वाले कई लोगों के डीएनए इस पर मौजूद हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें करीब 40% डीएनए भारतीय मूल के वंशजों के हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कपड़ा या इसका धागा प्राचीन सिंधु घाटी के आसपास के इलाकों में बना हो सकता है. इसके बाद रोमन व्यापारी इसे भारत से लेकर आए होंगे. यह रिसर्च इशारा करती है कि जीसस का यह कफन मूल रूप से भारत में तैयार हुआ हो सकता है.

क्या कहता है ट्यूरिन के कफन का इतिहास?
यह कफन पहली बार 1354 में फ्रांस में देखा गया था. इसके बाद 16वीं सदी से इसे इटली के ट्यूरिन शहर के सेंट जॉन द बैपटिस्ट कैथेड्रल में रखा गया है. 1898 में पहली बार जब इसकी फोटो खींची गई, तो यह पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया. तस्वीर में एक दाढ़ी वाले व्यक्ति की धुंधली आकृति दिखती है, जिसके शरीर पर चोट के निशान हैं. भक्तों का मानना है कि ये निशान जीसस को सूली पर चढ़ाए जाने के दौरान आए थे. हालांकि, 1988 की कार्बन डेटिंग ने इसे 13वीं या 14वीं शताब्दी का बताया था, जिसे कई विद्वान आज भी नहीं मानते.

बाइबिल और विज्ञान के बीच क्या है तालमेल?
बाइबिल के कई हिस्सों में जीसस के कफन का जिक्र मिलता है. हालांकि, अलग-अलग गॉस्पेल में कपड़े को लेकर अलग बातें कही गई हैं. कुछ विद्वान मानते हैं कि इस कपड़े पर बनी आकृति किसी अलौकिक घटना का नतीजा है. दूसरी तरफ, वैज्ञानिक इसे इतिहास और व्यापारिक रिश्तों के जरिए समझने की कोशिश कर रहे हैं. भारत से मिला डीएनए लिंक इस रहस्य को और गहरा बना देता है. सच्चाई चाहे जो भी हो, आज भी लाखों लोग इस कपड़े को जीसस की मौजूदगी का सबसे बड़ा प्रमाण मानकर इसकी पूजा करते हैं.

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Rakesh Ranjan Kumar

राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें

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