सिलाव खजली मिठाई, सीतामढ़ी की गलियों में गूंजती आधी सदी के स्वाद की पहचान, आज भी दीवाने लोग
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दशकों से शहर की व्यस्त गलियों और दफ्तरों के पास एक चिर-परिचित आवाज़ लोगों को अपनी ओर खींच लेती है, खाजा ले लीजिए, यह आवाज अरुण शाह की है, जो पिछले 50 वर्षों से अपनी टोकरी में परंपरा का स्वाद लेकर घूम रहे हैं. उनके हाथ का बना खाजा खाना कई पीढ़ियों की आदत बन चुका है. सीतामढ़ी आने वाले लोग आज भी इस अनुभवी विक्रेता की सिलाव खजली ढूंढते नजर आते हैं.
अरुण शाह जिस मिठाई को बेचते हैं, उसे स्थानीय लोग ‘खजली’ कहते हैं, जो प्रसिद्ध ‘सिलाव का खाजा’ है. अपनी अद्भुत परतदार बनावट और कुरकुरे स्वाद के कारण यह मिठाई बिहार की सांस्कृतिक पहचान और खान-पान का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.
इस मिठाई को तैयार करना एक कला है. अरुण शाह इसे मैदा, चीनी और सिंघाड़े के आटे के मिश्रण से बनाते हैं. घंटों की कड़ी मेहनत के बाद तैयार होने वाली यह परतदार मिठाई चाय के नाश्ते और मेहमानों के स्वागत के लिए बेहतरीन मानी जाती है.
समय के साथ इस मिठास की कीमत भी बदली है. अरुण बताते हैं कि कभी यह 100 रुपये किलो बिकती थी, जो आज 300 रुपये तक पहुंच गई है. महंगाई के बावजूद लोग उनके पुराने अनुभव और शुद्ध स्वाद के कारण इसे खूब पसंद करते हैं.
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बढ़ती लागत और बाजार की कड़ी प्रतिस्पर्धा ने अरुण जैसे छोटे विक्रेताओं के लिए चुनौतियां तो खड़ी की हैं, लेकिन उनका जुनून आज भी कम नहीं हुआ है. वे प्रतिदिन 100 से 200 पीस खाजा बेचकर अपनी जीविका और परंपरा को जीवित रखे हुए हैं.
स्थानीय निवासियों के लिए अरुण शाह केवल एक विक्रेता नहीं, बल्कि एक याद हैं. उनके हाथ का बना खाजा खाना कई पीढ़ियों की आदत बन चुका है. सीतामढ़ी आने वाले लोग आज भी इस अनुभवी विक्रेता की सिलाव खजली ढूंढते नजर आते हैं.