गुजरात की ये एजुकेशन सेंटर बनी मिसाल, बायोगैस से रोज पकता है 500 लोगों का भोजन, LPG पर निर्भरता खत्म

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गुजरात की ये एजुकेशन सेंटर बनी मिसाल, बायोगैस से रोज पकता है 500 लोगों का भोजन

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Gujarat Biogas Model: गुजरात के श्रीमती मानेकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स में बायोगैस से रोज 500 लोगों का भोजन पकाया जाता है. यहां एलपीजी सिलेंडरों की जरूरत नहीं पड़ती. यहां दो बायोगैस प्लांट लगाए गए हैं. ईरान जंग के बीच इन प्लांट्स की खूब चर्चा हो रही है.

गुजरात की ये एजुकेशन सेंटर बनी मिसाल, बायोगैस से रोज पकता है 500 लोगों का भोजनZoom

एक बायोगैस प्लांट की फाइल फोटो.

Gujarat Biogas Model: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर एलपीजी और कुकिंग गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है. इस बीच गुजरात के एक शैक्षणिक संस्थान ने बायोगैस अपनाकर खुद को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बना लिया है. श्रीमती मानेकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स, गांधीनगर में दो बायोगैस प्लांट्स की मदद से रोजाना 500 से ज्यादा लोगों के भोजन तैयार किए जा रहे हैं. यहां किसी एलपीजी सिलेंडर का इस्तेमाल नहीं हो रहा है. सरकारी अधिकारियों और संस्थान प्रबंधन के अनुसार, परिसर में प्रतिदिन दो बार लगभग 250 छात्रों के लिए भोजन पकाया जाता है. इसके अलावा परिसर में रहने वाली करीब 15 परिवार भी इस बायोगैस का उपयोग अपनी रसोई के लिए करते हैं. कुल मिलाकर यह प्लांट रोजाना 500 से अधिक लोगों की खाना पकाने की जरूरत पूरी कर रहा है.

कैंपस में दो बायोगैस प्लांट्स लगाए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक की क्षमता 45 घन मीटर प्रतिदिन है. इस तरह कुल क्षमता 90 घन मीटर प्रतिदिन हो गई है. बिना इन प्लांट्स के संस्थान को हर महीने करीब 30 एलपीजी सिलेंडर की जरूरत पड़ती, लेकिन अब जरूरत शून्य है. इससे न केवल लागत में भारी बचत हो रही है बल्कि ईंधन की उपलब्धता और कीमतों के उतार-चढ़ाव से भी मुक्ति मिल गई है. संस्थान के मैनेजर राहुल पटेल ने बताया कि सरकार की संस्थागत बायोगैस प्लांट योजना के तहत हमें सब्सिडी मिली, जिससे हम रसोई गैस में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए. हमारे पास करीब 220 गायें हैं, जिनसे पर्याप्त गोबर मिलता है. बायोगैस बनाने के बाद निकलने वाली स्लरी (तरल खाद) का उपयोग हम पूरी तरह ऑर्गेनिक खेती के लिए करते हैं. इससे फसलें स्वस्थ और रासायनिक खाद से मुक्त रहती हैं.

गुजरात सरकार देती है सब्सिडी

गुजरात एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (GEDA) की संस्थागत बायोगैस प्लांट योजना के तहत गौशालाओं, शैक्षणिक संस्थानों, चैरिटेबल ट्रस्टों और होटलों को विभिन्न क्षमताओं (25, 35, 45, 60 और 85 घन मीटर प्रतिदिन) के प्लांट्स लगाने के लिए सब्सिडी दी जाती है. गैर-लाभकारी संगठनों को 75 प्रतिशत तक और लाभकारी संगठनों को 50 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है. योजना का उद्देश्य जैविक अपशिष्ट को उपयोगी ऊर्जा में बदलना और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना है. पिछले पांच वर्षों में गुजरात में इस योजना के तहत 193 संस्थागत बायोगैस प्लांट्स लगाए गए हैं, जिनकी कुल क्षमता 13,955 घन मीटर प्रतिदिन है. इन प्लांट्स ने न केवल ईंधन की बचत की है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा दिया है.

वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने इस योजना के तहत 12 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. अधिकारियों के अनुसार, इस राशि से करीब 60 नए बायोगैस प्लांट्स स्थापित करने का लक्ष्य है. इससे और अधिक संस्थान और गौशालाएं स्वच्छ ईंधन की ओर मुड़ सकेंगी. श्रीमती मानेकबा विनय विहार एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स इस योजना का एक बेहतरीन उदाहरण बन गया है. यहां गोबर के अलावा सब्जियों के छिलके और अन्य रसोई के अपशिष्ट को भी बायोगैस उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है. प्लांट सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक लगातार गैस सप्लाई करता है, जिससे रसोई का काम सुचारू रूप से चलता है.

पश्चिम एशिया संकट में काफी अहम

यह पहल उस समय महत्वपूर्ण हो गई है जब पश्चिम एशिया में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर है. कई जगहों पर एलपीजी और तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. ऐसे में गुजरात की यह पहल न केवल लागत बचत बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का भी संदेश दे रही है. GEDA के अधिकारियों का कहना है कि बायोगैस प्लांट्स न केवल कुकिंग गैस का विकल्प प्रदान करते हैं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य को भी पूरा करते हैं. गुजरात सरकार का लक्ष्य है कि राज्य में बायो-एनर्जी का उपयोग बढ़ाया जाए और जैविक अपशिष्ट का बेहतर प्रबंधन किया जाए.

इस मॉडल को अन्य संस्थान भी अपना रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अधिक से अधिक शैक्षणिक परिसर, गौशालाएं और ट्रस्ट इस दिशा में कदम उठाएं तो गुजरात न केवल ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि कार्बन उत्सर्जन भी कम होगा. राहुल पटेल ने कहा कि हमारे छात्रों को भी पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबल लिविंग की शिक्षा मिल रही है. वे देख रहे हैं कि कैसे गोबर जैसी चीज को ऊर्जा और खाद में बदला जा सकता है.

About the Author

संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें

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