आरबीआई के आगे कुआं और पीछे खाई! अब रुपया बचाए या रिजर्व, देश के लिए दोनों जरूरी, पर एक की देनी होगी बलि
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Rupee vs Reserve : ईरान युद्ध की वजह से रिजर्व बैंक के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी हो गई है. फिलहाल उसे रुाये में आ रही गिरावट को थामने अथवा अपने कैश रिजर्व को बचाए रखने में से कोई एक चुनना पड़ सकता है. आंकड़ों के नजरिये से इसका जवाब मिल सकता है कि आरबीआई आगे दोनों में से किस विकल्प को बचाने पर जोर दे सकता है.

आरबीआई को रुपया अथवा रिजर्व में से कोई एक चुनना पड़ सकता है.
नई दिल्ली. ईरान और इजराइल के युद्ध ने भारतीय रिजर्व बैंक को गहरी मुसीबत में फंसा दिया है. उसके आगे कुआं तो पीछे खाई दिख रही है. हालात ऐसे बन गए हैं कि आरबीआई को रुपये में आ रही गिरावट को रोकना होगा या फिर अपने कैश रिजर्व के मोह को त्यागना पड़ेगा. रुपया और विदेशी मुद्रा भंडार यानी कैश रिजर्व दोनों ही देश और अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं, लेकिन मौजूदा चुनौती के समय दोनों को साथ लेकर चलना काफी मुश्किल हो गया है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर आरबीआई को दोनों में से एक को चुनना पड़े तो वह किसकी बलि दे सकता है.
इन सवालों के जवाब से पहले आपको यह जानना जरूरी है कि अगर यह सोच रहे हैं कि रुपये में गिरावट या फिर आरबीआई के कैश रिजर्व से आम आदमी का क्या लेनादेना तो बिलकुल गलत हैं. यह दोनों ही चीजों सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर असर डालती हैं और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर छोड़ती हैं. जाहिर है कि इससे आम आदमी ही नहीं, सरकार और उद्योग भी दबाव में रहेंगे. इसके व्यापक असर को देखते हुए ही आरबीआई इतनी आसानी से फैसला नहीं कर पा रहा है.
आंकड़ों में साफ दिख रही मुसीबत और ताकत
आरबीआई ने पिछले दिनों कहा था कि देश में विदेशी मुद्रा भंडार का पर्याप्त भंडार है, जो बाहरी झटकों को आसानी से झेल सकता है. आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि 13 मार्च तक देश का कुल रिजर्व 710 अरब डॉलर था, जो 728 अरब डॉलर के रिकॉर्ड लेवल के आसपास ही है. यह तो है आरबीआई की मजबूती, लेकिन मार्च में ही विदेशी निवेशकों ने 12.1 अरब डॉलर यानी करीब 1.10 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा की रकम निकाल ली है, जो किसी एक महीने में निकाली गई अब तक की सबसे बड़ी राशि है. इसी दबाव में रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 74 के लेवल तक चला गया, जो गिरावट का रिकॉर्ड है.
क्या है विदेशी मुद्रा भंडार की डिटेल
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 तरह के कंपोनेंट से मिलकर बना है. विदेशी मुद्रा, सोना, विशेष निकासी सुविधा (एसडीआर) और आईएमएफ में विशेष ट्रेंच पोजिशन. आईएमएफ अपने सदस्यों को मुसीबत में विशेष निकासी सुविधा के जरिये मुद्रा बदलने की अनुमति देता है. यह आंकड़ा 5 करेंसी अमेरिकी डॉलर, यूरो, चीन के युआन, जापान के येन और पाउंड पर निर्भर करता है. फिलहाल भारत के पास 18.7 अरब डॉलर का एसडीआर है, जबकि रिजर्व ट्रेंच पोजिशन 4.8 अरब डॉलर है. अब देश का विदेशी मुद्रा भंडार 556 अरब डॉलर और सोने का रिजर्व 131 अरब डॉलर का बचता है. सोना तो आरबीआई बेचता नहीं है, क्योंकि साल 1991 के बाद कभी ऐसा हुआ नहीं. जाहिर है कि आखिरी विकल्प विदेशी मुद्राओं को बेचना ही बचता है.
रुपये को बचाने के दो तरीके
रिजर्व बैंक के पास डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही गिरावट को थामने के 2 तरीके हैं. पहला कि वह अपनी विदेशी मुद्राओं को हाजिर बाजार में बेचे, लेकिन इससे घरेलू वित्तीय बाजार पर असर पड़ेगा. आरबीआई जब विदेशी मुद्रा बेचता है तो बदले में रुपया खरीदता है और उसकी लिक्विडिटी कम हो जाती है. लेकिन, इससे ब्याज दरों में बढ़ोतरी का जोखिम बढ़ जाता है. दूसरा रास्ता है कि आरबीआई अपनी विदेशी मुद्राओं को फॉरवर्ड बाजार यानी फ्यूचर मार्केट में बेचे. इससे रुपये में जारी गिरावट भी थम जाती है और ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी नहीं होती. यही वजह है कि जनवरी से अब तक आरबीआई ने करीब 68 अरब डॉलर फॉरवर्ड मार्केट में बेचे हैं. फिलहाल विदेशी मुद्राओं का भंडार 500 अरब डॉलर के आसपास पहुंच गया है.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें