न साइकिल, न गाड़ी; 30 साल से नंगे पैर बांट रही हैं चिट्ठियां, J&K की पहली पोस्टवुमन उल्फत बानो की संघर्ष की दास्तान

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नई दिल्ली: आज जब दुनिया डिजिटल मैसेज और इंस्टेंट कम्युनिकेशन पर टिकी हुई है, तब भी कुछ कहानियां ऐसी हैं जो हमें जमीनी हकीकत से जोड़ देती हैं. जम्मू-कश्मीर की वादियों में एक ऐसी ही कहानी हर रोज लिखी जाती है. जहां न कोई बाइक है, न कोई पोस्टल वैन और न ही कोई सुविधा. फिर भी चिट्ठियां अपने सही पते तक पहुंचती हैं. यह कहानी है उल्फत बानो की जो पिछले 30 सालों से नंगे पैर, बिना किसी साधन के, हर मौसम में लोगों तक उनके अपनों की खबर पहुंचा रही हैं. यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक जुनून है, जो हर दिन पहाड़ों, बर्फ और थकान को चुनौती देता है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू-कश्मीर की पहली पोस्टवुमन उल्फत बानो हर सुबह करीब 25 चिट्ठियां लेकर अपने गांव हीरापोरा की गलियों में निकल पड़ती हैं. चाहे बारिश हो, बर्फबारी हो या कड़क धूप उनका सफर कभी नहीं रुकता. 55 साल की उम्र में भी उनका यह जज्बा कम नहीं हुआ है और वह हर दिन उसी ऊर्जा के साथ अपना काम करती हैं जैसे कोई नया कर्मचारी करता है.

उल्फत बानो जम्मू-कश्मीर की पहली पोस्टवुमन हैं. (फोटो Shutterstock)

गांव की लाइफलाइन बनीं उल्फत

  • तीन दशकों से उल्फत बानो का रूटीन लगभग एक जैसा है. हर सुबह वह शोपियां के जिला पोस्ट ऑफिस से चिट्ठियां लेकर निकलती हैं और अपने गांव हीरापोरा के हर घर तक पहुंचती हैं. रास्ते आसान नहीं हैं पत्थरों से भरे ट्रैक, लकड़ी के घरों के बीच संकरी गलियां, और सर्दियों में घुटनों तक बर्फ. लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद वह कभी नहीं रुकतीं. उनके हाथ में एक छाता और दूसरे में चिट्ठियों का बंडल होता है, जो उनके कर्तव्य की पहचान बन चुका है.
  • उल्फत बानो का काम सिर्फ चिट्ठियां पहुंचाना नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ना है. उन्होंने अपने करियर में कई ऐसे पल देखे हैं जब उनके हाथों से मिली चिट्ठी ने किसी के घर में खुशियां ला दीं. इन चिट्ठियों में कभी नौकरी की खबर, कभी किसी अपने का संदेश होता है. यही वजह है कि वह अपने काम को सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक नेक काम मानती हैं.

उल्फत बानो कौन हैं और क्यों खास हैं?

उल्फत बानो जम्मू-कश्मीर की पहली पोस्टवुमन हैं, जिन्होंने पिछले 30 सालों से बिना किसी वाहन या सुविधा के चिट्ठियां बांटने का काम किया है. उनका यह सफर उन्हें खास बनाता है, क्योंकि उन्होंने हर मौसम और हर चुनौती के बावजूद अपने काम को जारी रखा.

वह किस तरह के हालात में काम करती हैं?

उल्फत बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में काम करती हैं. बर्फबारी के दौरान रास्ते बंद हो जाते हैं, बारिश में कीचड़ और फिसलन होती है, लेकिन फिर भी वह पैदल चलकर हर घर तक चिट्ठियां पहुंचाती हैं.

क्या उन्हें किसी तरह की सुविधा मिलती है?

उन्हें कोई विशेष सुविधा नहीं मिलती. न कोई वाहन है और न ही अतिरिक्त संसाधन. वह अपने पुरुष साथियों की तरह ही काम करती हैं और लगभग 22,000 रुपए महीने का वेतन पाती हैं.

उन्हें इस काम के लिए क्या प्रेरित करता है?

उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा लोगों के चेहरे पर खुशी देखना है. जब कोई चिट्ठी या पार्सल किसी परिवार के लिए खुशखबरी लेकर आता है, तो वही उनके काम का सबसे बड़ा इनाम होता है.

जुनून जो थमता नहीं

उल्फत बानो की कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चा समर्पण किसी भी सुविधा का मोहताज नहीं होता. उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादा मजबूत हो, तो हर मुश्किल रास्ता आसान बन सकता है. उनका यह सफर सिर्फ एक कर्मचारी की कहानी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है जो हर किसी को अपने काम के प्रति ईमानदार रहने का संदेश देती है.

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