1993 में राज कुमार-नाना पाटेकर की चली थी ऐसी आंधी, हिल गया था बॉक्स ऑफिस, 168 मिनट की फिल्म ने किया था सबको हैरान
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1993 में जब ‘ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह’ का शाही अंदाज और ‘इंस्पेक्टर वागले’ का जबरदस्त गुस्सा पर्दे पर टकराया तो बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तूफान आया जिसने इतिहास रच दिया. मेहुल कुमार के डायरेक्शन में बनी ‘तिरंगा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक्टिंग के दो महान कलाकारों राज कुमार और नाना पाटेकर के बीच जबरदस्त लड़ाई की गवाह थी. 168 मिनट के इस सिनेमाई सफर ने अपनी देशभक्ति, एक्शन और तीखे डायलॉग्स से दर्शकों को इतना बांध लिया कि हफ्तों तक थिएटर के बाहर ‘हाउसफुल’ के साइन लगे रहे. आइए जानें उस ब्लॉकबस्टर की पूरी कहानी.
नई दिल्ली. बॉलीवुड के इतिहास में कुछ तारीखें दर्ज हैं और 29 जनवरी 1993 उनमें से एक है. यह वह दिन था जब थिएटर के बाहर मीलों लंबी लाइनें लग गई थीं और कुछ ही मिनटों में टिकट खिड़कियों पर ‘हाउसफुल’ के साइन लग गए थे. वजह थी मेहुल कुमार की फिल्म ‘तिरंगा’. इस 168 मिनट (2 घंटे 48 मिनट) की फिल्म ने न सिर्फ पिछले बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड तोड़े, बल्कि दर्शकों को ऐसा अनुभव भी दिया जो 33 साल बाद भी उनके दिमाग में साफ-साफ बसा हुआ है.
इस फिल्म में बॉलीवुड के ‘शेर’ कहे जाने वाले दो एक्टर राज कुमार और नाना पाटेकर के बीच टक्कर देखी गई. 90 के दशक की शुरुआत में हिंदी सिनेमा में बदलाव हो रहा था. रोमांटिक फिल्में पॉपुलर हो रही थीं, जबकि एक्शन फिल्मों का बोलबाला था. डायरेक्टर मेहुल कुमार ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. उन्होंने ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह के शाही रोल के लिए लेजेंडरी राज कुमार को कास्ट किया और उन्हें इंस्पेक्टर शिवाजी राव वागले के जबरदस्त रोल में नाना पाटेकर के सामने खड़ा किया.
यह कोई राज नहीं है कि नाना पाटेकर शुरू में इस फिल्म का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे. उन्हें डर था कि राज कुमार जैसे लेजेंडरी एक्टर के साथ काम करना मुश्किल होगा, लेकिन जब मेहुल कुमार दोनों को साथ लाए तो स्क्रीन पर उनकी केमिस्ट्री ने दर्शकों को अपनी सीटों से बांधे रखा. 168 मिनट लंबी होने के बावजूद, फिल्म कभी धीमी नहीं हुई, क्योंकि इन दोनों लेजेंडरी एक्टर्स की जुगलबंदी ने हर फ्रेम को बांधे रखा.
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इस फिल्म में राज कुमार का होना ही इसकी सफलता की सबसे बड़ी गारंटी थी. सफेद सूट पहने, हाथ में सिगार लिए और आंखों में चमकता कॉन्फिडेंस… राज कुमार ने ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह के रोल में देशभक्ति को एक रॉयल टच दिया. उनकी लाइन आज भी हर बच्चे की जुबान पर है- ‘जानी… हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे, लेकिन बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा होगा’
फिल्म में उनके शांत व्यवहार ने दर्शकों को एक ऐसे मसीहा का एहसास कराया जो किसी भी मुश्किल समय में देश को लीड कर सकता है. राज कुमार की मौजूदगी ने फिल्म को वह गंभीरता दी जिसकी उस जमाने की देशभक्ति वाली फिल्मों को जरूरत थी. अगर राज कुमार फिल्म की ‘आत्मा’ थे, तो नाना पाटेकर इसकी ‘दिल की धड़कन’ थे. नाना पाटेकर ने एक ऐसे पुलिस ऑफिसर का रोल किया जो नियम तोड़ता है, लेकिन अन्याय बर्दाश्त नहीं करता. नाना की डायलॉग डिलीवरी, बॉडी लैंग्वेज और अचानक गुस्सा दिखाना दर्शकों के लिए बिल्कुल नया था.
जब नाना फिल्म में राज कुमार के सामने खड़े होते थे, तो ऐसा लगता था जैसे शांत समुद्र किनारे कोई ज्वालामुखी फट रहा हो. उनकी कॉमेडी टाइमिंग और एक्शन सीन ने फिल्म में एंटरटेनमेंट का तड़का लगाया, जिससे यह सिर्फ एक सीरियस ड्रामा नहीं रह गई. विलेन ‘गेंदास्वामी’ का डर: दीपक शिर्के ने ‘प्रलयनाथ गेंदास्वामी’ के रूप में एक ऐसा विलेन पेश किया, जिसे दर्शक उसके कॉमिक स्टाइल के लिए पसंद भी करते थे और नफरत भी. ‘हमारा नाम प्रलयनाथ गेंदास्वामी है…’ आज भी एक कल्ट डायलॉग है.
जब ‘तिरंगा’ रिलीज हुई तो इसने फाइनेंशियल इक्वेशन बदल दिया. यह उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक बन गई. इसकी सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों ने हफ्तों तक अपनी सिल्वर जुबली मनाई. फिल्म क्रिटिक्स का मानना था कि ‘तिरंगा’ की सफलता का सबसे बड़ा कारण इसकी मास अपील थी.