Kumbhakarna Niti: पुरुष को धर्म, अर्थ और भोग-विलास कब करना चाहिए? मरने से पहले कुंभकर्ण ने रावण को दी थी ये सलाह

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Kumbhakarna advice to Ravana: त्रेतायुग में जब लंका का युद्ध हो रहा था, तब भगवान राम की वानर सेना ने रावण के वीरों को पस्त कर दिया था. एक से बढ़कर एक असुर योद्धा उस युद्ध में मारे गए. रावण ने बड़े से बड़े मायावी और बलशाली राक्षसों को भेजा, लेकिन राम और लक्ष्मण के बाणों ने उनका वध कर दिया. लंका में हाहाकार मचा हुआ था, तब रावण को अपने छोटे भाई कुंभकर्ण की याद आई. उसने कुंभकर्ण को युद्ध में भेजने का निर्णय लिया. कुंभकर्ण को ब्रह्म देव से इंद्रासन की जगह निद्रासन का वरदान प्राप्त था, इसलिए वह 6 माह सोता और 1 दिन जगता था. रावण ने अपने सैनिकों को कुंभकर्ण को जगाने के लिए भेजा. बड़ी ही कोशिशों के बाद कुंभकर्ण जागा और रावण के पास गया. उस समय कुंभकर्ण ने युद्ध में जाने से पहले रावण को कुछ नीति की बातें बताईं, जिसमें पुरुष को कर्म, अर्थ और काम का सेवन कब करना चाहिए?

सैनिकों ने कुंभकर्ण को बताई रावण की करतूत

कुंभकर्ण को जब असमय नीद से जगाया गया तो उसने इसका कारण पूछा. तब सैनिकों ने बताया कि आपके भाई ने अयोध्या के राजा राम की पत्नी सीता कर अपहरण कर ले आए हैं. इस वजह से वानर सेना ने पूरा लंका को घेर लिया है और उनसे युद्ध चल रहा है. कुंभकर्ण ने कहा कि रावण को यह नहीं पता कि राम कौन हैं और उनकी पत्नी सीता कौन हैं? वो तो स्वयं साक्षात् नारायण और महालक्ष्मी हैं. उन्होंने ऐसी गलती कैसी कर दी?

मृत्यु से पहले कुंभकर्ण की रावण को सलाह

यद्ध में जाने से पूर्व कुंभकर्ण जब रावण से मिलता है तो उसे उसकी गलती का एहसास कराता है. बताता कि आपने जिस सीता का हरण किया है, वो कोई और नहीं साक्षात् लक्ष्मी हैं. ऐसा अपराध कैसा कर दिया? रावण शूर्पणखा के नाक काटने की घटना को बताया तो भी कुंभकर्ण ने सीता हरण को अपराध ही कहा.

कुंभकर्ण ने रावण को शास्त्रों के अनुसार आचरण करने की सलाह दी, तो रावण ने कहा कि यह समय अब ज्ञान देने का नहीं है. तो कुंभकर्ण ने कहा यही बात व​ह कहना चाहता है कि आपने उचित समय पर सही कार्य नहीं किया है.

नीति कहती है कि पुरुष को धर्म, अर्थ और काम का सेवन उचित समय पर ही करना चाहिए. सुबह के समय में धर्म करना चाहिए, दोपहर के समय में अर्थ यानि आय से संबंधित कार्य करना चाहिए और रात्रि के समय में काम यानि भोग-विलास का सेवन करने का विधान है. इन तीनों में भी धर्म श्रेष्ठ है. जहां पर अर्थ और काम का सेवन करना धर्म के विरूद्ध हो, वहां पर उन दोनों का त्याग करके धर्म का मार्ग चुनना चाहिए. धर्म के अनुसार ही चलना चाहिए.

सीता का हरण करते समय आपने धर्म और अधर्म की बात नहीं सोची. मंदोदरी भाभी, विभीषण की नीति और धर्म की बातों को अनसुना करके आपने केवल काम और वासना की पूर्ति का बहाना ढूंढा. इसका ही यह फल है, जो पूरी लंका के लोग भोग रहे हैं.

जो व्यक्ति सही समय पर धर्म, अर्थ और काम का उपभोग नहीं करता है, वह खत्म हो जाता है, उसका विनाश हो जाता है. समय को समझे बिना जो कार्य करता है, वह उसके पतन का कारण बनता है. समय और शास्त्र विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए.

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