अंग्रेजों ने कैसे भारतीयों को चाय की लत लगाई – दुनिया का सबसे बड़ा मार्केटिंग अभियान

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आजकल तो बगैर चाय के हमारा काम ही नहीं चलता। हर जगह चाय. हर मौके पर चाय. हर टाइम पर चाय. खुशी मनानी हो तो चाय. मूड अपसेट हो तो चाय. और चाय तो हर जगह सर्वसुलभ है – सड़क पर टपरिया और ढाबे से लेकर पांच सितारा होटल तक चाय. आपको मालूम है कि अंग्रेजों ने भारतीयों को कैसे चाय की लत लगाई, ये दुनिया का सबसे बड़ा मार्केटिंग अभियान भी कहा जा सकता है. तब भारतीयों को अंग्रेजों की इस चाय को पीने से डर भी लगता था. बहुत से लोगों को लगता था कि इसको पीने से उनका रंग काला हो जाएगा, तो बहुत से लोग मानते थे कि इससे धर्म भ्रष्ट हो जाएगा.

चाय हर मौसम का पेय पदार्थ है. हालांकि चाय पीना कभी भी भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा; इस पेय को भारत में अंग्रेजों द्वारा 200 साल से भी कम समय पहले लाया गया था.

तब भारत पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था, जिसने भारत को केवल चाय पीने वालों का देश बना दिया ताकि वे अपने देश में चाय की केतलिया भर सकें. भारत में इससे भारी मुनाफा कमा सकें. केवल मुनाफा कमाने में रुचि रखने वाली कंपनी के लिए यह एक शानदार विचार था.

क्यों अंग्रेज चाय भारत लेकर आए

हालांकि चाय की कहानी इतनी सीधी-सादी नहीं है. ये एक और मादक लत से जुड़ी हुई है. चाय की गाथा 18वीं शताब्दी के ब्रिटेन से शुरू होती है, जो चीन से भारी मात्रा में चाय आयात करता था लेकिन चाय के अत्यधिक सेवन से ब्रिटिश खजाना खाली हो रहा था. जब स्थिति असहनीय हो गई, तो अंग्रेजों ने एक चतुर योजना बनाई. उन्होंने अपने मुनाफे के स्रोत भारत की ओर रुख किया. भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा होकर बनने वाली अफीम को चीन को बेचना शुरू कर दिया. इससे मिले अपार धन से उन्हें अपनी चाय की लत को पूरा करने में मदद मिली.

अंग्रेजों ने चीन को अफीम के लती राष्ट्र में बदलकर खूब मुनाफा कमाया. अंग्रेजों के लिए यह एक सुखद लेन-देन था लेकिन ये ज्यादा देर तक नहीं चला. 1839 में, पहला अफीम युद्ध छिड़ गया, जब चीन ने सभी प्रकार के अफीम के आयात को रोकने का फैसला किया. इस मादक पदार्थ के कारण लाखों चीनी नागरिक आदी हो गए थे, इससे सामाजिक अशांति फैल रही थी. चीन को इसकी भारी आर्थिक हानि भी हो रही थी.

भारत में चाय पैदा करनी शुरू की

इसे लेकर ब्रिटेन के साथ चीन का एक युद्ध भी छिड़ा, जिसे अफीम युद्ध (1839-1842) के तौर पर जाना जाता है. इसे ब्रिटेन ने आखिरकार जीत लिया. इस संघर्ष ने चीन से उसके चाय आयात को खतरे में डाल दिया. ब्रितानियों को उनकी ‘एक कप चाय’ से वंचित करना किसी भी तरह से एक विकल्प नहीं था. इसलिए अंग्रेजों ने एक बार फिर भारत की ओर रुख किया. उन्होंने सोचा कि भारत में चाय की खेती करने से इस पेय पर चीन का एकाधिकार टूट सकता है. अपने देश में इसकी निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो सकती है.

चीन से तस्करी करके चाय के पौधे और बीज लाए गए

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1830 के दशक में असम में पहले चाय बागान खोले. इसके लिए चीन से तस्करी करके पौधे और बीज लाए गए. उन्होंने स्थानीय किस्मों की खेती भी शुरू की. इस प्रकार पैदा हुई चाय को इंग्लैंड और यूरोप के अन्य हिस्सों में निर्यात भी किया जाता था. लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी को और भी बहुत कुछ चाहिए था.

ये मैकियावेली की रणनीति थी

उन्हें ये महसूस हुआ कि अगर वे भारतीयों को भी चाय बेचें तो वे भारी मुनाफा कमा सकते हैं – उन्हें बस इतना करना था कि भारतीयों को इस पेय का आदी बना देना था.यह पूरी तरह से मैकियावेली की रणनीति थी. उन्होंने इसे बहुत ही व्यवस्थित और सोची-समझी योजना के तहत अंजाम दिया. अंग्रेजों ने एक चतुर रणनीति तैयार की. उन्होंने चाय के पैकेट मुफ्त में बांटे. रेलवे स्टेशनों और सिनेमा हॉलों में चाय के स्टॉल खोले. यहां तक ​​कि गृहिणियों को चाय बनाना भी सिखाया.

चलिए आगे बढ़ने से पहले कुछ सवालों के जवाब देते चलते हैं जो चाय को लेकर अक्सर पूछे जाते हैं

क्या भारतीय पहले चाय से डरते थे?

हां शुरुआत में भारतीयों के मन में चाय को लेकर बहुत संशय थी. भारतीय दूध और मसालों के शौकीन थे, जबकि शुरू में चाय को बिना दूध या कम चीनी के प्रचारित किया गया, जो भारतीयों को कड़वा और दवा जैसा लगा.
उस समय लोगों में यह अफवाह फैल गई थी कि चाय पीने से रंग काला हो जाता है, नींद उड़ जाती है, जो कैफीन के कारण सच भी था. ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. लोगों को लगता था कि यह “गोरों का पेय” है. इसे पीने से उनका धर्म या शुद्धता भ्रष्ट हो सकती है.

अंग्रेजों ने लत कैसे लगाई?

1900 के शुरुआती दशकों में ‘इंडियन टी एसोसिएशन’ ने चाय को घर-घर पहुंचाने के लिए कई कदम उठाए. रेलवे स्टेशनों, कारखानों और बाजारों में अंग्रेजों ने मोबाइल वैन तैनात कीं, जो लोगों को मुफ्त में बनी हुई चाय पिलाती थीं.

उन्होंने घर-घर जाकर महिलाओं को चाय बनाना सिखाया. जोर दिया कि इसमें दूध और चीनी मिलाएं, क्योंकि वे जानते थे कि भारतीयों को मीठा और दूधिया स्वाद पसंद आएगा.

आज आप हर स्टेशन पर “चाय-चाय” की जो आवाज सुनते हैं, उसकी शुरुआत अंग्रेजों ने ही की थी. उन्होंने प्लेटफॉर्म पर चाय के स्टॉल लगवाए ताकि यात्री सफर की थकान मिटाने के लिए इसे पिएं.

रंगीन पोस्टरों के जरिए चाय को “फुर्ती देने वाला” और “थकान मिटाने वाला” पेय बताया गया. विज्ञापनों में दिखाया गया कि चाय पीना आधुनिक और सभ्य होने की निशानी है.

दुनियाभर में चाय की कितनी किस्में

दुनिया भर में चाय की हजारों किस्में हैं. ये कैमेलिया साइनेंसिस पौधे से बनती हैं. बागान में उगी चाय की पत्तियों से हमारे घर तक पहुंचने वाली चाय को कई प्रक्रियाओं के बाद तैयार किया जाता है. भारत में असम, दार्जिलिंग, नीलगिरी जैसी प्रमुख किस्में उगाई जाती हैं.

चाय की लगभग 1500 से 3000 या इससे अधिक किस्में मानी जाती हैं. इसकी मुख्य श्रेणियां 6 हैं: ब्लैक टी, ग्रीन टी, ऊलॉन्ग टी, व्हाइट टी, येलो टी और पुएर्ह टी.

भारत में मुख्यतौर पर ब्लैक टी उगाई जाती है, जिसमें दार्जिलिंग (काली, हरी, सफेद), असम, कांगड़ा, नीलगिरी और मसाला चाय जैसी 10-12 प्रमुख किस्में शामिल हैं. देश में करीब 1,585 चाय बागान हैं, जो असम, दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल में केंद्रित हैं. GI टैग वाली दार्जिलिंग चाय विश्व प्रसिद्ध है.

ये सभी एक ही पौधे से बनती हैं, लेकिन पत्तियों को सूखाने, मरोड़ने और ऑक्सीडेशन की अलग-अलग डिग्री से तैयार होती हैं. कुछ स्रोत 20,000 तक किस्में बताते हैं, जो क्षेत्रीय भिन्नताओं और ब्लेंडिंग से आती हैं.

दुनिया भर में चाय को ऑक्सीडेशन के आधार पर बनाया जाता है – व्हाइट टी में न्यूनतम प्रोसेसिंग, ग्रीन टी में भाप देकर, ब्लैक टी में पूर्ण ऑक्सीडेशन. पानी के बाद चाय सबसे ज्यादा पिया जाने वाला पेय है. इसे दूध, मसाले या सादा बनाया जाता है. ​

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