ओवैसी ने चल दी ममता को परेशान करने वाली चाल, हुमायूं कबीर ही नहीं, बीजेपी भी गदगद

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पश्चिम बंगाल की राजनीतिक बिसात पर एक ऐसी चाल चली गई है, जिसने TMC और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पहली बार ऐलान क‍िया क‍ि उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर के साथ मिलकर लड़ेगी. ओवैसी का यह दांव सिर्फ एक चुनावी गठबंधन नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर बंगाल के उस ‘मुस्लिम वोटबैंक’ के किले में सेंधमारी की कोशिश है, जिसे ममता बनर्जी की अजेय सत्ता की सबसे बड़ी रीढ़ माना जाता है. इसल‍िए ओवैसी का यह बयान बीजेपी को भी खुश करने वाला है.

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा क‍ि उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ेगी. ओवैसी ने कहा- ये फैसला लिया है बंगाल में हुमायूं की पार्टी के साथ अलायंस करेंगे. मजलिस के उम्मीदवार उसका हिस्सा बनकर चुनाव में हिस्सा लेंगे. हमारा नुमायेंदे मुल्क के कोने कोने में कामयाब होकर गरीब की आवाज उठाएं. ममता बनर्जी बंगाल में हैं, 30 फीसदी मुस्लिम की आबादी है, लेकिन 5 लाख के करीब बैकवर्ड क्लास सर्टिफिकेट को कैंसिल कर दिया गया. बहुत सी नाइंसाफियों की कहानियां भी हैं, मालदा में पंचायत इलेक्शन में मजलिस को 60 हजार वोट मिले थे, हम इस कहानी को आगे बढ़ाएंगे.

हुमायूं कबीर ने ट‍िकट भी बांटे

हुमायूं कबीर ने हाल ही में ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ का गठन किया है. उन्‍होंने इस गठबंधन को जमीन पर उतारने की आक्रामक शुरुआत भी कर दी है. रविवार को मुर्शिदाबाद के रेजीनगर स्थित अपने पार्टी कार्यालय से कबीर ने 153 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी. हालांकि पहले 182 प्रत्याशियों की सूची जारी करने की योजना थी, लेकिन फिलहाल 153 नामों पर मुहर लग चुकी है. कबीर के इस कदम और ओवैसी के साथ उनके तालमेल ने बंगाल के चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से उलझा कर रख दिया है.

ममता के ल‍िए परेशानी का सबब क्‍यों

इस गठजोड़ ने सबसे बड़ी परेशानी ममता बनर्जी के लिए खड़ी कर दी है और इसकी वजह है बंगाल का ‘मुस्लिम फैक्टर’. पश्चिम बंगाल में लगभग 27 से 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से 100 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां अल्पसंख्यक मतदाता सीधे तौर पर हार-जीत का फैसला करते हैं. मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में यह आबादी बहुसंख्यक की भूमिका में है. पिछले कई चुनावों से यह वोटबैंक एकमुश्त होकर टीएमसी के पक्ष में मतदान करता आ रहा है, जिसने बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी को सत्ता के शिखर पर बनाए रखा है. लेकिन अब ओवैसी और हुमायूं कबीर के एक साथ आने से इस वोटबैंक में बिखराव का सीधा खतरा पैदा हो गया है. अगर यह गठबंधन इन इलाकों में 10 से 15 हजार वोट भी काट ले जाता है, तो दर्जनों सीटों पर टीएमसी के उम्मीदवार औंधे मुंह गिर सकते हैं.

ममता के गढ़ में भी चुनौती

ममता बनर्जी की परेशानी सिर्फ वोट कटने तक सीमित नहीं है, बल्कि हुमायूं कबीर ने सीधे उनके और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के गढ़ में चुनौती पेश कर दी है. कबीर ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए ऐलान किया है कि उनकी ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर सीट और बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ नंदीग्राम सीट पर मजबूत अल्पसंख्यक चेहरे उतारेगी. हालांकि इन दो हाई-प्रोफाइल सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों का खुलासा अभी नहीं किया गया है, लेकिन यह घोषणा अपने आप में सत्ता के शीर्ष चेहरों को उनके ही घर में घेरने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. इसके साथ ही, कबीर ने अपनी पुरानी रणनीति में बदलाव करते हुए स्पष्ट किया है कि वह खुद मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर और नौदा विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ेंगे, जबकि पहले उनके बेलडांगा से चुनाव लड़ने की अटकलें थीं.

औवैसी की तलाश हुई पूरी

ओवैसी और हुमायूं कबीर की राजनीतिक हैसियत का यह संगम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय लिख रहा है. असदुद्दीन ओवैसी राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रखर मुस्लिम नेता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन बंगाल में उन्हें हमेशा एक ऐसे स्थानीय चेहरे की तलाश रही है, जिसकी जमीनी पकड़ मजबूत हो. पिछले चुनावों में बिना किसी बड़े स्थानीय नेता के एआईएमआईएम बंगाल में खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई थी. लेकिन हुमायूं कबीर के रूप में ओवैसी को वह ‘मिसिंग लिंक’ मिल गया है. कबीर मुर्शिदाबाद जिले के एक बड़े जननेता माने जाते हैं और उनका जमीनी नेटवर्क बहुत मजबूत है. जब ओवैसी की राष्ट्रीय अपील और कबीर का स्थानीय दबदबा एक साथ मिलेगा, तो यह गठबंधन अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर एक गंभीर राजनीतिक ताकत बनकर उभरेगा.

बीजेपी क्‍यों होगी खुश

इस पूरे खेल में अगर कोई सबसे ज्यादा खुश है, तो वह है भारतीय जनता पार्टी (BJP). बीजेपी के रणनीतिकार हमेशा से बंगाल में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण और बंटवारे का इंतजार करते रहे हैं. बीजेपी यह भली-भांति जानती है कि टीएमसी का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच मुस्लिम वोटरों की एकजुटता है. ओवैसी और कबीर का गठबंधन जितना मजबूत होगा, ममता बनर्जी का वोटबैंक उतना ही दरकेगा. और जहां भी टीएमसी का पारंपरिक वोट बंटेगा, वहां सीधे तौर पर कमल खिलने की राह आसान हो जाएगी. खास तौर पर उन सीटों पर जहां हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है, वहां यह गठबंधन बीजेपी के लिए किसी ‘संजीवनी’ से कम साबित नहीं होगा.

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