सिर्फ प्रयागराज में ही नहीं, UP के इस जिले में भी दो नदियों का संगम, ‘लघु प्रयाग’ के नाम से जानते हैं लोग

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गोंडा: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित पसका एक प्राचीन और धार्मिक महत्व वाला स्थान है. यह स्थान सरयू और घाघरा नदियों के संगम पर बसा होने के कारण प्रसिद्ध है. इन्हीं दो पवित्र नदियों के मिलन की वजह से पसका को ‘लघु प्रयाग’ कहा जाता है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जैसे प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है, उसी तरह पसका में सरयू और घाघरा का संगम होने से यह स्थान भी आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है. मान्यता है कि यहां संगम में स्नान करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है. इसी कारण माघी पूर्णिमा, अमावस्या और अन्य पर्वों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.

क्यों कहा जाता है लघु प्रयाग
हिंदी और संस्कृत के साहित्यकार डॉ. श्री नारायण तिवारी बताते हैं कि इसको लघु प्रयाग इसलिए कहा जाता है कि हमारे उत्तर प्रदेश में दो ही प्रयाग हैं, एक प्रयागराज इलाहाबाद में है और दूसरा प्रयाग जिसे लघु प्रयाग के नाम से भी जाना जाता है, वह हमारे उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के सूकरखेत पसका में स्थित है.

क्यों कहा जाता है संगम
डॉ. श्री नारायण तिवारी बताते हैं कि इस स्थान पर सरयू और घाघरा का मिलन होता है. इसीलिए इस स्थान को संगम कहा जाता है और इसे लघु प्रयाग भी कहा जाता है. माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में केवल दो ही संगम हैं, एक प्रयागराज में है और दूसरा उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित है. यह भी माना जाता है कि कल्प वास केवल संगम पर ही करना चाहिए, इसीलिए लोग या तो प्रयागराज जाकर कल्प वास करते हैं या गोंडा के पसका में भी लोग पौष माह में 1 महीने के लिए आकर कल्प वास करते हैं.

उन्होंने बताया कि चतुर्दशी और द्वादशी को ब्राह्मण भोज करते हैं, उसके बाद अपने घर को वापस चले जाते हैं. माना जाता है कि जितना पुण्य प्रयागराज संगम में मिलता है, उतना ही पुण्य गोंडा के लघु प्रयाग संगम में भी मिलता है. नरहरिदास की कुटी भी है, जो गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु थे. माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने यहीं पर अपनी शिक्षा और दीक्षा प्राप्त की थी.

कहां-कहां से आते हैं श्रद्धालु
डॉ. श्री नारायण तिवारी बताते हैं कि यहां पर गोंडा जिला के अलावा श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच लखीमपुर खीरी, बाराबंकी और अयोध्या से श्रद्धालु आकर संगम का स्नान करते हैं. पौष मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा तिथि को यहां पर एक बहुत बड़ा मेले का आयोजन होता है. श्री नारायण तिवारी बताते हैं कि पहले जो सरयू और घाघरा का संगम होता था, वह एक बांध के वजह से बाधित हो गया है. सरकार से गुजारिश है कि बांध के पास एक साइफन लगा दिया जाए, ताकि सरयू और घाघरा का संगम बरकरार रहे.

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