Chaitra Navratri 2026 1700 year old temple Syahi Devi Temple Almora | यहां दिन में 3 बार बदलता है देवी की मूर्ति का रंग, 1700 साल पुराना यह मंदिर एक र

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यहां दिन में 3 बार बदलता है देवी की मूर्ति का रंग, 1700 साल पुराना है यह मंदिर

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Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि चल रहे हैं और इस वजह से हर जगह धार्मिक माहौल बना हुआ है. चैत्र नवरात्रि के मौके पर हम आपको ऐसे चमत्कारी और रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां माता की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है. साथ ही यह मंदिर एक ही रात में बनकर तैयार किया गया था. आइए जानते हैं उत्तराखंड की वादियों में मौजूद माता रानी के इस मंदिर के बारे में…

Chaitra Navratri 2026 Syahi Devi Temple: चैत्र नवरात्रि का पर्व चल रहा है और घर-घर माता रानी की पूजा अर्चना की जा रही है. धार्मिक मान्यता है कि चैत्र नवरात्रि में की गई साधना, व्रत और पूजा से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है, कष्टों का निवारण होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है. चैत्र नवरात्रि के मौके पर हम आपको माता रानी के एक ऐसे चमत्कारी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां देवी मां की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता रहता है. बताया जाता है यहां स्थित माता को 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है और यहां हर भक्त की इच्छा पूरी होती है. आइए चैत्र नवरात्रि के मौके पर जानते हैं माता रानी के इस मंदिर के बारे में…

कत्युरी शासनकाल में हुआ था मंदिर का निर्माण – उत्तराखंड की वादियां हमेशा से अपनी प्राकृतिक सुंदरता और रहस्यमयी धार्मिक स्थलों के लिए जानी जाती हैं. इन्हीं पहाड़ों के बीच अल्मोड़ा जिले के शीतलाखेत के पास स्थित एक बेहद प्राचीन और चमत्कारी मंदिर है स्याही देवी मंदिर, जिसे कई लोग शाही देवी मंदिर के नाम से भी जानते हैं. इस मंदिर के बारे में कई रोचक मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कत्युरी शासनकाल में हुआ था और इसकी प्राचीनता लगभग 900 से 1700 वर्ष के बीच मानी जाती है.

एक ही रात में बन गया था मंदिर – स्थानीय लोगों की मानें तो यह मंदिर केवल एक ही रात में बन गया था. कथा के अनुसार, मंदिर निर्माण के लिए गांववालों ने ईंटें तैयार की थीं, लेकिन उस रात तेज बारिश होने के बावजूद अगली सुबह जब लोग वहां पहुंचे तो ईंटें पूरी तरह पकी हुई मिलीं. इतना ही नहीं, मंदिर को जोड़ने के लिए चूने या सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया था, बल्कि बेल और गुड़ के मिश्रण से इसे जोड़ा गया था.

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52 गांवों की इष्ट देवी हैं स्याही देवी – स्याही देवी को आसपास के लगभग 52 गांवों की इष्ट देवी माना जाता है. उत्तराखंड के कई परिवार इन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत जरूर पूरी होती है. यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु इस मंदिर में माता के दर्शन करने और अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं. नवरात्रि के समय तो यहां विशेष पूजा-अर्चना और भक्ति का माहौल देखने को मिलता है.

तीन बार बदलता है मूर्ति का रंग – मंदिर की सबसे रहस्यमय बात यह बताई जाती है कि यहां स्थापित माता की मूर्ति का रंग दिन में तीन बार बदलता है. सुबह, दोपहर और शाम के समय मूर्ति का रंग अलग-अलग दिखाई देता है. भक्त इसे माता की दिव्य शक्ति और जीवंत उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं. माना जाता है कि वर्ष 1898 में स्वामी विवेकानंद भी यहां आए थे और उन्होंने इस पवित्र स्थान पर ध्यान व साधना की थी. इसी वजह से यह मंदिर कई संतों और साधकों की तपस्थली के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया.

घने जंगलों के बीच माता का मंदिर – मंदिर के आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी बेहद आकर्षक है. चारों ओर फैले घने देवदार और बांज के जंगल, शुद्ध पहाड़ी हवा और दूर-दूर तक दिखाई देती हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां यहां आने वाले हर व्यक्ति को सुकून और शांति का अनुभव कराती हैं. मंदिर के पास पेड़ों का एक ऐसा प्राकृतिक समूह है जो देखने में शेर की आकृति जैसा लगता है.

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