chaitra navratri 2026 fourth day maa Kushmanda temples | Navratri के चौथे दिन मां कुष्मांडा का आशीर्वाद लेने के लिए इन मंदिरों का करें दर्शन
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Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि के नौ दिन मां के अलग-अलग रूपों को समर्पित होते हैं और हर दिन मां की पूजा-अर्चना करने का विधान भी अलग होता है. आज हम नवरात्रि के चौथे दिन पूजे जाने वाली मां जगदम्बा के स्वरूप मां कुष्मांडा की बात करेंगे, जिन्हें जगत की आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है. मां कुष्मांडा देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इन तीन मंदिरों के दर्शन अवश्य करें. आइए जानते हैं माता के इन मंदिरों के बारे में…
Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि चल रहे हैं और इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. 22 मार्च दिन रविवार को मां दुर्गा की चौथी शक्ति मां कुष्मांडा की पूजा अर्चना की जाएगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा सृष्टि की आदिशक्ति मानी जाती हैं और ऐसा विश्वास है कि ब्रह्मांड की रचना उनके दिव्य हास्य से हुई. इसी वजह से भक्त मां कुष्मांडा की आराधना को सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति से जोड़कर देखते हैं. मां कुष्मांडा को समर्पित पूरे देशभर में कई मंदिर हैं, जहां दर्शन करके भक्त मां की विशेष कृपा पा सकते हैं. इन मंदिरों में दर्शन करने मात्र से भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और कष्ट व परेशानियों से मुक्ति मिलती है. आइए जानते हैं मां कुष्मांडा को समर्पित इन मंदिरों के बारे में…
पहले बात करते हैं कि मध्य प्रदेश स्थित लमान माता मंदिर की, जो दतिया में स्थापित है. इस मंदिर की गिनती प्राचीन शक्तिपीठों में होती है. इस मंदिर को ‘नौकरी देने वाली देवी’ का मंदिर कहकर भी पुकारा जाता है. स्थानीय मान्यता है कि अगर किसी को नौकरी लगने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, वह लमान माता के दर्शन जरूर करें. मंदिर में नवरात्रि के चौथे दिन मां को मालपुए का भोग लगाया जाता है और भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
उत्तर प्रदेश की धरती पर भी मां कुष्मांडा के दो मंदिर स्थापित हैं. एक मंदिर कानपुर में तो दूसरा वाराणसी में स्थित है. पहले बात करते हैं कानपुर के मां कुष्मांडा देवी मंदिर की. यह प्राचीन शक्तिपीठ मंदिर है, जहां का पवित्र जल आंखों पर लगाने से नेत्र रोगों से आराम मिलता है. देशभर से नेत्र विकारों से जूझ रहे लोग मंदिर में दर्शन के बाद पवित्र जल को अपने साथ लेकर जाते हैं. मंदिर में मां अष्टभुजी रूप में नहीं, बल्कि लेटी हुई प्रतिमा विराजित है. प्रतिमा से रहस्यमयी जल निकलता है, जिसे लोग अपने साथ लेकर जाते हैं.
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तीसरा और आखिरी मंदिर वाराणसी में तुलसी मानस मंदिर के पास है. कुंड होने की वजह से मंदिर को दुर्गाकुंड मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. मंदिर में लक्ष्मी, सरस्वती और काली जैसी देवियों की पूजा होती है, लेकिन नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा के रूप में तीनों देवियों को सजाया जाता है. मंदिर के बगल में दुर्गा कुंड नामक एक विशाल आयताकार जलकुंड है, जो मंदिर को आकर्षण का केंद्र बनाता है. हर साल कुंड में स्नान करने के लिए विशेष रूप से नवरात्रि में भारी संख्या में भक्त कुंड में स्नान के लिए पहुंचते हैं.