गाजीपुर मेडिकल कॉलेज की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई, ओपीडी से डॉक्टर नदारत; लग रही लंबी-लंबी लाइन

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Ghazipur News: लोकल 18 की टीम जब हॉस्पिटल पहुंची तब मरीजों की नाराजगी भी खुलकर सामने आई. एक मरीज ने बताया कि आज न्यूरो डॉक्टर की शुक्रवार को ओपीडी थी. लेकिन वह तो 12 ही बजे चल गए. पूरे दिन नहीं बैठे. सुबह से लाइन में लगे हैं. अब शाम हो गई है फिर भी इलाज नहीं मिला. स्थानीय लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज बनने के बाद बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद थी. लेकिन मौजूदा हालात उस उम्मीद के अनुरूप नहीं दिख रहे.

करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हुआ गाजीपुर राजकीय मेडिकल कॉलेज जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा देने के उद्देश्य से बनाया गया था. लेकिन आज इसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे है. बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को यहां लंबी कतारों, सीमित ओपीडी और डॉक्टरों की अनियमित उपस्थिति का सामना करना पड़ रहा है. जिससे लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है.

करोड़ों की लागत से बना गाजीपुर राजकीय मेडिकल कॉलेज क्या सिर्फ सफेद हाथी साबित हो रहा है? यह सवाल आज जिले की आम जनता के मन में है. समाजसेवी दीपक उपाध्याय और सुधांशु तिवारी ने मेडिकल कॉलेज की ओपीडी व्यवस्था और डॉक्टरों की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए है. ओपीडी में रोजाना भारी भीड़ के बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टरों की सीमित मौजूदगी ने मरीजों और उनके परिजनों की मुश्किलें बढ़ा दी है. हालात ऐसे है कि कई मरीज घंटों इंतजार के बाद बिना इलाज लौटने को मजबूर हो रहे है.

समाजसेवी दीपक उपाध्याय ने मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कार्डियो (हृदय रोग) और न्यूरो (नसों के रोग) जैसे संवेदनशील विभागों में विशेषज्ञों की भारी कमी है. उन्होंने कहा, नियम के मुताबिक विशेषज्ञों को हफ्ते में कम से कम तीन दिन बैठना चाहिए. लेकिन वे सिर्फ एक दिन उपस्थित होते है. उस एक दिन भी इतनी मारामारी मचती है कि मरीजों को पैरवी तक लगानी पड़ती है. दीपक ने मांग की है कि जिन विभागों में मरीजों की संख्या ज्यादा है, वहां ओपीडी के दिन बढ़ाए जाएं ताकि आम जनता को मेडिकल कॉलेज बनने का वास्तविक लाभ मिल सके.

9 से 3 की ड्यूटी, पर 12 बजते ही रवानगी
खुद इस व्यवस्था से पीड़ित समाजसेवी सुधांशु तिवारी ने न्यूरो विभाग के डॉ. अग्रज मिश्रा का नाम लेते हुए संगीन आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि बनारस से आने वाले कई डॉक्टर अपनी ड्यूटी का समय पूरा नहीं कर रहे है. सुधांशु ने सीधा सवाल किया, जब शासन से 9 से 3 बजे तक की सैलरी ली जा रही है तो डॉक्टर 12 बजे ही क्यों चले जाते हैं? कुछ डॉक्टर तो मेडिकल कॉलेज के अंदर कम और आरटीओ ऑफिस के पास अपनी निजी क्लिनिक पर ज्यादा समय दे रहे है. उन्होंने बताया कि प्राचार्य को कई बार मौखिक शिकायत दी गई, लेकिन सुधार सिर्फ दो-चार दिन का ही रहता है.

लोकल 18 की टीम जब हॉस्पिटल पहुंची तब मरीजों की नाराजगी भी खुलकर सामने आई. एक मरीज ने बताया कि आज न्यूरो डॉक्टर की शुक्रवार को ओपीडी थी. लेकिन वह तो 12 ही बजे चल गए. पूरे दिन नहीं बैठे. सुबह से लाइन में लगे हैं. अब शाम हो गई है फिर भी इलाज नहीं मिला. स्थानीय लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज बनने के बाद बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद थी. लेकिन मौजूदा हालात उस उम्मीद के अनुरूप नहीं दिख रहे.

ओपीडी की कमी
न्यूरो और हार्ट जैसे विभागों में सिर्फ एक दिन की ओपीडी से मरीजों की भारी भीड़ और पैरवी की नौबत. इन हालातों के बीच कुछ प्रमुख सवाल भी सामने आ रहे हैं. ओपीडी के सीमित दिनों के कारण मरीजों की भीड़ और पैरवी की स्थिति क्यों बन रही है. क्या सरकारी समय में निजी प्रैक्टिस स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित कर रही है? निर्धारित समय के बावजूद डॉक्टरों की पूर्ण उपस्थिति क्यों सुनिश्चित नहीं हो पा रही? शिकायतों के बावजूद स्थायी सुधार क्यों नहीं दिख रहा?

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Manish Rai

काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें

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