वो मुस्लिम संगीतकार, जो मंदिर की चौखट पर करता था रियाज, लता मंगेशकर की गायकी में ढूंढ़ते थे गलती
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वह मुस्लिम संगीतकार, जिनके संगीत ने मंदिर की चौखट से लेकर दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक सुरों की इबादत फैलाई. संगीत को उन्होंने कभी धर्म की सीमाओं में नहीं बांधा. बनारस की गंगा के किनारे बैठकर वह घंटों रियाज करते और मां सरस्वती के उपासक होते हुए भी अपने हर सुर में खुदा को ढूंढते थे. लता मंगेशकर की गायकी में वह गलती तलाशते, लेकिन हर बार केवल पूर्णता पाते. बेगम अख्तर की गजल सुन वह रात को दो बजे उनका रिकॉर्ड खोजने निकल पड़ते थे. उनकी सादगी और सुर की यह विरासत आज भी अमर है.
नई दिल्ली. वो शख्स, जिसकी शहनाई की गूंज ने दुनिया भर में भारतीय संगीत की पहचान बनाई, एक ऐसा फनकार था जिसने सुर को ही अपनी इबादत बना लिया. मजहब से मुस्लिम होने के बावजूद वह रोज मंदिर की चौखट पर बैठकर रियाज करता था और मां सरस्वती को नमन करते हुए ‘सच्चे सुर’ की तलाश में डूब जाता था. उसकी जिंदगी गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे खूबसूरत मिसाल थी, जहां संगीत ही सबसे बड़ा धर्म था.संगीत के प्रति उसका समर्पण इतना गहरा था कि उसने अपनी अंतिम सांस तक सुरों की साधना नहीं छोड़ी. वह सिर्फ खुद महान कलाकार नहीं था, बल्कि दूसरों की कला का भी उतना ही बड़ा कद्रदान था. खासकर लता मंगेशकर की आवाज को वह बेमिसाल मानता था. वह अक्सर उनके गानों में कोई कमी खोजने की कोशिश करता, लेकिन हर बार उसे सिर्फ ‘पूर्णता’ ही मिलती. एक और मशहूर गायिका बेगम अख्तर की गजल सुनकर तो वह आधी रात को ही उस आवाज के पीछे निकल पड़ा था. यही जुनून और सादगी उसे असाधारण बनाती है.
शहनाई की वह अमर गूंज, जिसने सात समंदर पार तक भारतीय संस्कृति की आत्मा का साक्षात्कार कराया, वह नाम है ‘भारत रत्न’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खां. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां केवल एक महान संगीतकार ही नहीं, बल्कि सादगी और गंगा-जमुनी तहजीब की एक मुकम्मल मिसाल थे. मंदिर की चौखट पर रियाज करने वाले उस्ताद अपनी हर इबादत में खुदा से सिर्फ ‘सच्चा सुर’ मांगते थे. फोटो साभार-@UstadBismillahKhanOfficial/facebook
उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक केवल सुर की साधना की. संगीत के प्रति समर्पित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां स्वयं भी महान कलाकारों के कद्रदान थे, वे स्वर कोकिला लता मंगेशकर और विख्यात गायिका बेगम अख्तर के बहुत बड़े प्रशंसकों में से एक थे. 21 मार्च को बिहार में जन्मे बिस्मिल्लाह खां को संगीत का प्रेम 6 साल की उम्र में बनारस ले आया, जहां के मंदिर में वे बैठकर घंटों रियाज करते थे और मां सरस्वती के बड़े उपासक थे. फोटो साभार-@UstadBismillahKhanOfficial/facebook
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने कभी संगीत को धर्म के बीच नहीं आने दिया और शायद यही कारण था कि बनारस में बहती गंगा की हर लहर उनके सुरों की गवाह बनी थी. खुद शहनाई और संगीत में ख्याति प्राप्त कर चुके बिस्मिल्लाह खां को लता मंगेशकर और गायिका बेगम अख्तर की आवाज बहुत पसंद थी. आलम यह था कि रात को 2 बजे वे गायिका बेगम अख्तर की ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वर्ना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे’ गजल को सुनकर सुबह रिकॉर्ड कहां बज रहा था यह ढूंढने के लिए निकल पड़े थे. फोटो साभार-@UstadBismillahKhanOfficial/facebook
बिस्मिल्लाह खां को सोते हुए यह गजल सुनाई दी थी और वे बेगम अख्तर की गायिकी के कायल हो गए. उनका कहना था कि बेगम अख्तर की आवाज में जादू था, जो हर कोई अदायगी और सुर के साथ नहीं कह सकता है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां स्वर कोकिला लता मंगेशकर की गायकी के भी प्रशंसक थे. फोटो साभार-@UstadBismillahKhanOfficial/facebook
दिलचस्प बात यह है कि वे अक्सर लता के गायन में कोई सूक्ष्म त्रुटि या कमी खोजने का प्रयास करते थे, परंतु हर बार उन्हें केवल ‘पूर्णता’ ही मिलती थी. एक पुराने साक्षात्कार में शहनाई सम्राट ने स्वयं स्वीकार किया था, ‘जो अभिव्यक्ति लता के स्वर में है, वह किसी और में नहीं है. जब उनके रिकॉर्ड बजते थे तो मैं बहुत ध्यान से सुनता था और यह जानने की कोशिश करता था कि कहीं तो कोई सुर थोड़ा डिगा होगा या कोई शब्द बेसुरा हुआ होगा, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. हर लफ्ज, हर सुर एकदम बराबर होता था. वो जब बोलती, सुरीली बोलती; जो बात लता में है, वो किसी और में नहीं.’ फोटो साभार-@UstadBismillahKhanOfficial/facebook
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और लता मंगेशकर दोनों ने ही संगीत को वैश्विक स्तर पर पहचाने बनाने में अपना-अपना योगदान दिया. दोनों को साल 2001 में एक साथ भारत के सर्वोच्च नागरिक के पुरस्कार से नवाजा गया था. दोनों ही सादगी और संगीत से प्यार करते थे और पूरा जीवन कला को समर्पित किया. फोटो साभार-@UstadBismillahKhanOfficial/facebook