ईरान से युद्ध छेड़कर ट्रंप ने अपना उल्‍लू तो सीधा कर लिया, एक तीर से लगा दिए दो निशाने, अब कोई मरे या जिये-उन्‍हें क्‍या

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America vs Iran Conflict : अमेरिका और इजराइल ने जब ईरान पर हमले किए तो किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि ट्रंप के मन में इसे लेकर आखिर क्‍या खिचड़ी पक रही है. अब जबकि इस लड़ाई को करीब एक साल होने को हैं तो आंकड़े बताते हैं कि ट्रंप ने एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं. उन्‍होंने न सिर्फ अमेरिकी हथियारों की डिमांड बढ़ा दी है, बल्कि डॉलर को भी मजबूत कर दिया है.

ईरान से युद्ध छेड़कर ट्रंप ने अपना उल्‍लू कर लिया सीधा, एक तीर से 2 निशाने Zoom

ईरान युद्ध के बाद अमेरिकी हथियारों और डॉलर की डिमांड बढ़ गई है.

नई दिल्‍ली. इजराइल और अमेरिका ने जब ईरान पर हमला शुरू किया तो दुनिया में किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि इसका एक सिरा डोनाल्‍ड ट्रंप के मंसूबों से भी जुड़ा है. अमेरिका ने ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़कर अपने दो मंसूबे एकसाथ पूरे कर लिए हैं. अगर आप अभी तक नहीं समझे तो जरा अमेरिका का इतिहास देखिए, उसे सबसे ज्‍यादा आमदनी हथियार बेचकर या फिर डॉलर को मजबूत बनाकर होती है. ट्रंप जबसे सत्‍ता में आए हैं, उन्‍हें सिर्फ अमेरिका का हित दिख रहा है. यही वजह है कि ट्रंप ने टैरिफ वॉर से लेकर ईरान युद्ध तक तमाम पैंतरे आजमा लिए हैं. पश्चिम एशिया के संकट से अमेरिका को होने वाले दोहरे फायदे जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे.

सबसे पहले आपको यह बताते हैं कि अमेरिका के राष्‍ट्रपति ट्रंप ने हथियार और डॉलर दोनों को एकसाथ आखिर कैसे साधा है. ईरान के साथ युद्ध तो शुरू किया था इजराइल और अमेरिका ने, लेकिन ईरान ने अन्‍य खाड़ी देशों कतर, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई पर भी हमला बोल दिया. इन देशों को अंदाजा नहीं था कि जो आग अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान में लगा रहे हैं, वही आग उनके देश में भी फैल सकती है. ईरान इन देशों से नाराज इसलिए हुआ, क्‍योंकि अमेरिका ने इन सभी खाड़ी देशों को अपने साथ मिला रखा है और वहां पर अपनी सेना के बेस भी बना दिए हैं.

ईरान ने क्‍यों साधा खड़ी देशों पर निशाना
अगर आप यह सोच रहे हैं कि ईरान पर हमला तो इजराइल और अमेरिका ने किया है तो फिर वह खाड़ी देशों पर हमले क्‍यों कर रहा है तो यह जान लीजिए क‍ि अमेरिका को ईरान के खिलाफ सारे इनपुट इन्‍हीं देशों से मिलते हैं. अमेरिका ने इन देशों में अपने सैन्‍य अड्डे बना रखे हैं. इसी बात से ईरान नाराज है, क्‍योंकि उसके आसपास के यह सभी देश अमेरिका के हितैषी हैं. ईरान ने जब इन देशों पर हमला किया तो उन्‍हें भी अपनी सुरक्षा का ख्‍याल आया, क्‍योंकि अमेरिका ने युद्ध भले ही इन देशों की मदद से शुरू किया था, लेकिन जब ईरान ने इन पर हमले किए तो मदद के लिए आगे नहीं आया. इसके बजाय इन देशों से अपने हथियार खरीदने का दबाव बनाया.

पहला निशाना- हथियार बेचकर पैसे कमाना
ट्रंप का पहला निशाना खाड़ी देशों को हथियार बेचकर मुनाफा कमाना था. यह बात तो पूरी दुनिया जानती है कि अमेरिका की अर्थव्‍यवस्‍था में हथियारों और तकनीक का अहम रोल है. वह दुनिया के तमाम देशों को अपने हथियार और तकनीक बेच कर मोटा पैसा कमाता है. ट्रंप ने भी ईरान के साथ मिडल ईस्‍ट को युद्ध की आग में झोंककर अपने हथियारों की डिमांड बढ़ा दी. पिछले दिनों खबर थी कि सऊदी अरब ने अमेरिका से 7 अरब डॉलर के हथियार खरीदने का करार किया है. इसका मतलब है कि अकेले सऊदी अरब ही ईरान युद्ध की वजह से अमेरिका से करीब 65 हजार करोड़ रुपये का हथियार खरीद रहा है.

खाड़ी देशों को कितना हथियार बेचा
ईरान के खिलाफ भले ही मार्च से हमले तेज हुए हैं, लेकिन इजराइल और अमेरिका का हमला जून, 2025 में ही शुरू हो गया था. तब से अब तक अमेरिका ने खाड़ी देशों को करीब 3 लाख करोड़ रुपये के हथियार बेच दिए हैं. ईरान के खौफ की वजह से सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, ओमान जैसे देशों ने अमेरिका ने जमकर हथियार खरीदे हैं. इस खरीद में एयर डिफेंस से लेकर ड्रोन तक शामिल हैं. खाड़ी देशों को सबसे ज्‍यादा डर ईरान की मिसाइलों से हैं, लिहाजा उन्‍होंने मिसाइल डिफेंस सिस्‍टम को लेकर मोटा पैसा खर्च किया है.

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Pramod Kumar Tiwari

प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्‍वेस्‍टमेंट टिप्‍स, टैक्‍स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें

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