chaitra navratri 2026 today Shaktipeetham Kashi Vishalakshi Amma Adi Shankaracharya established powerful Sri Yantra | शिवनगरी काशी में शक्तिपीठ, यहां

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शिवनगरी काशी में शक्तिपीठ, आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था श्रीयंत्र

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Shaktipeetham Kashi Vishalakshi Amma: चैत्र नवरात्रि की आज से शुरुआत हो चुकी है और इस मौके पर आज हम आपको शिवनगरी के शक्तिपीठ के बारे में बताने जा रहे हैं. यहां माता सती के कर्णफूल गिरे थे और मंदिर के गर्भगृह में माता की चल-अचल दो प्रतिमाएं भी मौजूद हैं. चैत्र नवरात्रि के मौके पर आइए जानते हैं पावन स्थान मां विशालाक्षी धाम के बारे में…

Shaktipeetham Kashi Vishalakshi Amma: आदि शक्ति की आराधना को समर्पित पर्व चैत्र नवरात्रि की आज से शुरुआत हो चुकी है. आज नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा की पहली शक्ति की पूजा अर्चना घर-घर की जा रही है. देश-दुनिया में माता के कई दिव्य धाम हैं, जहां वह कई रूप में निवास करती हैं. ऐसा ही एक दिव्य धाम देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में स्थित है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है. पौराणिक मान्यता है कि काशी में भगवती सती का कर्णकुंडल गिरा था. यह मंदिर दक्षिण शैली में बना हुआ है और आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में यहां श्रीयंत्र स्थापित किया था. यहां माता सभी की इच्छाओं को पूरा करती हैं और परेशानियों को दूर करती हैं. आइए जानते हैं शिव नगरी काशी में स्थित माता का यह शक्तिपीठ…

जहां-जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए. काशी में भगवती सती का कर्णकुंडल यानी कान का आभूषण गिरा था, इसलिए यह पावन स्थान मां विशालाक्षी धाम के नाम से जाना जाता है. आम दिनों के साथ ही नवरात्रि और कुछ अन्य विशेष दिनों में यहां मां के दर्शन और आराधना का विशेष महत्व है.

उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, विशालाक्षी देवी मंदिर वाराणसी का एक प्रमुख शक्तिपीठ है. यह मंदिर शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना का अनुपम केंद्र है. सदियों से यह धाम आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है. चैत्र नवरात्रि के शुभ अवसर पर मां विशालाक्षी के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु आते हैं. भक्त दूर-दूर से यहां पहुंचकर मां का आशीर्वाद लेते हैं. चैत्र नवरात्रि, वासंतिक नवरात्रि या गुप्त नवरात्रि हर अवसर पर यहां मां की आराधना होती है.

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आदि शक्ति मां के 51 शक्तिपीठों में से एक विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी के दशाश्वमेध घाट के मीरघाट में स्थित है. यह पवित्र धाम मणिकर्णिका घाट से कुछ दूरी पर है. इस मंदिर को मां विशालाक्षी गौरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. काशी में विशालाक्षी मंदिर भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है. खास बात है कि मंदिर से काशी विश्वनाथ मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर भी ज्यादा दूर नहीं हैं.

माता विशालाक्षी का यह मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है. इतिहासकारों के अनुसार इसका पुनर्निर्माण विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने करवाया था. आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में यहां श्रीयंत्र स्थापित किया था. 1908 में दक्षिण भारतीय भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था.

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान देखकर देवी सती ने आत्मदाह कर लिया. क्रोधित होकर भगवान शिव सती का शरीर कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे. देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की. विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया. जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने. वाराणसी में कर्णफूल गिरने से यह स्थान विशालाक्षी शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. इस शक्तिपीठ के समीप काल भैरव भी विराजमान हैं.

विशालाक्षी मंदिर में मां की दो प्रतिमाएं हैं, एक चल (चलने वाली) और दूसरी अचल (स्थिर). दोनों की पूजा-अभिषेक समान रूप से होती है. मां विशालाक्षी की श्याम रंग की प्रतिमा मनमोहक है. वहीं, चल मूर्ति की विशेष पूजा नवरात्रि के दौरान विजयादशमी के दिन घोड़े पर सवार करके की जाती है. अचल मूर्ति की विशेष पूजा साल में दो बार होती है, पहली भादों मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया (कजरी तीज) को मां के जन्मोत्सव के रूप में और दूसरी दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट के रूप में. मंदिर में दक्षिण भारतीय पूजा पद्धति भी अपनाई जाती है. दक्षिण भारत से बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन करने आते हैं.

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