जीभ पर गुलाब जामुन और जलेबी का स्वाद…आ गया ना पानी… तो ईरान को भी थैंक्स करिए

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अभी अभी एक गुलाब जामुन आपकी जीभ पर आया है…और महसूस हो रही है मधुरता, मिठास और साफ्टनेस. जीभ पर घुलती हुई स्वीट हलचल. गोल जलेबी की बात भी कर लें. चरपरी, रसभरी. क्रिस्पी टैक्सचर. जीभ आनंद के सागर में गोते लगा रही है. कहने की जरूरत नहीं कि जीभ पर पानी की तरंगे डांस करने लगी होंगी. तो जनाब इसके लिए ईरान का धन्यवाद भी बनता है. वैसे तो वहां खानपान का बहुत कुछ आया लेकिन ये दो मिठाइयां भी आईं. फिर भारत की मिट्टी-पानी में सदाबहार सुपरहिट हो गईं. इनके ईरान से आने और हरदिल अजीज बनने की भी कहानी है.

जलेबी के बगैर हममें से बहुत से लोगों के सुबह का नाश्ता अधूरा रहता है. कोई ऐसा नहीं जो इसका दीवाना नहीं हो. गोल रसीला अंदाज. जलेबी की पैदाइश ईरान में 10वीं शताब्दी में हुई. सबसे पुराना जिक्र मिलता है अरबी और फारसी कुकबुक किताब अल-तबीख में, जिसे मुहम्मद बिन हसन अल-बगदादी ने लिखा. इसमें जलेबी को “ज़ुलाबिया” या “ज़लाबिया” कहा गया. इसे घी में तलकर शहद, गुलाबजल, मस्क और कपूर वाली चाशनी में डुबोया जाता था. दूध, मक्खन या मिर्च भी मिलाते थे. यह रमजान के इफ्तार या त्योहारों में आम थी. ईरान में आज भी इसे ज़ूल्बिया कहते हैं – खूब खाते हैं.

मध्यकाल में फारसी और तुर्की व्यापारी, कारीगर और आक्रमणकारियों के साथ 15वीं शताब्दी या उससे पहले ही ये मिठाई भारतीय उपमहाद्वीप में घुल गई. सबसे पुराना भारतीय जिक्र 1450 ई. के जैन ग्रंथ प्रियमकर-नृप-कथा में मिलता है. 1600 ई. से पहले का संस्कृत ग्रंथ गुण्यगुणबोधिनी तो इसकी पूरा रेसिपी देता है. 17वीं सदी में रघुनाथ ने अपनी पाक कला से संबंधित किताब भोजमा कौतुहल में जलेबी की तारीफ की है.

जलेबी भारत में आमतौर पर उड़द दाल के बैटर से बनती है. कड़ाही के गर्म तेल या घी में आते ही डीपफ्राई होना शुरू करती है और इस प्रक्रिया में पहले सफेद से पीलापन लेती है और फिर ज्यादा गर्म होते हुए क्रिस्पी नारंगी लाल रंग में बदल जाती है. बस इसी समय इसे कड़ाही से निकाला जाता है और चाशनी से भरे दूसरे बर्तन में डुबो दिया जाता है. कुछ ही मिनटों में इसकी अंदर से खाली क्रिस्पी शिराओं में चाशनी तो भरती ही है, साथ ही इसे बाहर से भी मीठे अंदाज सरोबोर कर देती है.लीजिए जलेबी तैयार है. और खाने में क्या यम्मी.

नादिर शाह लेकर आया

इसे इसके अलावा जौ से बनाते हैं, आटे से भी और बेसन से भी. पहले तो आमतौर पर जौ और गुड़ से बनी जलेबियां ही प्रचलन में थीं. हालांकि जलेबी के बारे में कहते हैं कि 12 वीं शताब्दी या 13वीं शताब्दी में नादिर शाह इसे ईरान से लेकर आया. इसे तब जौलबिया या जिलेबिया कहा जाता था. भारत में लोकप्रिय होने के साथ इसे जलेबी कहा जाने लगा.

ये भी कहा जाता है कि यह व्यंजन तुर्की और फ़ारसी व्यापारियों और कारीगरों के साथ भारतीय तटों तक पहुंचा. जल्द ही उपमहाद्वीप के लोगों ने इसे अपना लिया. इसे जलेबी कहना शुरू कर दिया.

गोल – गोल जलेबी में समय के साथ गोल-गोल घुमते हुए फैलती चली गई. मुगल शासकों की रसोई के बाद ये दिल्ली के हलवाइयों तक पहुंची. फिर हर मौहल्ले और कॉलोनी की मिठाई और नाश्ते की दुकानों तक. भारतीय जिस व्यंजन को रोज खूब खाते हैं और दिन की शुरुआत करते हैं, उसमें एक जलेबी भी है. सुबह सुबह अक्सर इसीलिए हलवाइयों की दुकानें गुलजार रहती हैं. हालांकि गुजरात का दावा है कि जलेबी सबसे पहले उसके यहां बनी.

गुलाब जामुन के आने की कहानी 

अब मीठे मधुर गुलाब जामुन की बात. इस मिष्ठान की जड़ें भी ईरान में हैं. 13वीं शताब्दी के अरबी-फारसी डेजर्ट लुकमत अल-कादी ने इसके बारे में लिखा. ये मैदे की गोलियां घी में तलकर शहद या गुलाबजल वाली चाशनी में डुबोकर खाई जाती थी. फारसी में कही जाने वाली “बामिएह” और तुर्की की “तुलुम्बा” भी इसी परिवार के हैं.

भारत में ये मुगल साम्राज्य के समय यानि 16वीं शताब्दी के आसपास आई और विकसित हुई. इसमें गुलाब शब्द फारसी से आया यानि गुल का आब मतलब फूल का पानी. गुलाबजल वाली चाशनी. जामुन शब्द इसे हिंदुस्तान से मिला. काला जामुन फल जैसे रंग के कारण.

वैसे गुलाब जामुन का फारसी वर्जन अगर मैदा आधारित था, तो भारतीय वर्जन खोया या छेना मिलाकर नरम बना हुआ. मुंह में जाते ही आहिस्ता आहिस्ता घुल जाने वाला टेक्सचर.

मुगल रसोई मेंं गलती से बनी

इसकी सबसे रोचक कहानी मुगल रसोई से जुड़ी है. शाहजहां के रॉयल शेफ ने गलती से इसे बना दिया. फारसी-तुर्की परंपरा और स्थानीय हलवाई से प्रेरित होकर खोया-मैदा का मिश्रण तल दिया. फिर गुलाबजल वाली चाशनी में डुबो दिया. बादशाह को इतना पसंद आया कि यह स्वीटडिश दरबार से आम जनता तक पहुंच गई. वैसे ये बात अलग है कि गुलाब जामुन का मूल स्वरूप ईरान से आया लेकिन अब ये मिठाई वहां से गायब हो चुकी है.

बिरयानी और पुलाव 

वैसे तो बिरयानी और पुलाव भी फारसी तकनीक का व्यंजन है. फारसी में इसे ‘पिलाफ’ कहा जाता था, जिसमें चावल को मांस और सुगंधित मसालों के साथ पकाया जाता था. भारत आकर इसमें तीखे मसालों का मेल हुआ. ये ‘बिरयानी’ बनी. नान फारसी है. खमीर वाली रोटी बनाने की कला और मिट्टी के तंदूर का बड़े पैमाने पर उपयोग फारस से ही भारत आया. कोफ्ता भी वहीं से आया.

कोफ्ते से लेकर शर्बत और सिरका तक 

फारसी में ‘कोफ्तन’ का अर्थ है ‘कूटना’ या ‘पीसना’. कीमे के गोल कोफ्ते बनाने की परंपरा वहीं से आई, जिसे भारत में शाकाहारी रूप देकर ‘लौकी के कोफ्ते’ या ‘मलाई कोफ्ता’ बनाया गया. हालांकि कबाब तुर्की और अरब में भी मशहूर थे लेकिन उन्हें नरम बनाने और उनमें मेवे व केसर डालने की नजाकत फारसी प्रभाव है.

ग्रेवी में सूखे मेवों का इस्तेमाल करना फारसी रसोइयों की विशेषता थी. आज हम जो ‘शाही पनीर’ या ‘नवरत्न कोरमा’ खाते हैं, वह इसी शैली की देन है. ‘हलवा-ए-तर’ और गाजर का हलवा वहां की ही देन है. ‘शर्बत’ शब्द फारसी है. फलों के रस और फूलों के अर्क से ठंडे पेय बनाना ईरान की पुरानी परंपरा है. खाने में खटास के लिए सिरके का इस्तेमाल भी फारसी प्रभाव माना जाता है. यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर हमारे खाने से फारसी प्रभाव हटा दिया जाए, तो हमारी आज की ‘थाली’ अधूरी दिखेगी.

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