राफेल-तेजस का बाप, S-400 भी इसके आगे मांगेगा पानी, ब्रह्मोस संग खूब जमेगी जोड़ी – india consider to join European 6th generation fighter jet Program

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6th-Generation Fighter Jet: 21वीं सदी में यदि अपने हितों की रक्षा करनी है तो कूटनीति के साथ डिफेंस टेक्‍नोलॉजी में महारत हासिल करना भी जरूरी हो गया है. रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में टकराव ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. डोनाल्‍ड ट्रंप की अगुआई वाला अमेरिका अब अपने ही सदियों पुराने मित्र देशों के लिए भरोसेमंद नहीं रह गया है. ऐसे में भारत के लिए एक मुकम्‍मल और भरोसेमंद दोस्‍त की तलाश करना जरूरी हो गया है, जिससे डिफेंस टेक्‍नोलॉजी हासिल की जा सके. भारत ने 5th जेनरेशन का एयरक्रकाफ्ट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोग्राम लॉन्‍च किया है. वहीं, पड़ोसी देश चीन हमसे इस मामले में दो कदम आगे निकल चुका है. चीन ने न केवल पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट डेवलप किया है, बल्कि 6th जेनरेशन के एयरक्राफ्ट का ट्रायल भी कर रहा है. अब ऐसे हालात में भारत के लिए 6th जेन टेक्‍नोलॉजी हासिल करना जरूरी हो गया है, ताकि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को बनाए रखा सके. यही वजह है कि नई दिल्‍ली अब यूरोप के उस क्‍लब में शामिल होने पर विचार कर रहा है, जिसने 6th जेनरेशन फाइटर जेट बनाने के लिए प्रोग्राम शुरू करने की बात कही है. एक गुट की अगुआई ब्रिटेन तो दूसरे का नेतृत्‍व फ्रांस और जर्मनी जैसे देश कर रहे हैं.

भारत छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में शामिल होने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है. यह कदम भारतीय वायुसेना (IAF) की भविष्य की युद्धक क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. रक्षा मंत्रालय (MoD) ने संसद की स्थायी समिति को सूचित किया है कि भारत यूरोप के दो प्रमुख कंसोर्टियम (ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) और फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS)) में से किसी एक के साथ साझेदारी की संभावनाओं का आकलन कर रहा है. यह पहला मौका है जब आधिकारिक तौर पर संकेत मिला है कि भारत अपने स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम से आगे बढ़कर छठी पीढ़ी के विमानों के विकास में भागीदारी पर विचार कर रहा है. यह निर्णय भारत को वैश्विक स्तर पर उन्नत सैन्य विमानन तकनीक के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है.

एक कदम आगे की बात

छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान वर्तमान पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमानों (जैसे F-22, F-35 और चीन के J-20) से एक कदम आगे माने जाते हैं. जहां पांचवीं पीढ़ी के विमान स्टील्थ, सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध पर आधारित हैं, वहीं छठी पीढ़ी के प्लेटफॉर्म सिस्टम ऑफ सिस्टम्स की अवधारणा पर आधारित होंगे. इनमें मानवयुक्त विमान के साथ साथ स्वायत्त ड्रोन के झुंड को नियंत्रित करने की क्षमता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेस्‍ड डिसीजन सिस्‍टम, एडवांस सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्‍टम्‍स शामिल होंगे. इसके अलावा इन विमानों में एडैप्टिव साइकिल इंजन, गाइडेड वेपन सिस्‍टम (जैसे लेजर) और बेहद कम दृश्यता (लो ऑब्जर्वेबिलिटी) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग की संभावना है. भविष्य के युद्धक्षेत्र में जहां घनी वायु रक्षा प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और स्वायत्त प्रणालियों का वर्चस्व होगा, वहां ऐसे प्लेटफॉर्म निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. इसका एक मतलब यह हुआ कि छठी पीढ़ी के फाइटर जेट्स S-400 जैसे एयर डिफेंस सिस्टम को भी चकमा देने में सक्षम होंगे.

यूरोप के दो धड़ों ने 6th जेन जेट डेवलप करने की योजना बनाई है. एक अगुआई ब्रिटेन तो दूसरे की फ्रांस-जर्मनी जैसे देश कर रहे हैं. (फाइल फोटो/Reuters)

6th जेन जेट की दौड़ तेज

वैश्विक स्तर पर छठी पीढ़ी के विमानों की दौड़ तेज हो चुकी है. अमेरिका अपने F-47 कार्यक्रम पर काम कर रहा है, जो F-22 का स्थान ले सकता है, जबकि चीन भी अपने अगली पीढ़ी के स्टील्थ प्लेटफॉर्म के विकास में जुटा हुआ है. पिछले कुछ वर्षों में चीनी कार्यक्रम के तहत दो प्रोटोटाइप सामने आने की खबरें भी सामने आई हैं. ऐसे में भारत के लिए इस दौड़ में पीछे न रहना एक रणनीतिक आवश्यकता बन गई है. हाल के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों ने भी इस दिशा में सोच को तेज किया है. ईरान में जारी युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में स्टील्थ तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और मानव रहित प्रणालियों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो चुकी है. कम लागत वाले ड्रोन भी अब महंगी वायु रक्षा प्रणालियों को चुनौती दे रहे हैं, जबकि स्टील्थ विमान जटिल अभियानों के लिए जरूरी बने हुए हैं.

भारत की क्‍या स्थिति

भारत की वर्तमान स्थिति को देखें तो भारतीय वायुसेना अभी चौथी पीढ़ी के तेजस Mk1A विमानों की आपूर्ति में चुनौतियों का सामना कर रही है. इसके साथ ही AMCA कार्यक्रम को तेज करने के प्रयास जारी हैं, जिससे अगले दशक में एक स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान सेवा में शामिल किया जा सके. हालांकि, सरकार अब इससे आगे की योजना भी बना रही है, जो दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती है. GCAP कार्यक्रम में यूनाइटेड किंगडम, इटली और जापान शामिल हैं, और इसे 2030 के दशक के मध्य तक परिचालन में लाने का लक्ष्य है. दूसरी ओर, FCAS कार्यक्रम फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के नेतृत्व में विकसित किया जा रहा है, हालांकि इसमें मतभेदों के कारण कुछ देरी भी देखी गई है. दोनों कार्यक्रमों का उद्देश्य एक ऐसे उन्नत स्टील्थ फाइटर का निर्माण करना है, जो मानव रहित रिमोट कैरियर्स और डिजिटल कॉम्बैट क्लाउड के साथ काम कर सके.

फायदे का सौदा

भारत के लिए इन कार्यक्रमों में शामिल होना कई मायनों में फायदेमंद हो सकता है. इससे भारतीय उद्योग और वैज्ञानिकों को अत्याधुनिक तकनीकों (जैसे इंजन निर्माण, सेंसर, AI और उन्नत सामग्री) तक शुरुआती पहुंच मिल सकती है. इन क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से विकास करना बेहद महंगा और जटिल है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग एक व्यवहारिक विकल्प बन सकता है. हालांकि, यह निर्णय आसान नहीं होगा. इसमें तकनीकी साझेदारी, लागत, रणनीतिक स्वायत्तता और दीर्घकालिक रक्षा नीति जैसे कई पहलुओं पर विचार करना होगा. साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विदेशी सहयोग के बावजूद भारत की स्वदेशी क्षमताओं का विकास बाधित न हो. भारत का छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में शामिल होने पर विचार करना यह दर्शाता है कि वह भविष्य की वायु शक्ति के स्वरूप को लेकर गंभीर है.

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