चैती छठ 2026 का पूरा शेड्यूल: नहाय-खाय से उगते सूर्य तक, नोट कर लें सभी तारीख, जानें चैती छठ और छठ में अंतर

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Chaiti Chhath 2026: जब मौसम करवट लेता है और दिन थोड़े लंबे लगने लगते हैं, तब प्रकृति के साथ हमारे जीवन की लय भी बदलती है. ऐसे ही बदलाव के दौर में आता है चैती छठ एक ऐसा पर्व जो सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी बेहद खास माना जाता है. इस बार 22 मार्च 2026 से शुरू हो रहा यह चार दिवसीय पर्व सूर्य की ऊर्जा और ग्रहों की स्थिति के साथ जुड़ा हुआ है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस समय सूर्य की स्थिति शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाली होती है. यही वजह है कि इस पर्व को सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक संतुलित जीवनशैली के रूप में भी देखा जाता है.

सूर्य और ग्रहों का खास संयोग
चैत्र मास में जब सूर्य मीन राशि से मेष की ओर बढ़ने की तैयारी करता है, तब ऊर्जा का स्तर बदलता है. ज्योतिष में इसे संक्रमण काल कहा जाता है. इस दौरान सूर्य की उपासना करने से कुंडली में सूर्य मजबूत होता है, जिससे आत्मविश्वास, स्वास्थ्य और निर्णय क्षमता बेहतर होती है. कई लोग इसे अपने जीवन में नई शुरुआत के संकेत के रूप में भी देखते हैं.

क्यों खास है यह समय
ज्योतिषीय मान्यता है कि इस दौरान सूर्य की किरणें शरीर के ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करती हैं. सुबह और शाम अर्घ्य देने की परंपरा इसी ऊर्जा संतुलन से जुड़ी मानी जाती है. यह समय मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक स्थिरता के लिए भी अनुकूल माना जाता है.

चैती छठ और कार्तिक छठ में अंतर
साल में दो बार मनाया जाने वाला छठ पर्व चैती और कार्तिक दोनों का ज्योतिषीय आधार अलग-अलग होता है. चैती छठ जहां सूर्य के उदीयमान प्रभाव का प्रतीक है, वहीं कार्तिक छठ सूर्य की स्थिरता और ठंड के मौसम में ऊर्जा संतुलन का संकेत देता है. चैती छठ अधिक निजी और पारिवारिक होता है. इसमें लोग अपने घरों के पास या छोटे घाटों पर पूजा करते हैं. जबकि कार्तिक छठ बड़े स्तर पर, सामूहिक रूप से मनाया जाता है.

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चार दिनों का पूरा शेड्यूल
22 मार्च से शुरू होने वाला यह पर्व चार दिनों तक चलता है, और हर दिन का अपना ज्योतिषीय महत्व है.

नहाय-खाय (22 मार्च)
इस दिन शुद्धता की शुरुआत होती है. माना जाता है कि यह शरीर और मन को ग्रहों के प्रभाव के लिए तैयार करने का चरण है.

खरना (23 मार्च)
पूरे दिन का व्रत और शाम को गुड़ की खीर इसे चंद्रमा और सूर्य के संतुलन का प्रतीक माना जाता है.

डूबते सूर्य को अर्घ्य (23 मार्च शाम)
यह समय दिन और रात के मिलन का होता है. ज्योतिष में इसे ऊर्जा परिवर्तन का बिंदु माना गया है.

उगते सूर्य को अर्घ्य (24 मार्च सुबह)
यह सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है. इसे नई ऊर्जा, नई शुरुआत और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है.

परंपरा के साथ जुड़ी आधुनिक सोच
आज के समय में भी लोग इस पर्व को सिर्फ धार्मिक नजरिए से नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन के रूप में देखने लगे हैं. कई लोग बताते हैं कि इस दौरान व्रत और अनुशासन उन्हें एक नई ऊर्जा देता है.

चैती छठ हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति, ग्रहों और हमारे जीवन के बीच एक गहरा संबंध है. बदलते समय में भी यह परंपरा अपने मूल अर्थ के साथ कायम है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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