मुख्तार का भाई है इसलिए… माफिया के चचेरे भाई की संपत्ति नहीं होगी कुर्क, इलाहाबाद HC से योगी सरकार को झटका
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गाजीपुर के विशेष न्यायाधीश ने डीएम के मंसूर की 26,18,025 रुपये की कीमत की दुकानों और भवन को कुर्क करने के फैसले को बरकरार रखा था. इस आरोप पर कि ये मुख्तार की ‘बेनामी’ संपत्ति थीं. कोर्ट ने कमेंट करते हुए कहा कि “आरोपी के आपराधिक कृत्य और उसके द्वारा अर्जित संपत्ति के बीच संबंध होना आवश्यक है. किसी अपराध में उसकी संलिप्तता मात्र उसकी संपत्ति कुर्क करने के लिए पर्याप्त नहीं है.”

मुख्तार अंसारी के भाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत.
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट से योगी सरकार को बड़ा झटका लगा है. माफिया मुख्तार अंसारी के चचेरे भाई की सपंत्ति की कुर्की के आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने पूरे मामले के ट्रायल में पाया कि राज्य किसी भी अपराध और मुख्तार के चचेरे भाई मंसूर अंसारी के संबंधित भवन व दुकानों के निर्माण के बीच कोई संबंध नहीं साबित कर पाया है. चचेरे भाई मंसूर अंसारी के आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए जस्टिस राज बीर सिंह ने अपने फैसले में कहा कि राज्य केवल आरोपों के आधार पर या केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति किसी कुख्यात गैंगस्टर से संबंधित है, उसकी संपत्ति उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत जब्त नहीं कर सकता.
डीएम के आदेश के विशेष न्यााधीश ने बरकरार रखा था
बता दें कि इससे पहले गाजीपुर के विशेष न्यायाधीश ने डीएम के मंसूर की 26,18,025 रुपये की कीमत की दुकानों और भवन को कुर्क करने के फैसले को बरकरार रखा था. इस आरोप पर कि ये मुख्तार की ‘बेनामी’ संपत्ति थीं. लेकिन हाईकोर्ट ने गैंगस्टर अधिनियम की धारा 14 की जांच करते हुए पाया कि संपत्ति कुर्क करने की डीएम का पावर निरपेक्ष नहीं है.
‘यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह यह साबित करे’
कोर्ट ने कमेंट करते हुए कहा कि “आरोपी के आपराधिक कृत्य और उसके द्वारा अर्जित संपत्ति के बीच संबंध होना आवश्यक है. किसी अपराध में उसकी संलिप्तता मात्र उसकी संपत्ति कुर्क करने के लिए पर्याप्त नहीं है.” न्यायालय ने पाया कि डीएम कानूनी रूप से कुर्की को वैध करने में असफल रहे, जिससे कुर्की की प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी हो गई. न्यायालय ने यह भी कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी राज्य पर होती है कि ऐसी संपत्ति किसी अपराध के चलते अर्जित की गई है.
यह पीड़ित की जिम्मेदारी नहीं की वह आय का सोर्स बताए
न्यायालय ने कहा कि यह कानून की जरूरत नहीं है कि पीड़ित व्यक्ति को संदिग्ध संपत्तियों को अर्जित करने के लिए आय का सोर्स बताना हो. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि मंसूर अंसारी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था. हालांकि मुख्तार अंसारी के खिलाफ साल 2007 में एक मामला दर्ज किया गया था, अपीलकर्ता यानी कि मंसूर अंसारी को उस मामले में आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया था. अदालत ने पाया कि चुनौती दिए गए आदेश का आधार अनुमान और अटकलें थीं.
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प्रशान्त राय मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं. प्रशांत राय पत्रकारिता में पिछले 8 साल से एक्टिव हैं. अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए प्रशांत राय फिलहाल न्यूज18 हिंदी के साथ पिछले तीन …और पढ़ें